प्र1.
आइए देखें, नगरीकरण का यह चरण कैसे विकसित हुआ?
उत्तर
यह चरण चार चरणों में विकसित हुआ, और अध्याय इन्हीं क्रम से बताता है —
- कुलों का बसना। द्वितीय सहस्राब्दी सा.सं.पू. के उत्तरार्ध में उत्तर भारत की क्षेत्रीय संस्कृतियाँ पुनर्संगठित हुईं; लोग कुलों या वंशों के रूप में संगठित हुए और प्रत्येक कुल एक नियत भूभाग — जनपद — से जुड़ गया।
- व्यापारिक तंत्रों का विस्तार। जैसे-जैसे व्यापारिक मार्ग जनपदों को आपस में जोड़ने लगे, जनपद भी विकसित होते गए।
- महाजनपदों का बनना। 8वीं या 7वीं शताब्दी सा.सं.पू. तक कुछ जनपद मिलकर विशाल राजकीय इकाइयों — महाजनपदों — में परिवर्तित हो गए; प्रचलित सूची में इनकी संख्या 16 है।
- नगरों का उदय। महाजनपदों की राजधानियाँ विशाल, प्राचीरयुक्त एवं परिखा से घिरे नगर बने — यही द्वितीय नगरीकरण है।
और हमें यह ज्ञात कैसे होता है? अध्याय दो प्रमुख स्रोत बताता है —
- पुरातात्विक उत्खनन, जिनसे इन प्राचीन नगरों के अस्तित्व की पुष्टि होती है — चित्र 4.1 में राजगृह (आधुनिक राजगीर, बिहार) के अवशेष, चित्र 4.4 में कौशांबी का भवन समूह, चित्र 4.7 में शिशुपालगढ़ का द्वार तथा जल से भरी परिखा।
- प्राचीन साहित्य — उत्तर वैदिक, बौद्ध तथा जैन साहित्य, जिनमें इन नवीन नगरों का विशेष उल्लेख प्राप्त होता है।
दो स्रोत एक से बेहतर क्यों: उत्खनन से वास्तविक प्राचीरें, परिखाएँ, सिक्के और मृद्भांड मिलते हैं, परंतु यह नहीं बताता कि उस स्थान का नाम क्या था या वहाँ किसका शासन था। साहित्य नाम, राजा और कथाएँ देता है, परंतु उसमें अतिशयोक्ति हो सकती है। जब कुदाल और ग्रंथ दोनों एक ही बात कहें — जैसे ठीक उसी स्थान पर किलेबंद नगर मिले जहाँ ग्रंथ किसी महाजनपद की राजधानी बताते हैं — तब इतिहासकार निश्चिंत हो सकता है।