‘द्वितीय नगरीकरण’ उस नवीन एवं जीवंत नगरीय चरण का नाम है जो प्रथम सहस्राब्दी सा.सं.पू. में आरंभ हुआ — विशेषतः गंगा के मैदानी भाग, सिंधु घाटी के कुछ क्षेत्रों तथा उनके निकटवर्ती क्षेत्रों में, और जिसका क्रमशः संपूर्ण उपमहाद्वीप में विस्तार हुआ।
इसे ‘द्वितीय’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि इससे पूर्व भारत में एक नगरीकरण हो चुका था —
| प्रथम नगरीकरण | द्वितीय नगरीकरण | |
|---|---|---|
| कौन-सी सभ्यता | सिंधु / हड़प्पा / सिंधु-सरस्वती | जनपद एवं महाजनपद |
| कब | तृतीय सहस्राब्दी सा.सं.पू.; विघटन द्वितीय सहस्राब्दी सा.सं.पू. के आरंभ में | प्रथम सहस्राब्दी सा.सं.पू. में आरंभ |
| कहाँ | सिंधु तथा सरस्वती घाटी | गंगा का मैदान, सिंधु घाटी के भाग, फिर संपूर्ण भारत |
| प्रमुख धातु | ताम्र एवं कांस्य | लोहा |
इन दोनों के बीच लगभग एक सहस्राब्दी का ऐसा काल रहा जब भारत से नगरीय जीवन लुप्तप्राय था, यद्यपि उत्तर भारत के कुछ भागों में कहीं-कहीं इसके अवशेष विद्यमान रहे होंगे।