उद्धरण से प्राप्त अवलोकन — पाँच बातें विशेष रूप से ध्यान खींचती हैं :
- साधारण ग्रामीण, धनी तीर्थयात्री नहीं। लगभग बारह लोग — तीन-चार महिलाएँ और सात-आठ पुरुष — लखनऊ के उत्तर के दो गाँवों से।
- अत्यंत लंबी यात्रा। लगभग तीन महीने, और रामेश्वरम — देश का दक्षिणी छोर — उन स्थलों में से केवल एक था।
- वे अपनी गृहस्थी साथ लिए चल रहे थे। गठरियाँ, मिट्टी के पात्र और “भोजन की सभी आवश्यक वस्तुएँ — आटा, घी, चीनी”। वे स्वयं भोजन बनाते थे, जिससे यात्रा सस्ती भी रहती और उनके नियम भी बने रहते।
- समूह ही इकाई है। कोई अकेला नहीं चलता; दो गाँवों के स्त्री-पुरुष एक दल के रूप में चलते हैं और व्यय, भोजन तथा सुरक्षा साझा करते हैं।
- उद्देश्य के प्रति दृढ़ता। “हमारे पास समय नहीं है... हमें हरिद्वार पहुँचना है। उसके बाद हमें घर लौटना है।” यात्रा का लक्ष्य तीर्थ है, घूमना नहीं।
संभावित मार्ग। वे रेल से चल रहे थे, अत: स्वाभाविक मार्ग पूर्वी तट से उत्तर और फिर गंगा के मैदान से होकर जाता है :
→ मदुरई → तिरुचिरापल्ली → चेन्नई
→ कोरोमंडल तट के साथ उत्तर : विजयवाड़ा → विशाखापत्तनम → भुवनेश्वर/पुरी (ओडिशा)
→ खड़गपुर → प्रयागराज / वाराणसी गंगा के किनारे
→ कानपुर → लखनऊ (उनका अपना क्षेत्र) → मुरादाबाद
→ दिल्ली में गाड़ी बदलकर → हरिद्वार (उत्तराखंड)
तीर्थयात्रियों का दल इसी रेखा पर पड़ने वाले तीर्थों को छूता चलता — रामेश्वरम, कांचीपुरम, पुरी, गया, वाराणसी, प्रयागराज। इसीलिए यात्रा तीन महीने लंबी हुई।
वे दिल्ली में क्यों नहीं रुके। क्योंकि दिल्ली एक बड़ी राजधानी अवश्य है, किंतु उनकी तीर्थ-सूची का भाग नहीं है। तीन कारण एक साथ काम करते हैं :
- उद्देश्य। उनकी यात्रा एक संकल्प थी, जिसमें पावन स्थलों का क्रम निश्चित था। हरिद्वार — जहाँ गंगा मैदान में प्रवेश करती है — उस सूची में था, दिल्ली नहीं। उनके लिए दिल्ली केवल वह जंक्शन था जहाँ गाड़ी बदलनी थी।
- समय और व्यय। तीन महीने से घर से बाहर, आटा-घी साथ लिए हुए। एक दिन अधिक रुकने का अर्थ था अधिक व्यय और घर का अधूरा काम। उन्होंने स्वयं कहा — “हमारे पास समय नहीं है।”
- यात्रा को पूर्ण करना। यात्रा विधिपूर्वक पूरी की जाती है — हरिद्वार में स्नान और फिर सीधे घर। बीच में घूमना उस अनुशासन को तोड़ देता।