प्र1.
चार धामों की स्थिति का पता लगाइए। आपके अनुसार जब लोगों ने भारत के उत्तर-दक्षिण तथा पूर्व-पश्चिम की यात्रा की, तब उनके लिए इन धामों का क्या कोई विशेष महत्व था?
उत्तर
पहले स्थिति देखिए। चित्र 8.6 के मानचित्र में चारों धाम (हल्के नीले त्रिभुज) लगभग ठीक देश के चार कोनों पर हैं :
| धाम | कहाँ | दिशा |
|---|---|---|
| बद्रीनाथ | उत्तराखंड, ऊँचे हिमालय में | उत्तर |
| पुरी | ओडिशा, बंगाल की खाड़ी के तट पर | पूर्व |
| रामेश्वरम | तमिलनाडु, दक्षिणी छोर पर पाक जलडमरूमध्य के पास | दक्षिण |
| द्वारका | गुजरात, अरब सागर के तट पर | पश्चिम |
अध्याय स्वयं कहता है कि ये चारों “सुनियोजित रूप से भारत के दक्षिण, उत्तर, पूर्व तथा पश्चिम में स्थापित हैं।” इन्हें मिलाइए तो संपूर्ण उपमहाद्वीप पर एक विशाल क्रॉस बन जाता है।
यात्रा करने वालों के लिए इसका क्या अर्थ था :
- पूरे देश को पार किए बिना यात्रा पूरी नहीं होती। बद्रीनाथ से रामेश्वरम लगभग 2,800 किमी है और द्वारका से पुरी लगभग 1,900 किमी। तीर्थयात्री को हिमालय, दक्कन, दोनों तट और गंगा का मैदान — सब देखना ही पड़ता था।
- भारत मन में एक हो जाता है। जो व्यक्ति हिमशिखर से दक्षिणी समुद्र-तट तक चल आया, उसके लिए अपना जनपद ही संसार नहीं रह जाता। उसने अपने पैरों से अनुभव किया कि यह सब एक ही भूमि है — वही “एक देश और एक संस्कृति की भावना”।
- भिन्नता अजनबी नहीं रहती। मार्ग में उसे भिन्न भाषाएँ, भोजन, वस्त्र और रीतियाँ मिलतीं — और वही देवता, वही पर्व, नदियों के प्रति वही श्रद्धा भी। विविधता और एकता एक साथ अनुभव होती थी।
- मार्ग स्वयं विकसित होते गए। निरंतर उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम आवागमन से रास्ते, घाट, विश्रामगृह और बाज़ार बने रहते थे, जिससे व्यापार, समाचार और विचार भी उन्हीं मार्गों से चलते थे।
- प्रत्येक क्षेत्र का महत्व बना। कोई कोना दूरस्थ कहकर उपेक्षित नहीं हो सकता था, क्योंकि प्रत्येक कोने में संपूर्ण का एक चौथाई भाग था। इसी प्रकार पावन स्थलों का जाल चुपचाप राष्ट्र का मानचित्र बन गया।
यह कीजिए: भारत के रेखा-मानचित्र पर चारों धाम अंकित कीजिए और उन्हें सीधी रेखाओं से जोड़िए। फिर सूची देखकर द्वादश ज्योतिर्लिंग भी अंकित कीजिए और देखिए कि वे बीच का स्थान कैसे भर देते हैं। जो चित्र बनेगा, वही अध्याय का पावन भूभाग है।