कथन का अर्थ। सुजुकी का पहला वाक्य ही पूरा तर्क है : “हम जिस दृष्टि से विश्व को देखते हैं, उसी के अनुसार उसके साथ व्यवहार करते हैं।” हम किसी वस्तु को जो नाम देते हैं, वही तय करता है कि उसके साथ क्या करने की छूट हम स्वयं को दे देते हैं। फिर वे पाँच जोड़े देते हैं, और हर जोड़े में एक ही वस्तु के दो नाम हैं :
| ऐसे देखें … | … या ऐसे | प्रत्येक दृष्टि से क्या होगा |
|---|---|---|
| पर्वत जो देवता है | खनिज का ढेर | आप उसे नमन कर उसकी रक्षा करेंगे — या उसे तोड़कर खोदेंगे |
| नदी जो पृथ्वी की शिरा है | केवल सिंचाई का स्रोत | आप उसे बहती और स्वच्छ रखेंगे — या सूखने तक निचोड़ेंगे |
| वन जो पावन निकुंज है | इमारती लकड़ी | आप गिरी टहनी भी न उठाएँगे — या वृक्षों को घनमीटर में गिनेंगे |
| अन्य प्रजातियाँ जो हमारे संबंधी हैं | साधनमात्र | आप उनके साथ स्थान बाँटेंगे — या उन्हें रास्ते से हटा देंगे |
| पृथ्वी जो हमारी माता है | केवल संसाधन | आप उतना ही लेंगे जितना वह दे सके — या वह सब लेंगे जो बिक सके |
अंतिम चरण पर ध्यान दीजिए : यदि हम विश्व को ऐसे देखें, “तब हम इन सभी के साथ अत्यंत आदर के साथ व्यवहार करते हैं।” प्रकृति के प्रति आदर और मनुष्यों के प्रति आदर दो अलग आदतें नहीं हैं; दोनों एक ही दृष्टि से उपजते हैं। चुनौती नई तकनीक की नहीं, दृष्टि बदलने की है।
यह कथन इस अध्याय में क्यों है। सुजुकी एक कनाडाई वैज्ञानिक की दृष्टि से ठीक वही विश्व-दृष्टि बता रहे हैं जिसे यह अध्याय भारत में देखता आया है — नियमगिरि की वह पहाड़ी जो नियम राजा का निवास है, ‘गंगा जी’ कहकर पुकारी जाने वाली नदी, देवता का निकुंज, वह पीपल जिसे कोई नहीं काटता, वह पृथ्वी जो भूदेवी है, और माओरी पर्वत तारानकी माउंगा जिसे अब मनुष्य के समान अधिकार प्राप्त हैं।
हमारे व्यवहार पर प्रभाव
| तत्व | यह दृष्टि अपनाने पर क्या बदलेगा |
|---|---|
| वायु | कम जलाएँ — पैदल चलें, साइकिल और साझा वाहन प्रयोग करें; पत्ते और प्लास्टिक न जलाएँ; कंक्रीट के बदले वृक्ष लगाएँ और बचाएँ |
| जल | नदी, तालाब या कुएँ को कभी कूड़ेदान न बनाएँ; प्लास्टिक और तेल उसमें न डालें; रिसाव ठीक कराएँ; वर्षा-जल संचय करें; मल-जल शोधन का समर्थन करें |
| भूमि | कचरा अलग करें और घटाएँ; एक बार प्रयोग होने वाला प्लास्टिक छोड़ें; निकुंज, तालाब की भूमि या गोचर पर अतिक्रमण न करें |
| वृक्ष | पुराने वृक्षों की — विशेषकर पीपल, बरगद और नीम की — रक्षा करें; देशी प्रजातियाँ लगाएँ; पास के पावन निकुंज को ‘विकसित’ करने के बदले अक्षुण्ण रखें |
| पर्वत | अपना कचरा साथ नीचे लाएँ; नाजुक ढलानों पर निर्माण और खनन की सीमा का समर्थन करें; पहाड़ी तीर्थ की यात्रा को सैर नहीं, दायित्व मानें |