अन्वेषण अध्याय 8 प्रश्न एवं क्रियाकलाप

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
प्रसिद्ध पर्यावरणविद डेविड सुजुकी के निम्नलिखित वाक्य पढ़ें — “हम जिस दृष्टि से विश्व को देखते हैं, उसी के अनुसार उसके साथ व्यवहार करते हैं। अगर पर्वत एक देवता है, न कि खनिज का ढेर; अगर नदियाँ पृथ्वी की शिराएँ हैं, न कि केवल सिंचाई का स्रोत; अगर वन पावन निकुंज है, न कि केवल इमारती लकड़ियों का ढेर; अगर अन्य प्रजातियाँ हमारे संबंधी हैं, न कि केवल साधनमात्र या अगर पृथ्वी हमारी माता है, न कि केवल संसाधन; तब हम इन सभी के साथ अत्यंत आदर के साथ व्यवहार करते हैं। अत: यह विश्व को एक अलग परिप्रेक्ष्य में देखने की चुनौती है।” इस पर छोटे समूह में चर्चा कीजिए। आप उक्त वाक्यों से क्या समझते हैं? इससे हमारे चारों ओर विद्यमान वायु, जल, भूमि, वृक्ष तथा पर्वत के प्रति हमारे व्यवहार पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर

कथन का अर्थ। सुजुकी का पहला वाक्य ही पूरा तर्क है : “हम जिस दृष्टि से विश्व को देखते हैं, उसी के अनुसार उसके साथ व्यवहार करते हैं।” हम किसी वस्तु को जो नाम देते हैं, वही तय करता है कि उसके साथ क्या करने की छूट हम स्वयं को दे देते हैं। फिर वे पाँच जोड़े देते हैं, और हर जोड़े में एक ही वस्तु के दो नाम हैं :

ऐसे देखें …… या ऐसेप्रत्येक दृष्टि से क्या होगा
पर्वत जो देवता हैखनिज का ढेरआप उसे नमन कर उसकी रक्षा करेंगे — या उसे तोड़कर खोदेंगे
नदी जो पृथ्वी की शिरा हैकेवल सिंचाई का स्रोतआप उसे बहती और स्वच्छ रखेंगे — या सूखने तक निचोड़ेंगे
वन जो पावन निकुंज हैइमारती लकड़ीआप गिरी टहनी भी न उठाएँगे — या वृक्षों को घनमीटर में गिनेंगे
अन्य प्रजातियाँ जो हमारे संबंधी हैंसाधनमात्रआप उनके साथ स्थान बाँटेंगे — या उन्हें रास्ते से हटा देंगे
पृथ्वी जो हमारी माता हैकेवल संसाधनआप उतना ही लेंगे जितना वह दे सके — या वह सब लेंगे जो बिक सके

अंतिम चरण पर ध्यान दीजिए : यदि हम विश्व को ऐसे देखें, “तब हम इन सभी के साथ अत्यंत आदर के साथ व्यवहार करते हैं।” प्रकृति के प्रति आदर और मनुष्यों के प्रति आदर दो अलग आदतें नहीं हैं; दोनों एक ही दृष्टि से उपजते हैं। चुनौती नई तकनीक की नहीं, दृष्टि बदलने की है।

यह कथन इस अध्याय में क्यों है। सुजुकी एक कनाडाई वैज्ञानिक की दृष्टि से ठीक वही विश्व-दृष्टि बता रहे हैं जिसे यह अध्याय भारत में देखता आया है — नियमगिरि की वह पहाड़ी जो नियम राजा का निवास है, ‘गंगा जी’ कहकर पुकारी जाने वाली नदी, देवता का निकुंज, वह पीपल जिसे कोई नहीं काटता, वह पृथ्वी जो भूदेवी है, और माओरी पर्वत तारानकी माउंगा जिसे अब मनुष्य के समान अधिकार प्राप्त हैं।

हमारे व्यवहार पर प्रभाव

तत्वयह दृष्टि अपनाने पर क्या बदलेगा
वायुकम जलाएँ — पैदल चलें, साइकिल और साझा वाहन प्रयोग करें; पत्ते और प्लास्टिक न जलाएँ; कंक्रीट के बदले वृक्ष लगाएँ और बचाएँ
जलनदी, तालाब या कुएँ को कभी कूड़ेदान न बनाएँ; प्लास्टिक और तेल उसमें न डालें; रिसाव ठीक कराएँ; वर्षा-जल संचय करें; मल-जल शोधन का समर्थन करें
भूमिकचरा अलग करें और घटाएँ; एक बार प्रयोग होने वाला प्लास्टिक छोड़ें; निकुंज, तालाब की भूमि या गोचर पर अतिक्रमण न करें
वृक्षपुराने वृक्षों की — विशेषकर पीपल, बरगद और नीम की — रक्षा करें; देशी प्रजातियाँ लगाएँ; पास के पावन निकुंज को ‘विकसित’ करने के बदले अक्षुण्ण रखें
पर्वतअपना कचरा साथ नीचे लाएँ; नाजुक ढलानों पर निर्माण और खनन की सीमा का समर्थन करें; पहाड़ी तीर्थ की यात्रा को सैर नहीं, दायित्व मानें
नियम से अधिक दृष्टि क्यों महत्वपूर्ण है: नियम के लिए निरीक्षक चाहिए; दृष्टि आपके साथ चलती है। जो समुदाय मानता है कि निकुंज देवता का घर है, वह बिना वेतन के वर्ष के हर दिन उसकी रखवाली करता है। इसीलिए अध्याय कहता है कि सतत विकास के इस युग में पावन भौगोलिक क्षेत्र आधारित विश्व-दृष्टि “महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है”।
प्र2.
आपने क्षेत्र के पावन स्थलों की सूची बनाइए। पता लगाइए कि ये स्थल पावन क्यों माने जाते हैं? क्या इनसे जुड़ी कोई कहानियाँ हैं? इस विषय में 150 शब्दों में एक संक्षिप्त लेख लिखिए। (संकेत— आप अपने परिवार एवं समुदाय के वरिष्ठ लोगों से चर्चा कर सकते हैं। अपने शिक्षक से भी विचार-विमर्श कीजिए। इस प्रकार की सूचनाओं का संग्रह करने के लिए लेख एवं पुस्तक पढ़िए)।
उत्तर

विधि — सामग्री कैसे जुटाएँ

  1. पहले सूची बनाइए। अपने क्षेत्र में घूमकर या सोचकर हर प्रकार का पावन स्थल लिखिए, केवल मंदिर नहीं : देवस्थान, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा, दरगाह, कोई पावन वृक्ष, निकुंज, तालाब या जलस्रोत, पहाड़ी, सीमा-पत्थर, समाधि।
  2. वरिष्ठ लोगों से पूछिए। दादा-दादी, पुजारी या देखभाल करने वाले, सबसे पुराने दुकानदार। तीन प्रश्न पूछिए : यह कितना पुराना है? यह स्थल विशेष क्यों है? इससे जुड़ी कौन-सी कथा है? उनके शब्द उन्हीं के रूप में लिखिए।
  3. दूसरा स्रोत भी देखिए। अपने शिक्षक, जनपद का गजेटियर, पुस्तकालय, या स्थल पर लगे शिलालेख और सूचना-पट्ट।
  4. नियम खोजिए। वहाँ क्या करना वर्जित है — जूते पहनना, वृक्ष काटना, आखेट, तालाब में मछली पकड़ना? नियम ही पावनता और प्राय: पारिस्थितिकी दोनों बचाते हैं।

150 शब्दों के अच्छे लेख में क्या अवश्य हो

  • कम-से-कम तीन-चार स्थलों के नाम और ठीक स्थिति
  • प्रत्येक क्यों पावन माना जाता है — देवता, संत, कोई घटना या कोई प्राकृतिक विशेषता।
  • कम-से-कम एक कथा, जो आपके समुदाय में कही जाती है, और यह भी कि वह आपको किसने सुनाई।
  • उस स्थल की वर्तमान दशा पर एक पंक्ति — सुरक्षित है या उपेक्षित।
  • अंत में अपना एक वाक्य — इसे क्यों बचाया जाना चाहिए।
नमूना उत्तर (अपने वास्तविक नाम और कथाएँ भरकर इसे बदल लीजिए) : “हमारे क्षेत्र में तीन स्थल पावन माने जाते हैं। पहला नदी के किनारे का शिव मंदिर है, जिसे गाँव के लोग तीन सौ वर्ष से अधिक पुराना बताते हैं; कहते हैं कि लिंग किसी ने स्थापित नहीं किया था, वह एक ग्वाले को तब मिला जब उसकी गाय प्रतिदिन उसी स्थान पर दूध बहा देती थी। दूसरा चौराहे का पुराना पीपल है। उसकी टहनी तक कोई नहीं काटता; स्त्रियाँ उस पर लाल धागा बाँधती हैं और पंचायत उसी की छाया में बैठती है। तीसरा मंदिर के पीछे का तालाब है, जहाँ मछली कभी नहीं पकड़ी जाती क्योंकि वे देवता की मानी जाती हैं — यही कारण है कि जब आस-पास के पोखर सूख गए, तब भी यह तालाब भरा और स्वच्छ रहा। ये तीनों स्थल किसी कानून से नहीं, एक कथा से सुरक्षित हैं जिस पर लोग आज भी विश्वास करते हैं। इसीलिए ये बचे हैं और इसीलिए हमें इन्हें बचाए रखना चाहिए।”
प्र3.
आपके विचार में प्राकृतिक तत्व, जैसे – नदी, पर्वत और वन आदि लोगों के लिए पावन क्यों माने जाते हैं? वे हमारे जीवन में किस प्रकार योगदान देते हैं?
उत्तर

वे पावन क्यों माने जाते हैं। अध्याय में चार कारण चलते हैं, और चारों एक-दूसरे को पुष्ट करते हैं।

  1. प्रकृति के कण-कण में दैवीय उपस्थिति का अनुभव। हिंदू तथा अनेक लोक एवं जनजातीय मान्यताओं में पर्वत, नदी, वृक्ष, पौधे, पशु और पत्थर तक पावन हैं; कई नदियाँ देवी के रूप में पूजी जाती हैं और अंतत: संपूर्ण पृथ्वी भूदेवी है।
  2. वे जीवन देते हैं। “ये नदियाँ भारतीय सभ्यता के लिए जीवनदायिनी रही हैं।” जल, मिट्टी, अन्न, औषधि, लकड़ी, वर्षा — समुदाय की हर आवश्यकता नदी, वन और पर्वत से आती है। जो जीवन देता है, उसके प्रति श्रद्धा स्वाभाविक है।
  3. वे विस्मय जगाते हैं। हिमशिखर, बाढ़ में बहती नदी या विशाल पुराना वृक्ष किसी भी मानव जीवन से बहुत बड़े और बहुत पुराने हैं। ऊँचाई के कारण ही पर्वतों को “पृथ्वी से स्वर्ग तक के प्रतीकात्मक प्रवेश-द्वार” के रूप में देखा गया, अत: चढ़ाई दिव्य तक पहुँचने की यात्रा बन गई।
  4. उनसे कथाएँ और स्मृतियाँ जुड़ी हैं। महाकाव्यों में पावन नदियों, वनों और पर्वतों का स्पष्ट वर्णन है; गाँव मानते हैं कि राम या पांडव वहाँ से गए; तीर्थंकरों ने किन्हीं पहाड़ियों और सरोवरों पर ध्यान किया; नियम राजा नियम डोंगर पर रहते हैं। जिस स्थान की कथा हो, उसका नाम भी होता है और रक्षक भी।

वे हमारे जीवन में क्या योगदान देते हैं

तत्वहमें क्या देता है
नदियाँपेयजल, सिंचाई, मछली, आवागमन और व्यापार-मार्ग; उपजाऊ मैदान; संगमों पर कुंभ जैसे विशाल समागम
पर्वतनदियों का उद्गम, हिम और वर्षा; वन, जड़ी-बूटियाँ और खनिज; शीतल जलवायु; रक्षा-कवच; और वे तीर्थ जहाँ लाखों आते हैं
वन और पावन निकुंजस्वच्छ वायु, ईंधन और लकड़ी, फल, औषधि, चारा; वन्य जीवों का आवास; जल और मिट्टी की पकड़; पावन निकुंज “वनस्पतियों एवं जीवों की विशाल जैव-विविधता” और छोटे जलाशयों को आश्रय देते हैं
पीपल जैसे वृक्षछाया, ऑक्सीजन, औषधि (पत्तियाँ त्वचा रोगों में, छाल उदर रोगों में), तथा लगभग पूरे वर्ष पक्षियों और पशुओं को भोजन एवं आश्रय
पशु-पक्षीतंजावुर के निकुंज के देवता जिन फल-चमगादड़ों की रक्षा करते हैं, वे पुष्पों का परागीकरण और बीजों का प्रसार करते हैं — देवता, पारिस्थितिकी और मानव, तीनों का एक सामंजस्य
गहरी बात: यहाँ श्रद्धा और उपयोगिता विरोधी नहीं हैं। किसी वस्तु को पावन कहना समुदाय का वह उपाय है जिससे जो उसे जीवित रखता है, वह कभी नष्ट न हो। अध्याय के शब्दों में — “इस अवधारणा ने ही हमें प्रकृति को सुरक्षित तथा संरक्षित रखने में सहायता की, क्योंकि हम प्रकृति से पृथक नहीं हैं।”
प्र4.
लोग तीर्थ या अन्य पावन स्थलों की यात्रा क्यों करते हैं?
उत्तर

अध्याय अनेक कारण देता है; प्राय: ये एक ही यात्री में एक साथ काम करते हैं।

कारणअध्याय से
उच्चतर जीवन में प्रवेश के लिएतीर्थ शाब्दिक अर्थ में पार करने का स्थल है; प्रतीकात्मक दृष्टि से वह स्थान जहाँ कोई “अपने सामान्य जीवन से उच्च और आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करता है”
आंतरिक यात्रा के लिएयात्रा “न केवल शारीरिक और भौतिक, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा भी है”; सबरीमाला का कठिन मार्ग “आध्यात्मिक यात्रा की कठिनाइयों का प्रतीक” है
क्योंकि वहाँ कोई महान व्यक्ति रहाजहाँ बुद्ध गए या जहाँ उनके अवशेष हैं; जहाँ तीर्थंकरों ने मोक्ष पाया; गुरुओं से जुड़े तख्त, जहाँ सिख श्रद्धालु जीवन में कम-से-कम एक बार जाना चाहते हैं
क्योंकि समय मांगलिक हैहरिद्वार, प्रयागराज, नासिक और उज्जैन में “एक विशेष खगोलीय अवधि में वहाँ की नदियों में डुबकी लगाना अत्यंत मांगलिक माना जाता है”
संकल्प या आकांक्षा पूरी करने के लिएकुछ हिंदू चार धामों की यात्रा की इच्छा रखते हैं; धर्मपाल का दल हरिद्वार पहुँचे बिना दिल्ली में भी रुकने को तैयार नहीं था
सीखने, चर्चा और विचार-विमर्श के लिएलोग “चर्चा, विचार-विमर्श, अपने मत-विश्वास को लोकप्रिय बनाने तथा प्रतिष्ठित शिक्षकों से सीखने या अध्ययन करने” जाते थे
व्यापार के लिएव्यापारी क्रय-विक्रय के लिए यात्रा करते थे, और “कुछ व्यापारी तीर्थयात्री के रूप में” भी चलते थे
संगति और संसार देखने के लिएपूरे गाँव के दल महीनों साथ चलते थे और मार्ग में नई भाषाएँ, भोजन और रीतियाँ देखते थे
एक वाक्य में: लोग तीर्थ इसलिए जाते हैं कि भीतर कुछ बदल जाए — किंतु मार्ग में वे अपना देश भी देख लेते हैं, उसके लोगों से मिलते हैं, क्रय-विक्रय करते हैं, सीखते-विवाद करते हैं और यह सब साथ लेकर लौटते हैं।
प्र5.
प्राचीन तीर्थयात्रा मार्गों ने उस समय किस प्रकार व्यापार को प्रोत्साहित किया? आपके अनुसार ये पावन स्थल उन क्षेत्रों के आर्थिक विकास में किस प्रकार सहायक बने?
उत्तर

भाग 1 — तीर्थयात्रा मार्गों ने व्यापार को कैसे बढ़ाया

  1. तीर्थयात्री ग्राहक थे। “तीर्थयात्रियों को अनेक प्रकार की वस्तुओं की आवश्यकता होती है, जिन्हें व्यापारी उपलब्ध कराते हैं” — भोजन, वस्त्र, पात्र, फूल, तेल, पूजा-सामग्री, पहाड़ों के लिए कंबल। यात्रियों का निरंतर प्रवाह अर्थात निरंतर बाज़ार।
  2. दोनों के लिए एक ही मार्ग। मार्ग आपस में जुड़ जाते थे। उत्तरापथ उत्तर-पश्चिम को पूर्व से जोड़ता था — मथुरा, काशी और पाटलिपुत्र होते हुए; दक्षिणापथ कौशांबी से उज्जयिनी होते हुए प्रतिष्ठान तक जाता था। ‘आइए पता लगाएँ’ के अनुसार व्यापार-मानचित्र को तीर्थ-मानचित्र पर रखिए और रेखाएँ एक-दूसरे पर बैठ जाती हैं।
  3. व्यापारी और तीर्थयात्री प्राय: एक ही व्यक्ति थे। “कुछ व्यापारी तीर्थयात्री के रूप में तीर्थ स्थलों की यात्रा करते हुए अपनी वस्तुओं को भी दूर-दूर तक के उपनगरों एवं नगरों में विक्रय के लिए ले जाते हैं।”
  4. निरंतर आवागमन ने मार्ग जीवित रखे। घाट, विश्रामगृह, नानेघाट जैसी गुफाएँ, कुएँ और पहरा इसलिए बने रहते थे कि लोग निरंतर आते-जाते थे; इनका लाभ व्यापारियों को भी उतना ही मिला।
  5. मेले थोक बाज़ार थे। जो आयोजन ज्ञात तिथि पर अनेक क्षेत्रों से लाखों लोगों को एक स्थान पर लाए, वह बड़ी मंडी के लिए आदर्श है — वस्तुएँ, पशु, शिल्प और समाचार, सब वहीं बदलते थे।
  6. वस्तुएँ दूर तक पहुँचीं। इन मार्गों से सीप और मोती, सिक्के, स्वर्ण और हीरे, कपास, मसाले तथा चंदन ऐसे क्षेत्रों तक पहुँचे जहाँ इनमें से कुछ भी नहीं होता था।

भाग 2 — क्या पावन स्थल क्षेत्र के आर्थिक विकास में सहायक बनते हैं? हाँ, और यह सरलता से दिखता है।

प्रभावआज यह कैसा दिखता है
रोजगारपुरोहित और मार्गदर्शक, दुकानदार, रसोइए, नाविक, चालक, कुली, होटल और सफ़ाई कर्मचारी, छायाकार
स्थानीय शिल्प और उपजमाला, पीतल और मिट्टी के पात्र, मूर्तियाँ, मिठाई, वस्त्र और स्मृति-चिह्न स्थानीय स्तर पर बनते और बिकते हैं
अवसंरचनासड़कें, रेलवे स्टेशन, पुल, जलापूर्ति, बिजली और चिकित्सालय, जो यात्रियों के लिए बनते हैं और सबके काम आते हैं
पैमानाबोधगया में प्रतिवर्ष चालीस लाख से अधिक; सबरीमाला में लगभग एक करोड़; 2025 के कुंभ में लगभग 66 करोड़
वार्षिक चक्रपर्व और शुभ ऋतुएँ नगर को कमाई का एक निश्चित कैलेंडर दे देती हैं
किंतु एक चेतावनी भी जोड़िए: यह विकास संभालकर करना होगा। भीड़ अपने साथ प्लास्टिक, मल-जल, यातायात और नाजुक पहाड़ियों तथा नदी-तटों पर निर्माण भी लाती है — चित्र 8.18 यही दिखाता है। जो विकास स्थल की पावनता ही नष्ट कर दे, वह अंतत: उस कारण को भी नष्ट कर देगा जिसके लिए लोग आते थे। सच्चा उत्तर यह है : हाँ, पावन स्थल क्षेत्र की अर्थव्यवस्था बढ़ाते हैं — बशर्ते कमाई के साथ स्थल की रक्षा भी होती रहे।
प्र6.
पावन स्थल किस प्रकार वहाँ के लोगों की संस्कृति और परंपरा को प्रभावित करते हैं?
उत्तर

पावन स्थल पर केवल यात्रा नहीं होती; वह धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र के जीने के ढंग को गढ़ देता है।

जीवन का पक्षपावन स्थल उसे कैसे गढ़ता है
वार्षिक कैलेंडरपर्व, मेले और शुभ स्नान-तिथियाँ वर्ष को बाँध देती हैं — पंढरपुर की प्रतिवर्ष वारी, प्रयागराज का छह वर्ष पर कुंभ, स्थानीय निकुंज-देवता का वार्षिक मेला
अनुष्ठान और दैनिक आदतेंजल के अनुष्ठानों में सात नदियों का आह्वान; हल्दी-कुमकुम से वृक्षों का अलंकरण; स्नान, परिक्रमा या दीपक साधारण जीवन का अंग बन जाते हैं
कलाएँस्थल के चारों ओर गीत, स्तुतियाँ, नृत्य, नाट्य और मंदिर-स्थापत्य विकसित होते हैं; महाकाव्यों के प्रसंग स्थानीय परिवेश में कहे जाते हैं
आजीविका और कौशलपूरे परिवार माला बनाने वाले, पीतल-शिल्पी, रसोइए, नाविक या मार्गदर्शक बन जाते हैं — कौशल पीढ़ियों तक चलता है
भोजनविशेष प्रसाद और पर्व-व्यंजन; क्या और कब खाया जाए, इसके नियम; तथा अन्नदान की परंपरा
सामाजिक जीवनमंदिर का प्रांगण, तालाब या निकुंज मिलने, विवाद सुलझाने और गाँव के निर्णय लेने का स्थान बनता है; दूर से आए यात्री नए समाचार और विचार लाते हैं
भाषा और नामस्थान-नाम, कुल-नाम और मुहावरे देवता से बनते हैं; पावन निकुंज का हर भाषा में अपना शब्द है — कावु, देवराई, सरना, ओरण
प्रकृति संबंधी नियमवृक्ष न काटना, आखेट न करना, तालाब में मछली न पकड़ना, पहाड़ी पर खनन न करना — ऐसी रीतियाँ स्थल के साथ पारिस्थितिकी की भी रक्षा करती हैं
दूसरों के प्रति खुलापनअजमेर और वेलांकन्नी जैसे स्थलों पर अनेक पंथों के लोग आते हैं, अत: आस-पास का समाज भिन्नता के साथ जीना सीखता है
प्रभाव इतना गहरा क्यों: पावन स्थल समुदाय को एक साथ तीन चीजें देता है — एक साझी कथा, एक साझा कैलेंडर और एक साझा स्थान। जब लोग एक ही कथा कहने लगें, एक ही दिनों पर एकत्र हों और एक ही स्थान पर मिलें, तो संस्कृति और परंपरा लगभग स्वयं ही बन जाती है।
प्र7.
भारत के विविध प्रकार के पावन स्थलों में से अपनी रुचि के अनुसार किन्हीं दों का चयन कीजिए तथा उनका महत्व बताते हुए एक परियोजना बनाइए।
उत्तर

परियोजना कैसे बनाएँ

  1. ऐसे दो स्थल चुनिए जो एक-दूसरे से भिन्न हों, ताकि परियोजना में कहने को कुछ हो — जैसे एक हिमालयी और एक तटीय, या एक बौद्ध और एक हिंदू, या एक विशाल तीर्थ-नगर और एक छोटा पावन निकुंज।
  2. दोनों के लिए वही आठ शीर्षक रखिए, जिससे तुलना हो सके : कहाँ है · किस परंपरा का · पावन क्यों है · इससे जुड़ी कथा · वहाँ क्या दिखता है · लोग कब जाते हैं · स्थानीय अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी पर प्रभाव · आज की एक समस्या।
  3. भारत का मानचित्र लगाइए, जिस पर दोनों स्थल अंकित हों, और प्रत्येक के लिए एक चित्र या रेखाचित्र दीजिए।
  4. स्रोत लिखिए — पाठ्यपुस्तक, जिन वरिष्ठजन से बात की, कोई पुस्तक या वेबसाइट।
  5. अंत में अपना एक पृष्ठ जोड़िए : इतनी दूर स्थित इन दो स्थलों में समान क्या है।

नमूना उत्तर — एक तुलना, जिसे आप अपने अनुसार बदल सकते हैं

बोधगया, बिहारमावफ्लांग पावन निकुंज, मेघालय
कहाँमध्य बिहार में फल्गु नदी के तट परखासी पहाड़ियों में, शिलांग से लगभग 25 किमी (चित्र 8.14)
परंपराबौद्ध धर्म; अनेक देशों के लोग आते हैंखासी समुदाय की मान्यता; निकुंज खलाव केनतांग है
पावन क्योंबौद्ध परंपरा के अनुसार यहीं महात्मा बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया; महाबोधि स्तूप उस स्थान को चिह्नित करता हैवन देवता — रिंकेव या बासा — का निवास है; वन लोगों का नहीं, देवता का है
कथामहाबोधि मंदिर के वृक्ष को मूल वृक्ष का वंशज बताया जाता है, जिसके नीचे बुद्ध बैठे थे — इसी से ‘बोधि वृक्ष’ और ‘बोधगया’ नाम पड़ेनिकुंज से कुछ भी बाहर नहीं ले जाया जा सकता, सूखा पत्ता तक नहीं; ऐसा करने वाले को देवता दंड देते हैं, यह माना जाता है
पैमानाप्रतिवर्ष चालीस लाख से अधिक यात्रीक्षेत्रफल छोटा, किंतु भारत भर में फैले हजारों निकुंजों में से एक
क्या बचाता हैएक स्मारक और एक जीवित वृक्ष-परंपरा; विश्व धरोहर स्थलदुर्लभ ऑर्किड, औषधीय पौधे, प्राचीन वृक्ष, जलस्रोत — “वनस्पतियों एवं जीवों की विशाल जैव-विविधता”
अर्थव्यवस्थाहोटल, मार्गदर्शक, अनेक देशों के मठ, यातायात, शिल्प, अंतरराष्ट्रीय पर्यटनसमुदाय द्वारा संचालित निर्देशित भ्रमण; नीचे बसे गाँवों के जलस्रोतों की रक्षा
आज की समस्याभीड़, कचरा और नाजुक स्मारक पर दबावकृषि और निर्माण के लिए अतिक्रमण, जैसा अध्याय निकुंजों के विषय में सामान्यत: बताता है
आपका समापन अनुच्छेद यह कह सकता है: इनमें से एक स्थल विश्वप्रसिद्ध है और दूसरा प्राय: अपने ही गाँवों तक सीमित; एक की रक्षा कानून और अंतरराष्ट्रीय ध्यान करते हैं, दूसरे की एक कथा और एक नियम। फिर भी दोनों एक ही कारण से बचे हैं — किसी समुदाय ने तय किया कि भूमि के इस टुकड़े को कभी हानि नहीं पहुँचाई जाएगी।
प्र8.
तीर्थयात्राएँ किस प्रकार दोहरा महत्व रखती हैं?
उत्तर

तीर्थयात्रा दो स्तरों पर एक साथ काम करती है — भीतर की ओर, यात्रा करने वाले व्यक्ति के लिए; और बाहर की ओर, उस समाज के लिए जिससे होकर वह गुजरता है।

1. आंतरिक यात्रा — व्यक्ति के लिए2. बाह्य यात्रा — समाज के लिए
यह क्या हैवह यात्रा जो “न केवल शारीरिक और भौतिक, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा भी है” और जिसके लिए विशिष्ट आचार-व्यवहार आवश्यक हैसंपूर्ण उपमहाद्वीप में लोगों, वस्तुओं और विचारों का आवागमन
यह क्या देती हैव्यक्तिगत एवं आध्यात्मिक विकास — सामान्य जीवन से उच्च, आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश, जो ‘तीर्थ’ शब्द का ही अर्थ हैसामाजिक-आर्थिक उद्देश्य : व्यापार का विस्तार और अखिल भारतीय सांस्कृतिक एकीकरण
अध्याय में प्रमाणसबरीमाला की कठिन चढ़ाई, जो आंतरिक मार्ग की कठिनाइयों का प्रतीक है; पंढरपुर की इक्कीस दिन की वारी; धर्मपाल के उस दल का अनुशासन, जो दिल्ली में भी नहीं रुकातीर्थयात्रा और व्यापार मार्गों का मिल जाना; व्यापारियों का तीर्थयात्री भी होना; यात्रियों का अनेक भाषाओं, रीतियों, वस्त्रों और भोजन तथा उनकी समरूपता का अनुभव
परिणामएक बदला हुआ व्यक्तिएक जुड़ा हुआ देश — नेहरू के शब्दों में, “एक देश और एक संस्कृति की भावना”
दोनों अलग क्यों नहीं हो सकते: तीर्थयात्री केवल पहले कारण से निकलता है। दूसरा अपने आप घटित होता है, केवल इसलिए कि इतने लोग इतनी दूर तक इतने लंबे समय तक चलते हैं। इसी प्रकार श्रद्धा का एक निजी कार्य, तीन हजार वर्षों तक करोड़ों लोगों द्वारा दोहराए जाने पर, एक पूरे उपमहाद्वीप को आपस में बुन गया।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ