व्यंग्य-चित्र को धीरे-धीरे पढ़िए — चित्रकार ने पूरा तर्क छोटे-छोटे विवरणों में छिपा रखा है।
आप क्या देख रहे हैं
- यह कक्ष एक विधायिका के रूप में बना है — छोटी-छोटी मेजों की पंक्तियाँ, उन पर बैठे निर्वाचित सदस्य, और चारों ओर दर्शक-दीर्घा।
- इन मेजों के ऊपर ऊँचे हैट और औपचारिक कोट पहने विशाल आकृतियाँ खड़ी हैं, जिनके शरीर बड़े-बड़े धन की थैलियों के रूप में बने हैं। हर थैली पर किसी उद्योग का नाम लिखा है — कोयला, चीनी, टिन, लोहा, स्टैंडर्ड ऑयल, ताँबा, स्टील बीम, कील, कागज की थैली, नमक के व्यापारिक एकाधिकार (ट्रस्ट)।
- निर्वाचित सदस्य बहुत छोटे दिख रहे हैं, मेजों पर झुके हुए, कुछ आपस में फुसफुसाते हुए, कोई भी इन विशाल आकृतियों को संबोधित नहीं कर रहा। आकार का यही अंतर पूरा संदेश है।
- पिछली दीवार पर एक पट्टी लगी है — ‘यह एकाधिकारियों की, एकाधिकारियों द्वारा और एकाधिकारियों के लिए सीनेट है' — जो पृष्ठ 189 पर उद्धृत अब्राहम लिंकन की प्रसिद्ध परिभाषा का उपहासपूर्ण रूपांतर है।
- दाईं ओर एक चौड़ा द्वार खुला है, जिस पर लिखा है ‘एकाधिकारियों के लिए प्रवेश'।
चित्र के ऊपर बाईं ओर
दर्शक-दीर्घा का एक छोटा द्वार है जिस पर लिखा है ‘जनता का प्रवेश द्वार' — और उस पर एक तख्ती टँगी है जिस पर लिखा है ‘बंद'। साधारण नागरिकों के लिए बना द्वार बंद है, जबकि एकाधिकारियों के लिए बना द्वार पूरा खुला है।
निर्णय कौन ले रहा है?
निर्वाचित सदस्य नहीं। निर्णय बड़े व्यापारिक घरानों के मालिक ले रहे हैं — कुछ अत्यंत धनी लोग, जिन्हें किसी ने नहीं चुना। निर्वाचित प्रतिनिधि उपस्थित तो हैं, पर स्पष्ट रूप से शक्तिहीन हैं। यही अल्पतंत्र की परिभाषा है — कुछ शक्तिशाली लोग या परिवार, जो सारे महत्वपूर्ण निर्णय लेते हैं।