कक्षा ७ सामाजिक विज्ञान अध्याय 9 आइए पता लगाएँ के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-19

प्र1.
पिछले पृष्ठ पर दिए गए चित्र 9.13 को ध्यान से देखिए। यह चित्र 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अमेरिका की एक निर्वाचित संस्था को दर्शाता है। चित्र में दिखाए गए सभी लोग निर्वाचित प्रतिनिधि हैं। आप क्या देख रहे हैं? चित्र के ऊपर बाईं ओर क्या दिख रहा है? आपके अनुसार इस निर्वाचित संस्था में निर्णय कौन ले रहा है?

चित्र 9.13 में क्या है — पक (Puck) पत्रिका, 1889 का एक श्वेत-श्याम व्यंग्य-चित्र (ऊपर बीच में PUCK छपा है):

  • दृश्य संयुक्त राज्य अमेरिका की सीनेट का सदन है। आगे के भाग में लकड़ी की गोलाकार मेज़ों की पंक्तियाँ हैं, जिन पर निर्वाचित सदस्य बैठे हैं — साधारण कद-काठी के, काले सूट पहने; कोई लिख रहा है, कोई कागज़ों पर झुका है, कोई पड़ोसी से बात कर रहा है। कोई भी ऊपर नहीं देख रहा।
  • उनके पीछे, सदन की चौड़ाई में फैली ऊँची दीर्घा पर विशालकाय, मोटे आकार खड़े हैं। हर एक का शरीर रुपयों की एक विशाल थैली है और सिर छोटा, जिस पर ऊँची टोपी या गोल हैट है; कुछ के हाथ में छड़ी है, एक के पेट पर डॉलर का चिह्न ($) बना है। वे रेलिंग पर झुककर नीचे बैठे लोगों को देख रहे हैं।
  • हर थैली पर एक नाम लिखा है। बाईं ओर से : SALT TRUST, ENVELOPE TRUST, PAPER BAG TRUST, COAL, TIN TRUST, SUGAR TRUST, IRON TRUST, STANDARD OIL TRUST, COPPER TRUST, STEEL BEAM TRUST, NAIL TRUST और सबसे दाहिने किनारे पर एक और स्टील ट्रस्ट।
  • ऊपर बाईं ओर दीवार में एक छोटा दरवाज़ा है। उसके ऊपर लिखा है “PEOPLES’ ENTRANCE” (जनता का प्रवेश-द्वार), और दरवाज़े पर आड़ा टँगा एक तख़्ता कहता है “CLOSED” (बंद)।
  • ऊपर दाईं ओर एक ऊँचा खुला दरवाज़ा है, जिस पर लिखा है “ENTRANCE FOR MONOPOLISTS” (एकाधिकारियों का प्रवेश-द्वार); काले कोट, ऊँची टोपी और छड़ी वाला एक भारी-भरकम व्यक्ति अभी-अभी उससे भीतर आया है।
  • दोनों दरवाज़ों के बीच पिछली दीवार पर एक लंबा बैनर तना है, जिस पर लिखा है : “THIS IS A SENATE OF THE MONOPOLISTS, BY THE MONOPOLISTS AND FOR THE MONOPOLISTS!”
चित्र 9.13, पृष्ठ 204 — “अल्पतंत्रीय स्थिति को दर्शाता हुआ 1889 का एक व्यंग्य-चित्र”। यह एक मुद्रित व्यंग्य-चित्र है, जिसका यहाँ वर्णन किया गया है; मूल चित्र के लिए पाठ्यपुस्तक देखिए।
उत्तर

व्यंग्य-चित्र को धीरे-धीरे पढ़िए — चित्रकार ने पूरा तर्क छोटे-छोटे विवरणों में छिपा रखा है।

आप क्या देख रहे हैं

  • यह कक्ष एक विधायिका के रूप में बना है — छोटी-छोटी मेजों की पंक्तियाँ, उन पर बैठे निर्वाचित सदस्य, और चारों ओर दर्शक-दीर्घा।
  • इन मेजों के ऊपर ऊँचे हैट और औपचारिक कोट पहने विशाल आकृतियाँ खड़ी हैं, जिनके शरीर बड़े-बड़े धन की थैलियों के रूप में बने हैं। हर थैली पर किसी उद्योग का नाम लिखा है — कोयला, चीनी, टिन, लोहा, स्टैंडर्ड ऑयल, ताँबा, स्टील बीम, कील, कागज की थैली, नमक के व्यापारिक एकाधिकार (ट्रस्ट)।
  • निर्वाचित सदस्य बहुत छोटे दिख रहे हैं, मेजों पर झुके हुए, कुछ आपस में फुसफुसाते हुए, कोई भी इन विशाल आकृतियों को संबोधित नहीं कर रहा। आकार का यही अंतर पूरा संदेश है।
  • पिछली दीवार पर एक पट्टी लगी है — ‘यह एकाधिकारियों की, एकाधिकारियों द्वारा और एकाधिकारियों के लिए सीनेट है' — जो पृष्ठ 189 पर उद्धृत अब्राहम लिंकन की प्रसिद्ध परिभाषा का उपहासपूर्ण रूपांतर है।
  • दाईं ओर एक चौड़ा द्वार खुला है, जिस पर लिखा है ‘एकाधिकारियों के लिए प्रवेश'।

चित्र के ऊपर बाईं ओर

दर्शक-दीर्घा का एक छोटा द्वार है जिस पर लिखा है ‘जनता का प्रवेश द्वार' — और उस पर एक तख्ती टँगी है जिस पर लिखा है ‘बंद'। साधारण नागरिकों के लिए बना द्वार बंद है, जबकि एकाधिकारियों के लिए बना द्वार पूरा खुला है।

निर्णय कौन ले रहा है?

निर्वाचित सदस्य नहीं। निर्णय बड़े व्यापारिक घरानों के मालिक ले रहे हैं — कुछ अत्यंत धनी लोग, जिन्हें किसी ने नहीं चुना। निर्वाचित प्रतिनिधि उपस्थित तो हैं, पर स्पष्ट रूप से शक्तिहीन हैं। यही अल्पतंत्र की परिभाषा है — कुछ शक्तिशाली लोग या परिवार, जो सारे महत्वपूर्ण निर्णय लेते हैं।

यह व्यंग्य-चित्र आज भी क्यों महत्वपूर्ण है: यहाँ बाहरी रूप पूरी तरह लोकतांत्रिक है — सदन है, चुनाव हैं, सदस्य हैं। फिर भी सार अल्पतंत्रीय है। चित्र चेतावनी देता है कि किसी सरकार को केवल उसके रूप से नहीं आँका जा सकता; यह पूछना पड़ता है कि निर्णय वास्तव में कौन ले रहा है। अध्याय भी यही कहता है कि कुछ लोकतंत्रों में अल्पतंत्र के लक्षण दिखाई देते हैं।
क्या आप जानते हैं? यह जोसेफ केप्लर का प्रसिद्ध चित्र ‘द बॉसेज ऑफ द सीनेट' है, जो 1889 में अमेरिकी पत्रिका पक में छपा था — चित्र के शीर्ष पर ‘PUCK' लिखा दिखता है। ऐसे व्यंग्य-चित्रों ने एकाधिकारों के विरुद्ध कानून बनवाने में जनमत तैयार किया।
प्र2.
लोकतंत्र क्या अल्पतंत्र में बदल सकता है? लोकतंत्र को सशक्त रखने के लिए लोग क्या कर सकते हैं?
उत्तर

हाँ, बदल सकता है — किसी घोषणा से नहीं, बल्कि भीतर से धीरे-धीरे खोखला होकर। अध्याय कहता है कि कुछ राजनीतिक टिप्पणीकारों के अनुसार आधुनिक समय में कुछ लोकतंत्रों में यह देखा गया है कि कुछ शक्तिशाली राजनेता और बड़े व्यापारिक घराने शासन पर अत्यधिक प्रभाव रखते हैं।

यह फिसलन कैसे होती है

चेतावनी का संकेतयह कैसा दिखता है
किसकी बात सुनी जाएगी, यह धन तय करने लगेकेवल अत्यंत धनी लोग चुनाव लड़ पाएँ, जिससे मतदाता के सामने विकल्प सिमट जाएँ
संस्थाएँ स्वतंत्रता खो देंन्यायपालिका की स्वतंत्रता का क्षरण, जिससे शक्तिशाली लोगों पर कोई अंकुश न रहे
सूचना पर नियंत्रणसूचना माध्यमों का दुरुपयोग, जिससे मतदाता गलत चित्र के आधार पर निर्णय लें
भ्रष्टाचार सामान्य बन जाएनिर्णयों पर बहस के बजाय सौदे होने लगें
नागरिक भाग लेना छोड़ देंकम मतदान और चुप्पी मैदान कुछ लोगों के लिए खाली छोड़ देती है

लोग क्या कर सकते हैं

  • हर बार मतदान करें। अधिक मतदान सबसे सस्ता बचाव है; इससे साधारण मतदाता की उपेक्षा महँगी पड़ती है।
  • प्रश्न पूछें और कानून का प्रयोग करें। सूचना का अधिकार अधिनियम किसी भी नागरिक को यह पूछने देता है कि निर्णय कैसे लिया गया और सार्वजनिक धन कहाँ गया।
  • स्वतंत्र संस्थाओं की रक्षा करें — न्यायालय, निर्वाचन आयोग, लेखा परीक्षक, स्वतंत्र समाचार माध्यम। ये शक्ति पर अंकुश के लिए ही बने हैं, चाहे शक्ति किसी के भी पास हो।
  • मानने से पहले जाँचें। समाचार की पुष्टि कीजिए, स्रोत मिलाइए, और जिसकी पुष्टि न हो उसे आगे मत भेजिए।
  • स्थानीय स्तर पर भाग लें — ग्राम सभा, निवासी कल्याण संघ, विद्यालय समिति। लोकतंत्र की आदत घर के पास ही बनती है।
  • व्यवस्था को समझें। जो नागरिक अपने अधिकार जानते हैं, उन्हें किनारे करना कहीं कठिन होता है।
सजगता ही उत्तर क्यों है: लोकतंत्र में शक्ति सरकार को केवल उधार दी जाती है और हर चुनाव में यह उधार नए सिरे से तय होता है। अल्पतंत्र तब पनपता है जब नागरिक यह उधार वापस माँगना बंद कर देते हैं। इसलिए लोकतंत्र को सशक्त रखना मतदान के दिन का एक काम नहीं — यह वह है जो लोग दो चुनावों के बीच करते हैं।
क्या यह उपयोगी रहा?