प्र1.
यदि कोई राजा स्वयं को ईश्वरीय शक्तियों से युक्त मानने लगे, तो क्या हो सकता है? वह अपनी प्रजा पर किस प्रकार शासन करेगा?
उत्तर
वह ऐसे शासन करेगा मानो उसे किसी को उत्तर न देना हो — प्रश्न इसी खतरे की ओर संकेत करता है।
संभावित परिणाम
- उसका वचन ही कानून बन जाएगा। वह स्वयं कानून बनाएगा, लागू कराएगा और दंड भी निर्धारित करेगा — अध्याय बताता है कि विश्व के कुछ भागों में ठीक यही हुआ, जहाँ राजाओं ने ईश्वर से दिव्य शक्ति प्राप्त होने का दावा किया।
- उससे प्रश्न करना धर्म-विरुद्ध माना जाने लगेगा, केवल राज्य-विरुद्ध नहीं। मंत्री, विद्वान और साधारण लोग सच्ची सलाह देना बंद कर देंगे।
- सुधार असंभव हो जाएगा। यदि ईश्वर-तुल्य राजा गलत हो ही नहीं सकता, तो गलत निर्णय बदला नहीं जा सकता और कोई न्यायालय उसे रोक नहीं सकता।
- शासन प्रजा को अधीन करने में बदल सकता है — यह शब्द अध्याय ने स्वयं उन राजाओं के लिए प्रयोग किया है जिन्होंने शक्ति का प्रयोग जनता को अपने अधीन करने के लिए किया।
- उत्तराधिकार के झगड़े हिंसक हो जाएँगे, क्योंकि सिंहासन के साथ राजनीतिक शक्ति ही नहीं, पवित्र अधिकार भी जुड़ जाता है।
भारतीय परंपरा दूसरी दिशा में क्यों जाती है: भारत के कई क्षेत्रों में राजा की शक्ति न तो निरंकुश थी और न ही आलोचना से मुक्त। उससे अपेक्षा थी कि वह राजधर्म की सीमाओं में रहकर निर्णय ले — धर्म के अनुसार शासन करे और सभी के कल्याण को सर्वोपरि रखे। शांतिपर्व में भीष्म युधिष्ठिर को बताते हैं कि प्रजा का कल्याण राजा की सबसे बड़ी प्राथमिकता है, उसे कानून निष्पक्ष रूप से लागू करने चाहिए, सत्ता से आसक्त नहीं होना चाहिए क्योंकि इससे अहंकार और भ्रष्टाचार जन्म लेते हैं, विद्वान सलाहकारों की सलाह अवश्य लेनी चाहिए, और यह समझना चाहिए कि उसकी सत्ता अस्थायी है तथा धर्म के बंधन से बँधी है। जो राजा स्वयं को ईश्वर मान ले, वह इन पाँचों सीमाओं को एक साथ तोड़ देता है।
अध्याय का विपरीत उदाहरण: कश्मीर के राजा चंद्रापीड मंदिर बनवाना चाहते थे, पर उस स्थान पर एक मोची की झोंपड़ी थी। झोंपड़ी गिराने के बजाय राजा ने अपने ही शिल्पकारों को दोषी ठहराया कि उन्होंने पहले अनुमति क्यों नहीं ली, स्वयं मोची के पास गए, सम्मानपूर्वक अनुरोध किया और उचित धनराशि दी। प्रसंग का निष्कर्ष है — ‘जो लोग सुख की कामना करते हैं, उन्हें झूठे अहंकार को त्याग देना चाहिए।' यह राजा धर्म के सेवक की तरह व्यवहार कर रहा है — उस राजा के ठीक विपरीत जो स्वयं को ईश्वर समझता है।
ध्यान दें: यही विचार आधुनिक शासन में भी जीवित है। ‘कोई कानून से ऊपर नहीं' और ‘कानून के समक्ष समानता' राजधर्म के ही संवैधानिक रूप हैं — ऐसी सीमाएँ जो शासक पर भी लागू होती हैं।