अन्वेषण अध्याय 9 प्रश्न एवं क्रियाकलाप

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
आपने अध्याय में किस-किस प्रकार की सरकारों के बारे में पढ़ा? उनके नाम लिखिए।
उत्तर

अध्याय में नौ नामित स्वरूप आते हैं, जो दो वर्गों में बँटे हैं।

क. लोकतांत्रिक सरकारें

  1. प्रत्यक्ष लोकतंत्र
  2. प्रतिनिधि लोकतंत्र
    • संसदीय लोकतंत्र
    • अध्यक्षीय शासन प्रणाली

ख. अन्य प्रकार की सरकारें

  1. राजतंत्र
    • निरंकुश राजतंत्र
    • संवैधानिक राजतंत्र
  2. धर्मतंत्र
  3. अधिनायकतंत्र
  4. अल्पतंत्र

अध्याय गणराज्य को भी परिभाषित करता है — वह शासन व्यवस्था जिसमें राज्य का प्रमुख निर्वाचित होता है, वंशानुगत राजा या रानी नहीं — और वज्जि महाजनपद, चोलकालीन ग्राम सभा तथा रोम व ग्रीस के प्रारंभिक गणराज्यों का वर्णन करता है।

ध्यान दें: यदि प्रश्न केवल ‘सरकार के प्रकार' पूछे तो छह नाम पर्याप्त हैं — प्रत्यक्ष लोकतंत्र, प्रतिनिधि लोकतंत्र, राजतंत्र, धर्मतंत्र, अधिनायकतंत्र, अल्पतंत्र। ‘किस-किस प्रकार' पूछे जाने पर उपप्रकार भी जोड़िए।
प्र2.
भारत में किस प्रकार की सरकार है और उसे ऐसा क्यों कहा जाता है?
उत्तर

भारत में संसदीय लोकतंत्र है — पूरी तरह कहें तो लोकतांत्रिक, प्रतिनिधि, संसदीय शासन प्रणाली, और भारत एक गणराज्य भी है।

विशेषणभारत को ऐसा क्यों कहा जाता है
लोकतंत्रसत्ता का स्रोत जनता है। प्रत्येक वयस्क नागरिक सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से मतदान करता है, जो भारत में गणराज्य बनने के साथ 1950 से ही है।
प्रतिनिधिजनता सीधे शासन नहीं करती; वह प्रतिनिधि चुनती है जो शासन करते हैं, और सरकार सदैव जनता के प्रति उत्तरदायी रहती है। आम चुनाव प्रत्येक पाँच वर्ष में होते हैं।
संसदीयकार्यपालिका के सदस्य विधायिका का भी भाग होते हैं — प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद संसद के सदस्य भी होते हैं। मंत्रिपरिषद तभी तक कार्य करती है जब तक उसे लोक सभा का विश्वास प्राप्त रहता है। जनता विधायिका चुनती है, कार्यपालिका नहीं; विधायिका के कुछ चयनित सदस्य ही मंत्री बनते हैं।
गणराज्यहमारे राष्ट्राध्यक्ष, राष्ट्रपति, निर्वाचित होते हैं, वंशानुगत राजा नहीं।

तालिका 9.1 भारत को एक पंक्ति में समेट देती है — कार्यपालिका : प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद; विधायिका : निम्न सदन (लोक सभा) उच्च सदन (राज्य सभा) से अधिक शक्तिशाली; न्यायपालिका : कार्यपालिका एवं विधायिका से स्वतंत्र (शक्तियों का पृथक्करण)।

निर्णायक कसौटी: पूछिए — ‘क्या विधायिका कार्यपालिका को हटा सकती है?' भारत में हाँ — लोक सभा का विश्वास समाप्त होते ही मंत्रिपरिषद को जाना पड़ता है। अमेरिका जैसे अध्यक्षीय लोकतंत्र में नहीं, क्योंकि वहाँ राष्ट्राध्यक्ष जनता द्वारा अलग से चुना जाता है। यही एक कसौटी भारत को संसदीय बनाती है, अध्यक्षीय नहीं।
प्र3.
आपने पढ़ा कि सभी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में स्वतंत्र न्यायपालिका होती है। न्यायपालिका का स्वतंत्र होना क्यों आवश्यक है? कोई तीन कारण बताइए।
उत्तर

तीन कारण, तीनों सीधे अध्याय से।

  1. प्रत्येक नागरिक के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए। समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शोषण के विरुद्ध अधिकार तभी अर्थ रखते हैं जब कोई उन्हें लागू करा सके। अध्याय स्पष्ट कहता है कि स्वतंत्र न्यायपालिका यह सुनिश्चित करती है कि प्रत्येक नागरिक के मौलिक अधिकारों की रक्षा हो। दबाव में आने वाली न्यायपालिका केवल शक्तिशाली की रक्षा करेगी।
  2. ताकि कानून सरकार पर भी लागू हो। न्यायपालिका सुनिश्चित करती है कि कानूनों का पालन नागरिकों के साथ-साथ सरकार के सभी अंग भी करें। यदि न्यायाधीश उन्हीं मंत्रियों पर निर्भर हों जिनके कार्यों पर उन्हें निर्णय देना है, तो किसी मंत्री को कभी कानून के दायरे में नहीं लाया जा सकेगा — और ‘कानून के समक्ष समानता' केवल नारा रह जाएगी।
  3. शक्तियों का पृथक्करण वास्तविक बनाए रखने के लिए। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को स्वतंत्र रूप से कार्य करना है और एक-दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करना है। न्यायपालिका इसी व्यवस्था की निर्णायक है; यदि निर्णायक स्वयं किसी एक पक्ष का हो जाए तो पूरी संरचना ढह जाती है और सत्ता एक ही अंग की ओर सरकने लगती है — यही अधिनायकतंत्र में होता है।

चौथा कारण, यदि चाहिए: साधारण नागरिक को जाने के लिए एक स्थान मिलता है। जो व्यक्ति न चुनाव जीत सकता है, न प्रभाव खरीद सकता है, वह भी मुकदमा दायर कर सकता है। इसीलिए अध्याय ‘न्यायपालिका की स्वतंत्रता का क्षरण' को लोकतंत्र की गंभीर बाधाओं में गिनता है।

ध्यान दें: उत्तर लिखते समय हर कारण के बाद एक पंक्ति परिणाम की जोड़िए — ‘यदि न्यायपालिका स्वतंत्र न होती तो …'। इससे सूची तर्क बन जाती है।
प्र4.
क्या आपको लगता है कि लोकतांत्रिक सरकार अन्य शासन प्रणालियों से बेहतर है? क्यों?
उत्तर

हाँ — और तर्क अध्याय स्वयं देता है। अधिकतर देशों में लोकतंत्र को अधिक उपयुक्त माना जाता है और विश्व के आधे से अधिक देशों ने इसे अपनाया है। चार बिंदुओं में कारण देखिए।

  1. निर्णय में सबकी हिस्सेदारी। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार हर वयस्क को एक मत देता है, इसलिए सरकार सबके द्वारा चुनी जाती है — जन्म, धन या बल से नहीं।
  2. अधिकार और स्वतंत्रता कृपा नहीं, गारंटी हैं। लोग तय कर सकते हैं कि क्या बोलें, क्या पहनें, किस विश्वास को मानें और अपनी अभिव्यक्ति कैसे करें — इस उचित सीमा के साथ कि यह किसी और के अधिकार को क्षति न पहुँचाए — और मौलिक अधिकारों की रक्षा स्वतंत्र न्यायपालिका करती है।
  3. सत्ता शांतिपूर्वक बदली जा सकती है। यदि सरकार अपने दायित्व नहीं निभाती तो लोग चुनावों से प्रतिनिधि बदल देते हैं। राजतंत्र में राजा की मृत्यु की प्रतीक्षा करनी होती है; अधिनायकतंत्र में शायद कोई रास्ता ही न हो।
  4. गलतियाँ सुधारी जा सकती हैं। बहस, स्वतंत्र समाचार माध्यम, न्यायालय और चुनाव — ये सब गलती पकड़ने के साधन हैं। जिन व्यवस्थाओं में ये नहीं, उनमें सुधार का कोई तंत्र नहीं।
ईमानदार शर्त: लोकतंत्र बनावट में बेहतर है, व्यवहार में अपने आप बेहतर नहीं हो जाता। अध्याय वास्तविक समस्याएँ गिनाता है — भ्रष्टाचार, आर्थिक विषमता, कुछ लोगों का अत्यधिक नियंत्रण, न्यायपालिका की स्वतंत्रता का क्षरण, सूचना माध्यमों का दुरुपयोग। वह यह भी बताता है कि निरंकुश राजतंत्र में भी कोई अच्छा राजा प्रजा के कल्याण के लिए काम कर सकता है, जैसा राजधर्म अपेक्षा करता था। इसलिए सबसे सशक्त उत्तर यह है — लोकतंत्र ही एकमात्र ऐसी व्यवस्था है जो सुशासन को शासक की कृपा नहीं, जनता का उत्तरदायित्व बनाती है — और इसीलिए वह सजग नागरिक भी माँगता है।
प्र5.
नीचे कुछ देशों की शासन पद्धतियों से जुड़ी गतिविधियाँ दी गई हैं। क्या आप इनका मिलान संबंधित शासन प्रणाली से कर सकते हैं?
उत्तर

प्रत्येक प्रथा का मिलान उस शासन प्रणाली से कीजिए जिसका वह वर्णन करती है।

क्र. सं.देश में प्रचलित प्रथाशासन प्रणालीक्यों
1.सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समान रूप से देखा जाता है।लोकतंत्रकानून के समक्ष समानता लोकतंत्र का मूलभूत सिद्धांत है
2.सरकार प्रत्येक निर्णय के लिए धार्मिक नेताओं से परामर्श करती है।धर्मतंत्रयहाँ शासन धार्मिक नियमों और धार्मिक नेताओं के अनुसार होता है
3.शासक की मृत्यु के बाद उसका पुत्र राजा बनता है।राजतंत्रराजतंत्र सामान्यतः वंशानुगत होता है — प्रायः राजा का ज्येष्ठ पुत्र ही भावी राजा होता है
4.शासक किसी प्रकार के संविधान का अनुपालन करने के लिए बाध्य नहीं है। वह सभी निर्णय अपनी इच्छा के अनुसार लेता है।अधिनायकतंत्रएक व्यक्ति के पास संपूर्ण सत्ता और संविधान या कानून का कोई नियंत्रण नहीं

संक्षेप में उत्तर: 1 → लोकतंत्र, 2 → धर्मतंत्र, 3 → राजतंत्र, 4 → अधिनायकतंत्र।

ध्यान दें: तालिका के दाएँ स्तंभ में विकल्प भिन्न क्रम में छपे हैं (अधिनायकतंत्र, राजतंत्र, लोकतंत्र, धर्मतंत्र), ताकि आप पंक्ति-दर-पंक्ति मिलान न कर सकें। पहले प्रथा पढ़िए, स्वयं शासन प्रणाली का नाम सोचिए, और तब उसे दाएँ स्तंभ में ढूँढ़िए।
प्र6.
नीचे कुछ देशों के नाम दिए गए हैं। पता लगाइए कि इनमें कौन-सी शासन व्यवस्था प्रचलित है—
उत्तर

यह ‘पता लगाइए' वाला प्रश्न है, इसलिए किसी विश्वसनीय और अद्यतन स्रोत से जाँचिए — एटलस, उस देश की आधिकारिक वेबसाइट, या विदेश मंत्रालय के देश-पृष्ठ। नीचे उत्तर, हर एक के कारण सहित।

क्र. सं.देशशासन प्रणालीऐसा क्यों कहा जाता है
1.भूटानलोकतांत्रिक संवैधानिक राजतंत्र (संसदीय)2008 के संविधान के अंतर्गत वंशानुगत राजा (द्रुक ग्यालपो) राष्ट्राध्यक्ष हैं, जबकि निर्वाचित संसद कानून बनाती है और प्रधानमंत्री सरकार का नेतृत्व करते हैं
2.नेपालसंघीय लोकतांत्रिक गणराज्य (संसदीय लोकतंत्र)2008 में राजतंत्र समाप्त हुआ; अब राष्ट्राध्यक्ष निर्वाचित राष्ट्रपति हैं और प्रधानमंत्री सरकार का नेतृत्व करते हैं। अध्याय की अपनी तालिका में भी नेपाल में लोकतंत्र की स्थापना का वर्ष 2008 दिया गया है
3.बांग्लादेशसंसदीय लोकतंत्र (गणराज्य)निर्वाचित संसद (जातीय संसद), सरकार के प्रमुख प्रधानमंत्री और राष्ट्राध्यक्ष राष्ट्रपति
4.दक्षिण अफ्रीकासंसदीय गणराज्य (लोकतंत्र)नागरिक राष्ट्रीय सभा चुनते हैं और वही राष्ट्रपति का चुनाव करती है — जो राष्ट्राध्यक्ष और सरकार के प्रमुख, दोनों होते हैं
5.ब्राजीलअध्यक्षीय लोकतंत्र (संघीय गणराज्य)राष्ट्रपति जनता द्वारा सीधे चुने जाते हैं और दो सदनों वाली राष्ट्रीय कांग्रेस से स्वतंत्र कार्य करते हैं
यह सूची क्या सिखाती है: पाँच में से चार लोकतंत्र हैं, फिर भी किन्हीं दो की बनावट एक जैसी नहीं। भूटान ने राजा रखा है; नेपाल ने राजतंत्र हटाया; दक्षिण अफ्रीका का राष्ट्रपति विधायिका से आता है; ब्राजील का सीधे मतदाताओं से। यही अध्याय की बात है — लोकतंत्र के अनेक स्वरूप होते हैं, जो हर देश के अपने इतिहास से बनते हैं।
स्वयं जाँचिए: शासन प्रणालियाँ बदलती भी हैं। 2008 से पहले नेपाल की प्रविष्टि ‘राजतंत्र' होती। जिस स्रोत का उपयोग करें, उसका वर्ष अवश्य देख लीजिए।
प्र7.
लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में लोकतंत्र के आदर्शों और मूल्यों को प्राप्त करने में कौन-कौन सी बाधाएँ आ सकती हैं? उन्हें कैसे दूर किया जा सकता है?
उत्तर

अध्याय पाँच बाधाएँ गिनाता है और कहता है कि ‘और भी कई' हैं। हर एक को लीजिए, बताइए कि वह क्या नुकसान करती है, और उपाय दीजिए।

बाधायह किसे क्षति पहुँचाती हैइसे कैसे दूर किया जा सकता है
भ्रष्टाचारसमानता को — निर्णय योग्यता के आधार पर लेने के बजाय बिक जाते हैंसूचना का अधिकार जैसे पारदर्शिता कानून; स्वतंत्र लेखा परीक्षक; बिचौलियों को हटाने वाला ई-गवर्नेंस; पद देखे बिना दंड
आर्थिक विषमताशिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय तक समान पहुँच को — निर्धन उन अधिकारों का उपयोग नहीं कर पाता जिनका खर्च वह नहीं उठा सकतानिःशुल्क और अच्छी सार्वजनिक शिक्षा व स्वास्थ्य सेवा; कल्याण और रोजगार योजनाएँ; न्यायसंगत कर; निःशुल्क विधिक सहायता
लोकतांत्रिक संस्थाओं पर कुछ लोगों का अत्यधिक नियंत्रणप्रतिनिधित्व को — लोकतंत्र अल्पतंत्र जैसा दिखने लगता हैपारदर्शी राजनीतिक चंदा; सशक्त निर्वाचन आयोग; समाचार माध्यमों और व्यापार में शक्ति के केंद्रीकरण पर सीमा; अधिक मतदान
न्यायपालिका की स्वतंत्रता का क्षरणमौलिक अधिकारों की रक्षा और शक्तियों के पृथक्करण कोन्यायाधीशों की नियुक्ति की स्पष्ट और खुली प्रक्रिया; पर्याप्त न्यायालय और न्यायाधीश; स्वयं सरकार द्वारा न्यायालय के आदेशों का सम्मान
सूचना माध्यमों का दुरुपयोगचयन की स्वतंत्रता को — गलत चित्र के आधार पर मतदाता सही चुनाव नहीं कर सकतास्वतंत्र और विविध समाचार माध्यम; विद्यालयों में मीडिया साक्षरता; तथ्य-जाँच; जानबूझकर फैलाए गए झूठ पर रोक, पर सेंसरशिप के बिना
नागरिकों की उदासीनता और कम भागीदारीपूरी व्यवस्था को, क्योंकि सत्ता उन्हीं के पास चली जाती है जो सामने आते हैंमतदाता जागरूकता अभियान; सरल पंजीकरण और मतदान; नागरिक शिक्षा; स्थानीय निकायों में भागीदारी
सभी उपायों के पीछे एक ही विचार: इनमें से हर उपाय या तो नागरिकों तक सूचना पहुँचाता है या किसी संस्था को स्वतंत्र रखता है। यही दो चीजें लोकतंत्र को स्वयं को सुधारने योग्य बनाती हैं। अध्याय का अंतिम प्रश्न — हम एक व्यक्ति और समाज के रूप में सजग रहकर क्या कर सकते हैं — आपसे यही देखने को कह रहा है।
प्र8.
लोकतंत्र, राजतंत्र और अधिनायकतंत्र से किस प्रकार भिन्न है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

तीनों को उन्हीं चार प्रश्नों पर साथ-साथ रखिए, जिनसे अध्याय सरकारों को अलग करता है।

तुलना का बिंदुलोकतंत्रराजतंत्रअधिनायकतंत्र
सत्ता का स्रोतदेश की जनताजन्म और उत्तराधिकार; कभी-कभी दिव्य शक्ति का दावाएक व्यक्ति या छोटे समूह द्वारा अर्जित और बनाए रखी गई सत्ता
सरकार का गठनसार्वभौमिक वयस्क मताधिकार पर आधारित, नियमित और निश्चित अंतराल पर चुनाववंशानुगत उत्तराधिकार — प्रायः राजा का ज्येष्ठ पुत्रसत्ता पर अधिकार; विपक्ष को समाप्त करने वाले कानून, जैसे हिटलर ने 1933 में बनाए
शासक पर नियंत्रणलिखित संविधान, विधायिका और स्वतंत्र न्यायपालिकानिरंकुश राजतंत्र में कानूनी रूप से कोई नहीं (यद्यपि भारत में राजधर्म नैतिक सीमा था); संवैधानिक राजतंत्र में संसद और संविधानकोई नहीं — संविधान या कानून का कोई नियंत्रण नहीं
तीनों कार्यविधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका पृथक और स्वतंत्रतीनों राजा के पास हो सकते हैं — वह कानून बनाता, लागू कराता और दंड भी तय करता हैव्यवहार में तीनों शासक के नियंत्रण में
नागरिकों के अधिकारमौलिक अधिकार, कानून के समक्ष समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता — न्यायालय द्वारा संरक्षितप्रजा प्रार्थना कर सकती है; क्या मिलेगा, यह शासक पर निर्भरअत्यंत सीमित — जैसे शेन की कहानी में बाल और कपड़े तक सरकार तय करती है
सरकार बदलनाशांतिपूर्वक, अगले चुनाव में मतदान सेकेवल शासक की मृत्यु या पदत्याग परप्रायः भीतर से संभव ही नहीं
उत्तरदायित्वसरकार जनता के प्रति जवाबदेहशासक परंपरा, धर्म और अपने विवेक के प्रतिशासक किसी के प्रति नहीं

एक वाक्य में: लोकतंत्र में सत्ता जनता द्वारा उधार दी जाती है और चुनावों में वापस ली जाती है; राजतंत्र में वह विरासत में मिलती है; अधिनायकतंत्र में वह अर्जित करके बनाए रखी जाती है

सावधानी: ‘राजतंत्र' अपने आप लोकतंत्र का विरोधी नहीं है। ब्रिटेन एक ही समय में राजतंत्र भी है और संसदीय लोकतंत्र भी, क्योंकि वहाँ राजा के पास केवल औपचारिक शक्ति है। इस प्रश्न में वास्तविक तुलना निरंकुश राजतंत्र से है।
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