दीपकम् अध्याय 1 वयम् अभ्यासं कुर्मः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
पवित्राः नद्यः काः ?
उत्तर

गङ्गा, यमुना, सरस्वती, सिन्धुः, ब्रह्मपुत्रः, गण्डकी, महानदी, नर्मदा, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी इत्यादयः पवित्राः नद्यः सन्ति।

(हिन्दी — गङ्गा, यमुना, सरस्वती, सिन्धु, ब्रह्मपुत्र, गण्डकी, महानदी, नर्मदा, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी आदि पवित्र नदियाँ हैं।)

आधारवाक्यम्: “अत्रैव गङ्गा, यमुना, सरस्वती, सिन्धुः, ब्रह्मपुत्रः, गण्डकी, महानदी, नर्मदा, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी इत्यादयः पवित्राः नद्यः प्रवहन्ति। नद्यः अपि अस्माकं मातरः इव।” — इसीलिए भारत में नदियों को माता के समान माना गया है।
पाठ से जुड़ी बात: पाठ के अन्त में प्राचीन-आधुनिक नामों की सूची भी दी है — गङ्गा = जाह्नवी/भागीरथी, यमुना = कालिन्दी, शुतुद्रिः = सतलुज्, वितस्ता = झेलम्, चन्द्रभागा = चिनाब्, चर्मण्वती = चम्बल, रेवा = नर्मदा, गोदा = गोदावरी, कौशिकी = कोसी।
प्र2.
विविधेभ्यः प्रदेशेभ्यः जनाः किमर्थम् आगच्छन्ति ?
उत्तर

विविधेभ्यः प्रदेशेभ्यः असंख्याः जनाः तीर्थक्षेत्राणां धूलिं ललाटे स्थापयितुम् आगच्छन्ति।

(हिन्दी — विभिन्न प्रदेशों से असंख्य लोग तीर्थक्षेत्रों की धूल अपने माथे पर लगाने के लिए आते हैं।)

आधारवाक्यम्: “एतेषां तीर्थक्षेत्राणां धूलिं ललाटे स्थापयितुं विविधेभ्यः प्रदेशेभ्यः असंख्याः जनाः आगच्छन्ति।” अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, काञ्ची, अवन्तिका, वैशाली, द्वारिका, पुरी, गया, प्रयाग, पाटलिपुत्र आदि ऐसे ही मङ्गलमय तीर्थक्षेत्र हैं।
व्याकरण-सङ्केत: ‘स्थापयितुम्’ तुमुन्-प्रत्ययान्त अव्यय है — ‘रखने के लिए’। ‘किमर्थम्’ (किसलिए) का उत्तर इसी तुमुन्-रूप से दिया जाता है।
प्र3.
धर्मचक्रं कं भावं बोधयति ?
उत्तर

धर्मचक्रं ‘चलनीयं कर्तव्यपथे वै, न विरम, सततं चल’ इति भावं बोधयति।

(हिन्दी — धर्मचक्र यह भाव समझाता है कि कर्तव्य के मार्ग पर चलते रहना चाहिए, रुको मत, निरन्तर चलो।)

विस्तार: ध्वज के मध्य घननीलवर्ण के चक्र का नाम धर्मचक्रम् है और उसमें चतुर्विंशति (२४) अरे हैं। पाठ इसके दो उदाहरण देता है — सूर्य विराम के बिना नित्य चलता है, और नदी कष्ट सहती हुई भी अपने ध्येय की ओर बहती रहती है।
दूसरा सन्देश: “जीवने श्रान्तेः, आलस्यस्य प्रमादस्य च स्थानं न भवतु” — जीवन में थकान, आलस्य और असावधानी का स्थान न हो।
प्र4.
कृषकबान्धवानां परिश्रमेण भारतभूमिः कथं सञ्जाता ?
उत्तर

कृषकबान्धवानां परिश्रमेण एव भारतभूमिः हरितवर्णमयी समृद्धा सस्यश्यामला च सञ्जाता।

(हिन्दी — किसान भाइयों के परिश्रम से ही भारतभूमि हरे रंग से भरी, समृद्ध तथा फसलों से हरी-भरी हो गई है।)

आधारवाक्यम्: “एतेषां परिश्रमेण एव भारतभूमिः हरितवर्णमयी समृद्धा सस्यश्यामला च सञ्जाता।” भारतमाता की इसी समृद्धि की आभा राष्ट्रध्वज में हरितवर्ण के रूप में विराजती है और हमें ‘जयतु कृषकः’ कहने की प्रेरणा देती है।
प्र5.
विज्ञानस्य केषु क्षेत्रेषु भारतीयैः यशः प्राप्तम् ?
उत्तर

अणुशास्त्रे, सङ्गणकशास्त्रे, चिकित्साशास्त्रे, अन्तरिक्षशास्त्रे, आयुधशास्त्रे इत्यादिषु विज्ञानस्य विभिन्नेषु क्षेत्रेषु भारतीयैः वैज्ञानिकैः महत् यशः प्राप्तम्।

(हिन्दी — परमाणु विज्ञान, कम्प्यूटर विज्ञान, चिकित्सा विज्ञान, अन्तरिक्ष विज्ञान तथा शस्त्र विज्ञान आदि विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में भारतीय वैज्ञानिकों ने महान् यश प्राप्त किया है।)

संस्कृतपदम्हिन्दी अर्थEnglish
अणुशास्त्रम्परमाणु विज्ञानAtomic science
सङ्गणकशास्त्रम्कम्प्यूटर विज्ञानComputer science
चिकित्साशास्त्रम्चिकित्सा विज्ञानMedical science
अन्तरिक्षशास्त्रम्अन्तरिक्ष विज्ञानSpace science
आयुधशास्त्रम्शस्त्र विज्ञानScience of weapons
जोड़ने योग्य बात: पाठ कहता है — “भारतीयं विज्ञानं शान्तिं प्रगतिं सुरक्षां च परिपोषयति।” अर्थात् भारतीय विज्ञान शान्ति, प्रगति और सुरक्षा — तीनों का पोषण करता है।
प्र6.
अन्ते सर्वे किं गीतं गायन्ति ?
उत्तर

अन्ते सर्वे इदं गीतं गायन्ति —

वयं बालकाः भारतभक्ताः
वयं बालिकाः भारतभक्ताः।
वयं हि सर्वे भारतभक्ताः
पृथ्वीं स्वर्गं जेतुं शक्ताः॥

(हिन्दी — हम बालक भारत के भक्त हैं, हम बालिकाएँ भी भारत की भक्त हैं। हम सब ही भारतभक्त हैं और पृथ्वी तथा स्वर्ग को जीतने में समर्थ हैं।)

भावः: यह लघुगीत बालक-बालिका के भेद को मिटाकर सबको एक ‘भारतभक्त’ कहता है और यह विश्वास जगाता है कि मिलकर प्रयत्न करने पर कुछ भी असम्भव नहीं। इससे पहले पाठ कहता है — “वयं सर्वेऽपि धन्याः यत् अस्यां पवित्रभूम्यां जन्म प्राप्तवन्तः।”
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