यह गतिविधि सामूहिक गान की है — कक्षा में सब मिलकर पूरा ‘वन्दे मातरम्’ गाएँ। नीचे गीत का अर्थ दिया है, जिससे गाते समय भाव समझ में आए।
सुजलां सुफलां मलयज-शीतलाम्।
शस्य-श्यामलां मातरम्॥ वन्दे...॥
अन्वयः — (अहम्) सुजलाम्, सुफलाम्, मलयज-शीतलाम्, शस्य-श्यामलां मातरं वन्दे।
अर्थः — सुन्दर जल से भरी हुई, उत्तम फल देने वाली, मलय-पवन से शीतल तथा फसलों से हरी-भरी माता को मैं प्रणाम करता हूँ।
भावः — कवि मातृभूमि को केवल भूमि नहीं, जीवित माता मानता है। जल, फल, शीतल पवन और हरी फसलें — ये माता के दिए हुए वरदान हैं, इसीलिए उसके प्रति कृतज्ञता ही ‘वन्दन’ है।
| पद्यांशः | भावार्थः (हिन्दी) |
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| शुभ्र-ज्योत्स्ना-पुलकित-यामिनीम् … सुखदां वरदां मातरम्॥१॥ | उज्ज्वल चाँदनी से पुलकित रात्रि वाली, खिले फूलों और वृक्षों के पत्तों से सुशोभित, मधुर हँसने-बोलने वाली, सुख तथा वर देने वाली माता। |
| कोटि-कोटि-कण्ठ-कलकल-निनाद-कराले … रिपुदल-वारिणीं मातरम्॥२॥ | करोड़ों कण्ठों के कलकल-निनाद से भयंकर, चौदह करोड़ भुजाओं में तीखी तलवार धारण करने वाली — हे माँ, तुम्हें अबला कौन कहता है ? बहुबल धारण करने वाली, तारने वाली और शत्रुदल को रोकने वाली माता को मैं नमन करता हूँ। |
| तुमि विद्या, तुमि धर्म … तोमारई प्रतिमा गडि मन्दिरे-मन्दिरे॥३॥ | (बाङ्गला अंश) तुम्हीं विद्या हो, तुम्हीं धर्म, तुम्हीं हृदय और तुम्हीं मर्म। शरीर में तुम्हीं प्राण हो, भुजाओं में तुम्हीं शक्ति, हृदय में तुम्हीं भक्ति हो; हम मन्दिर-मन्दिर में तुम्हारी ही प्रतिमा गढ़ते हैं। |
| त्वं हि दुर्गा … धरणीं भरणीं मातरम्॥४॥ | तुम्हीं दस अस्त्र धारण करने वाली दुर्गा हो, कमलदल में विहार करने वाली कमला (लक्ष्मी) हो, विद्या देने वाली वाणी (सरस्वती) हो। निर्मल और अतुलनीय माता को नमन। श्यामल, सरल, सुन्दर मुस्कान वाली, आभूषित, सबको धारण-भरण करने वाली माता को प्रणाम। |