दीपकम् अध्याय 13 पाठे विद्यमानाः प्रश्नाः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
कः एषः स्वराणां ‘प्लुतः’ नाम त्रिमात्रः ?
उत्तर

प्लुतः नाम सः स्वरः यस्य उच्चारणे त्रयाणां मात्राणां कालः लगति। सः त्रिमात्रः स्वरः अस्ति।
[‘प्लुत’ उस स्वर का नाम है जिसके उच्चारण में तीन मात्राओं जितना समय लगता है। वह त्रिमात्र स्वर होता है।]

ह्रस्वः = एकमात्रः —
दीर्घः = द्विमात्रः —
प्लुतः = त्रिमात्रः —
ऐसा क्यों: अध्यापक उत्तर देते हैं — ‘श्रद्धे ! समीचीनं प्रश्नं पृष्टवती।’ अन्य भारतीय भाषाओं में स्वरों की प्रायः दो ही मात्राएँ (ह्रस्व, दीर्घ) मानी जाती हैं, इसीलिए कक्षा ६ की पाठ्यपुस्तक में सरलता के लिए दो ही दिखाई गयी थीं। परन्तु संस्कृत में सभी स्वरों का एक त्रिमात्र उपभेद भी होता है — वही ‘प्लुतः’ है। जैसे — अ / आ / अ३, इ / ई / इ३, उ / ऊ / उ३
प्लुत कहाँ प्रयुक्त होता है: (क) दूर से किसी को पुकारने में — हे३ राम !, अत्र आगच्छ कुमार३ ! (ख) वेदमन्त्र के आरम्भ में ओंकार के उच्चारण में — ओ३म् — भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यम्… (गायत्री-महामन्त्रः), ओ३म् — सङ्गच्छध्वं संवदध्वम्… (सङ्गठन-मन्त्रः)।
ध्यातव्यम्: ये तीनों मात्राएँ केवल स्वरों में होती हैं, व्यञ्जनों में नहीं। सभी व्यञ्जनों की सदा अर्धमात्रा ही होती है — ‘सर्वेषां व्यञ्जनानां तु नित्यम् अर्ध-मात्रा एव भवति।’
प्र2.
कुक्कुटः प्रातः कथं रौति ?
उत्तर

सर्वे छात्राः उच्चैः सोत्साहम् उत्तरं ददति — उ – उ – ऊ – उ३ । कु – कु – कू – कु३ ।
[सब छात्र ऊँचे स्वर में उत्साहपूर्वक बोलते हैं — ‘उ–उ–ऊ–उ३’, ‘कु–कु–कू–कु३’।]

ध्वनिःकालःमात्रास्वर-भेदः
‘उ’अल्पकालिकःएकमात्रः (१)ह्रस्वः
‘ऊ’लम्बकालिकःद्विमात्रः (२)दीर्घः
‘उ३’अतिविलम्बकालिकःत्रिमात्रः (३)प्लुतः
यह उदाहरण क्यों दिया गया: मात्राओं का भेद उच्चारण-काल का भेद है — ‘विविधानां मात्राणाम् उच्चारणे परस्परं कालस्य भेदः भवति।’ मुर्गे की बाँग में यही तीनों काल स्वाभाविक रूप से सुनाई देते हैं, इसलिए अध्यापक ने प्रकृति से ही उदाहरण चुना। छात्रों के उत्तर पर अध्यापक हँसकर कहते हैं — ‘अलम् ! अलम् ! बहु शोभनम्। भवन्तः तु सर्वे कुक्कुटाः एव सञ्जाताः !’
Try This: अपने आस-पास के पक्षियों की बोली ध्यान से सुनिए — कौए की ‘काँ~’ लम्बी (द्विमात्र) है, मोर की ‘म्याँऽऽ’ और भी लम्बी (त्रिमात्र) है।
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