प्र1.
कः एषः स्वराणां ‘प्लुतः’ नाम त्रिमात्रः ?
उत्तर
प्लुतः नाम सः स्वरः यस्य उच्चारणे त्रयाणां मात्राणां कालः लगति। सः त्रिमात्रः स्वरः अस्ति।
[‘प्लुत’ उस स्वर का नाम है जिसके उच्चारण में तीन मात्राओं जितना समय लगता है। वह त्रिमात्र स्वर होता है।]
ह्रस्वः = एकमात्रः — १
दीर्घः = द्विमात्रः — २
प्लुतः = त्रिमात्रः — ३
दीर्घः = द्विमात्रः — २
प्लुतः = त्रिमात्रः — ३
ऐसा क्यों: अध्यापक उत्तर देते हैं — ‘श्रद्धे ! समीचीनं प्रश्नं पृष्टवती।’ अन्य भारतीय भाषाओं में स्वरों की प्रायः दो ही मात्राएँ (ह्रस्व, दीर्घ) मानी जाती हैं, इसीलिए कक्षा ६ की पाठ्यपुस्तक में सरलता के लिए दो ही दिखाई गयी थीं। परन्तु संस्कृत में सभी स्वरों का एक त्रिमात्र उपभेद भी होता है — वही ‘प्लुतः’ है। जैसे — अ / आ / अ३, इ / ई / इ३, उ / ऊ / उ३।
प्लुत कहाँ प्रयुक्त होता है: (क) दूर से किसी को पुकारने में — हे३ राम !, अत्र आगच्छ कुमार३ ! (ख) वेदमन्त्र के आरम्भ में ओंकार के उच्चारण में — ओ३म् — भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यम्… (गायत्री-महामन्त्रः), ओ३म् — सङ्गच्छध्वं संवदध्वम्… (सङ्गठन-मन्त्रः)।
ध्यातव्यम्: ये तीनों मात्राएँ केवल स्वरों में होती हैं, व्यञ्जनों में नहीं। सभी व्यञ्जनों की सदा अर्धमात्रा ही होती है — ‘सर्वेषां व्यञ्जनानां तु नित्यम् अर्ध-मात्रा एव भवति।’