दीपकम् अध्याय 2 पाठ्य-प्रश्नाः (संवादः)

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
महोदय ! अस्माकं विद्यालयस्य भित्तौ ‘अयोग्यः पुरुषो नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभः’ इति लिखितम् अस्ति । अस्य कः भावः इति कृपया बोधयतु ।
उत्तर

उत्तरम् — भोः सुशीले ! अस्य भावार्थः अस्ति यत् अस्मिन् जगति कोऽपि अयोग्यः नास्ति । सर्वे योग्याः सन्ति, परन्तु प्रेरकस्य मार्गदर्शकस्य च अभावः अस्ति ।

[हिन्दी अर्थ — हे सुशीला! इसका भाव यह है कि इस संसार में कोई भी व्यक्ति अयोग्य नहीं है। सब योग्य ही हैं, कमी केवल प्रेरणा देने वाले और मार्ग दिखाने वाले की है — अर्थात् ‘योजक’ अर्थात् जोड़ने वाले/नियोजित करने वाले का ही अभाव रहता है।]

ऐसा क्यों: ‘योजकः’ शब्द का अर्थ है — जो सही व्यक्ति को सही काम से जोड़ दे। मिट्टी, पत्थर और लोहा अपने-आप बेकार दिखते हैं, पर एक कुशल शिल्पी उन्हीं से मन्दिर खड़ा कर देता है। इसलिए दोष वस्तु में नहीं, उसका उपयोग जानने वाले के अभाव में है।
स्मरणीयम्: यह वाक्य भर्तृहरि की परम्परा का प्रसिद्ध सुभाषित है और विद्यालयों की भित्तियों पर बहुधा लिखा मिलता है।
प्र2.
महोदय ! ‘सुभाषितानि’ इत्यनेन कः अभिप्रायः ?
उत्तर

उत्तरम् — वत्स ! मानवानां विविधमूल्यानां विकासाय श्रेष्ठजनैः उक्तानि सुवचनानि एव सुभाषितानि । एतानि अस्माकं चिन्तनविकासाय एव विद्यालयस्य परिसरे स्थापितानि ।

[हिन्दी अर्थ — मनुष्यों में अनेक प्रकार के मूल्यों के विकास के लिए श्रेष्ठ जनों द्वारा कहे गए सुन्दर वचन ही ‘सुभाषित’ कहलाते हैं। ‘सु + भाषित’ = अच्छी तरह कहा गया वचन। ये हमारे चिन्तन के विकास के लिए ही विद्यालय-परिसर में लगाए गए हैं।]

शब्द-रचना: सु (उत्तम) + भाषितम् (कहा हुआ वचन) = सुभाषितम्, नपुंसकलिङ्ग। बहुवचन — सुभाषितानि।
प्र3.
श्रीमन् ! सुभाषितानां पठनेन कः लाभः ?
उत्तर

उत्तरम् — प्रियसुरेश ! सुभाषितानां पठनेन अस्माकं नैतिकः सामाजिकः च विकासः भवति । अस्माभिः किं कर्तव्यं किञ्च न कर्तव्यम् इति सुभाषितानि बोधयन्ति ।

[हिन्दी अर्थ — हे प्रिय सुरेश! सुभाषितों के पढ़ने से हमारा नैतिक और सामाजिक विकास होता है। हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए — यह सुभाषित ही समझाते हैं।]

ऐसा क्यों: सुभाषित उपदेश को बहुत थोड़े शब्दों में, लय के साथ कह देता है; इसलिए वह कण्ठस्थ हो जाता है और अवसर आने पर स्वयं स्मरण हो आता है। यही उसकी शिक्षा-शक्ति है। इसीलिए पाठ का नाम है — नित्यं पिबामः सुभाषितरसम् (हम प्रतिदिन सुभाषित-रस पिएँ)।
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