दीपकम् अध्याय 2 वयम् अभ्यासं कुर्मः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो ……………… रिपुः ।
उत्तर

उत्तरम् — आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः ।

[हिन्दी — आलस्य ही मनुष्यों का शरीर में स्थित बड़ा शत्रु है।]

व्याकरणम्: ‘महान्’ — ‘महत्’ शब्द का पुंलिङ्ग प्रथमा एकवचन रूप; ‘रिपुः’ का विशेषण होने से वही लिङ्ग-वचन-विभक्ति।
प्र2.
……………… वचने का दरिद्रता ।
उत्तर

उत्तरम् — तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता ।

[हिन्दी — इसलिए वही (प्रिय वचन) बोलना चाहिए; वाणी में कैसी कंजूसी?]

प्र3.
यः पठति लिखति पृच्छति ……………… ।
उत्तर

उत्तरम् — यः पठति लिखति पृच्छति पण्डितानुपाश्रयति (पण्डितान् उपाश्रयति) ।

[हिन्दी — जो पढ़ता है, लिखता है, पूछता है और विद्वानों के पास जाता है — (उसी की बुद्धि विकसित होती है)।]

पूर्णा पंक्तिः: मूल श्लोक में यह चरण इस रूप में है — “यः पठति लिखति पश्यति परिपृच्छति पण्डितानुपाश्रयति ।” अभ्यास में संक्षेप के लिए ‘पश्यति’ छोड़ा गया है और ‘परिपृच्छति’ के स्थान पर ‘पृच्छति’ छपा है।
प्र4.
स हेतुः सर्वविद्यानां ……………… धनस्य च ।
उत्तर

उत्तरम् — स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च ।

[हिन्दी — वही (क्रमशः संचय) समस्त विद्याओं, धर्म और धन का कारण है।]

प्र5.
……………… बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति ।
उत्तर

उत्तरम् — विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति ।

[हिन्दी — जीवात्मा विद्या और तप से शुद्ध होता है तथा बुद्धि ज्ञान से शुद्ध होती है।]

व्याकरणम्: ‘विद्यातपोभ्याम्’ — तृतीया द्विवचन (विद्या और तप — दो साधन), द्वन्द्वसमासः।
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