दीपकम् अध्याय 3 पाठे विद्यमानाः प्रश्नाः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
अहो ! योगिते त्वं प्रातः किं करोषि ?
उत्तर

अहं प्रतिदिनं प्रातः पित्रा सह उद्यानं गच्छामि ।
[मैं प्रतिदिन सवेरे पिताजी के साथ बगीचे जाती हूँ।]

वाक्य कैसे बना: पित्रा सह — ‘सह’ (साथ) के योग में तृतीया विभक्ति आती है, इसलिए ‘पितृ’ का रूप पित्रा हुआ। उद्यानम् कर्म है, इसलिए द्वितीया एकवचन — उद्यानम्। ‘योगिते’ सम्बोधन एकवचन है (मूल शब्द — योगिता)।
ध्यान दें: ‘गच्छामि’ उत्तमपुरुष एकवचन (लट्-लकार) है — गच्छामि / गच्छावः / गच्छामः
प्र2.
उद्याने किं करोषि भोः ?
उत्तर

अहं तु भ्रमणं करोमि । किन्तु बहवः जनाः तत्र व्यायामं योगासनानि च कुर्वन्ति ।
[मैं तो टहलती हूँ। किन्तु बहुत-से लोग वहाँ व्यायाम और योगासन करते हैं।]

यहीं से कथा मुड़ती है: ‘अहं तु भ्रमणं करोमि’ में तु का अर्थ ‘तो/केवल’ है — अर्थात् वह स्वयं केवल टहलती है। इसी उत्तर के दूसरे वाक्य से मित्रों को योगासन का पता चलता है और वे आचार्या के पास जाने का निश्चय करते हैं।
वचन देखिए: बहवः जनाः … कुर्वन्ति — कर्ता बहुवचन है, इसलिए क्रिया भी बहुवचन (कुर्वन्ति)। एकवचन में यही ‘जनः … करोति’ होता।
प्र3.
आचार्ये ! किम् अद्य भवान् अस्मान् योगासनं शिक्षयति ?
उत्तर

आचार्या उत्तरं ददाति — निश्चयेन, वदन्तु किम् आसनं शिक्षितुम् इच्छन्ति ?
[अवश्य, बताइए कौन-सा आसन सीखना चाहते हैं?]

आदर का प्रयोग: ‘भवान्/भवती’ के साथ क्रिया प्रथमपुरुष में आती है — भवान् शिक्षयति, न कि ‘भवान् शिक्षयसि’। इसी तरह आचार्या भी छात्रों के लिए आदरसूचक बहुवचन ‘वदन्तु … इच्छन्ति’ का प्रयोग करती हैं।
पुस्तक में एक विसंगति: यहाँ सम्बोधन ‘आचार्ये’ (स्त्रीलिङ्ग) है, अतः व्याकरण की दृष्टि से भवती … शिक्षयति होना चाहिए; पुस्तक में भवान् छपा है। परीक्षा में पाठ का वाक्य ज्यों-का-त्यों लिखें, पर नियम यही याद रखें — स्त्रीलिङ्ग में भवती, पुंलिङ्ग में भवान्
प्र4.
वदन्तु किम् आसनं शिक्षितुम् इच्छन्ति ?
उत्तर

योगिता वदति — आचार्ये ! अद्य सूर्यनमस्कारं शिक्षयतु ।
[हे आचार्या! आज सूर्यनमस्कार सिखाइए।]

आचार्या उत्तरं ददाति — समीचीनम् । सूर्यनमस्कारः द्वादशानाम् आसनानां समाहारः अस्ति ।
[बहुत अच्छा। सूर्यनमस्कार बारह आसनों का समूह है।]

‘शिक्षयतु’ क्यों ? यह लोट्-लकार, प्रथमपुरुष एकवचन है और आदरपूर्वक प्रार्थना के लिए प्रयुक्त होता है — ‘सिखाइए’। यदि समान आयु के मित्र से कहना हो तो मध्यमपुरुष का शिक्षय (सिखाओ) आता।
शब्द-अर्थ: समाहारः = समूह, संग्रह। समीचीनम् = ठीक है, उत्तम है।
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