दीपकम् अध्याय 3 परियोजनाकार्यम्

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
सूर्यनमस्कारस्य द्वादशानाम् आसनानां भित्तिपत्राणि रचयन्तु । मन्त्रान् अपि लिखन्तु ।
उत्तर

यह करके दिखाने वाला कार्य है। एक चार्ट-पेपर लीजिए, ऊपर शीर्षक लिखिए — ‘सूर्यनमस्कारः — द्वादश आसनानि द्वादश मन्त्राः च’ — और नीचे बारह खाने बनाकर हर खाने में एक आसन का चित्र तथा उसका मन्त्र लिखिए।

अच्छे भित्तिपत्र में ये चार बातें अवश्य हों —

  1. आसन का क्रमाङ्क (१ से १२ तक) और उसका संस्कृत नाम;
  2. उससे जुड़ा मन्त्र — ‘ॐ … नमः’;
  3. आसन का सरल चित्र या रेखाचित्र (पुस्तक के पृष्ठ 30–31 के चित्र देखकर बनाइए);
  4. सबसे नीचे समापन-मन्त्र — ‘ॐ सवितृसूर्यनारायणाय नमः’

नमूना उत्तर (आदर्श तालिका) —

क्रमःमन्त्रःआसनम्हिन्दी में स्थिति
ॐ मित्राय नमःप्रणामासनम्सीधे खड़े होकर नमस्कार-मुद्रा
ॐ रवये नमःहस्तउत्तानासनम्दोनों हाथ ऊपर उठाकर पीछे की ओर झुकना
ॐ सूर्याय नमःपादहस्तासनम्आगे झुककर हाथ पैरों के पास
ॐ भानवे नमःअश्वसञ्चालनासनम्एक पैर पीछे, दृष्टि ऊपर
ॐ खगाय नमःदण्डासनम्शरीर एक सीधी रेखा में, हाथों पर टिका
ॐ पूष्णे नमःअष्टाङ्गनमस्कारःशरीर के आठ अंग भूमि से स्पर्श
ॐ हिरण्यगर्भाय नमःभुजङ्गासनम्छाती ऊपर, साँप के फन जैसी मुद्रा
ॐ मरीचये नमःअधोमुखश्वानासनम् (पर्वतासनम्)कमर ऊपर, शरीर पर्वत जैसा
ॐ आदित्याय नमःअश्वसञ्चालनासनम्चौथी स्थिति दुहराइए, दूसरा पैर आगे
१०ॐ सवित्रे नमःपादहस्तासनम्तीसरी स्थिति दुहराइए
११ॐ अर्काय नमःहस्तउत्तानासनम्दूसरी स्थिति दुहराइए
१२ॐ भास्कराय नमःप्रणामासनम्पहली स्थिति में लौटकर नमस्कार
(सर्वान्ते)ॐ सवितृसूर्यनारायणाय नमःसमापन-प्रणामःपूरा चक्र पूरा होने पर अन्तिम नमस्कार
बारह क्यों, और आधे दोहराए क्यों जाते हैं: सूर्यनमस्कार आगे-पीछे झुकने का जोड़ा है — पहली छह स्थितियों में शरीर आगे बढ़ता है, अगली छह में वही स्थितियाँ उलटे क्रम में लौटती हैं। इसीलिए ४ और ९, ३ और १०, २ और ११, १ और १२ एक जैसे हैं — पर मन्त्र हर बार नया होता है।
सजावट का सुझाव: चार्ट के बीच में एक बड़ा सूर्य बनाइए और उसकी बारह किरणों पर बारह नाम — मित्रः, रविः, सूर्यः, भानुः, खगः, पूषा, हिरण्यगर्भः, मरीचिः, आदित्यः, सविता, अर्कः, भास्करः — लिखिए। मन्त्र में इनके चतुर्थी रूप ही आते हैं।
प्र2.
प्रतिदिनं सकुटुम्बं सूर्यनमस्कारस्य अभ्यासं कुर्वन्तु ।
उत्तर

यह अभ्यास-कार्य है, लिखित उत्तर नहीं। इसे इस तरह कीजिए —

  • समयः — प्रातःकाल, सूर्योदय के समय, खाली पेट। भोजन के तुरन्त बाद कभी न कीजिए।
  • स्थानम् — खुली, हवादार जगह; नीचे चटाई या दरी बिछाइए।
  • आरम्भः — पहले दिन केवल दो या तीन चक्र। धीरे-धीरे बढ़ाकर छह से बारह तक ले जाइए।
  • मन्त्रः — हर स्थिति के साथ उसका मन्त्र बोलिए; इससे गति और श्वास दोनों की ताल बैठ जाती है।
  • सकुटुम्बम् — परिवार के सब लोग साथ कीजिए। दादा-दादी या छोटे भाई-बहन जितना कर सकें उतना ही कराइए।

नमूना उत्तर (साप्ताहिक अभ्यास-पत्रकम्) — अपनी कॉपी में ऐसी तालिका बनाकर हर दिन भरिए:

वासरः (दिन)समयःआवृत्तयः (चक्र)कः कः अकरोत् ?
सोमवासरःप्रातः ६:१५अहम्, माता, अनुजः
मङ्गलवासरःप्रातः ६:१५अहम्, पिता
बुधवासरःप्रातः ६:२०अहम्, माता, पिता
सावधानी: कमर या घुटने में चोट हो, या कोई रोग हो, तो पहले बड़ों से/चिकित्सक से पूछिए। आसन में झटका कभी न दीजिए — जितना सहज लगे उतना ही झुकिए
प्र3.
विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परिपीडनाय । खलस्य साधोर्विपरीतमेतत् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय ॥ अस्मिन् श्लोके विद्यमानानि चतुर्थी-विभक्त्यन्तरूपाणि चित्वा लिखन्तु ।
उत्तर

इस श्लोक में छह पद चतुर्थी-विभक्ति में हैं —

क्रमःचतुर्थ्यन्तं पदम्प्रातिपदिकम्हिन्दी अर्थकिसके विषय में
विवादायविवादझगड़े के लिएखलस्य (दुर्जन की) विद्या
मदायमदघमण्ड के लिएखलस्य धनम्
परिपीडनायपरिपीडनसताने के लिएखलस्य शक्तिः
ज्ञानायज्ञानज्ञान के लिएसाधोः (सज्जन की) विद्या
दानायदानदान के लिएसाधोः धनम्
रक्षणायरक्षणरक्षा के लिएसाधोः शक्तिः

अन्वयः — खलस्य विद्या विवादाय (भवति), धनं मदाय (भवति), शक्तिः परेषां परिपीडनाय (भवति) । साधोः एतत् विपरीतम् — (विद्या) ज्ञानाय, (धनं) दानाय, (शक्तिः) च रक्षणाय (भवति) ।

अर्थः (हिन्दी) — दुष्ट व्यक्ति की विद्या झगड़े के लिए होती है, धन घमण्ड के लिए और शक्ति दूसरों को सताने के लिए। सज्जन के लिए यह सब उलटा है — उसकी विद्या ज्ञान के लिए, धन दान के लिए और शक्ति दूसरों की रक्षा के लिए होती है।

भावः — विद्या, धन और शक्ति — ये तीनों अपने आप में न अच्छे हैं न बुरे; इनका मूल्य पात्र से तय होता है। एक ही तलवार शल्यचिकित्सक के हाथ में जीवन बचाती है और डाकू के हाथ में जीवन लेती है। इसीलिए श्लोक कहता है कि साधना केवल विद्या या धन पाने की नहीं, अपने स्वभाव को साधु बनाने की होनी चाहिए।

पहचानने का तरीका: चतुर्थी विभक्ति ‘के लिए’ का अर्थ देती है और अकारान्त शब्दों में –आय पर समाप्त होती है। श्लोक में जहाँ-जहाँ ‘–आय’ दिखे, वहीं चतुर्थी है — विवादाय, मदाय, परिपीडनाय, ज्ञानाय, दानाय, रक्षणाय। यहाँ यह प्रयोजन (तादर्थ्य) बता रही है, दान नहीं — अर्थात् चतुर्थी केवल ‘देने’ में नहीं, ‘किस काम के लिए’ में भी आती है।
सन्धि-विच्छेद: साधोर्विपरीतमेतत् = साधोः + विपरीतम् + एतत् (विसर्ग-सन्धि तथा स्वर-सन्धि)। खलस्य = दुर्जन का; परेषाम् = दूसरों का (षष्ठी बहुवचन)।
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