दीपकम् अध्याय 3 वयम् अभ्यासं कुर्मः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
यथा – गणेश – ........................ ........................ ........................
उत्तर

गणेश – गणेशाय, गणेशाभ्याम्, गणेशेभ्यः । (पुस्तके दत्तम्)
[गणेश के लिए — एकवचन, द्विवचन, बहुवचन में चतुर्थी के रूप।]

तीन साँचे याद कर लीजिए, फिर पूरा प्रश्न मिनटों में बनेगा:
वर्गःएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्उदाहरणम्
अकारान्त — पुंलिङ्ग / नपुंसकलिङ्ग–आय–आभ्याम्–एभ्यःछात्राय, छात्राभ्याम्, छात्रेभ्यः
आकारान्त — स्त्रीलिङ्ग–आयै–आभ्याम्–आभ्यःबालिकायै, बालिकाभ्याम्, बालिकाभ्यः
ईकारान्त — स्त्रीलिङ्ग–यै–ईभ्याम्–ईभ्यःनद्यै, नदीभ्याम्, नदीभ्यः
एक ही अन्तर पकड़िए: अकारान्त में बहुवचन –एभ्यः होता है (छात्रेभ्यः), जबकि आकारान्त और ईकारान्त में –भ्यः सीधे जुड़ता है (बालिकाभ्यः, नदीभ्यः)।
प्र2.
भक्त – भक्ताय ........................ भक्तेभ्यः
उत्तर

भक्त – भक्ताय, भक्ताभ्याम्, भक्तेभ्यः ।
[भक्त के लिए / दो भक्तों के लिए / अनेक भक्तों के लिए।]

वर्गः: अकारान्तः, पुंलिङ्गः — साँचा –आय / –आभ्याम् / –एभ्यः। रिक्त स्थान द्विवचन का था।
प्र3.
सेविका – ........................ सेविकाभ्याम् ........................
उत्तर

सेविका – सेविकायै, सेविकाभ्याम्, सेविकाभ्यः
[सेविका के लिए / दो सेविकाओं के लिए / अनेक सेविकाओं के लिए।]

वर्गः: आकारान्तः, स्त्रीलिङ्गः — साँचा –आयै / –आभ्याम् / –आभ्यः। एकवचन में –ायै ही स्त्रीलिङ्ग की पहचान है; ‘सेविकाय’ लिखना भूल होगी।
प्र4.
अनुजा – अनुजायै ........................ ........................
उत्तर

अनुजा – अनुजायै, अनुजाभ्याम्, अनुजाभ्यः
[छोटी बहन के लिए / दो छोटी बहनों के लिए / अनेक छोटी बहनों के लिए।]

वर्गः: आकारान्तः, स्त्रीलिङ्गः। अनुजा = छोटी बहन (अनुजः = छोटा भाई, जिसका चतुर्थी रूप ‘अनुजाय’ होता)।
प्र5.
गृहिणी – ........................ गृहिणीभ्याम् ........................
उत्तर

गृहिणी – गृहिण्यै, गृहिणीभ्याम्, गृहिणीभ्यः
[गृहिणी के लिए / दो गृहिणियों के लिए / अनेक गृहिणियों के लिए।]

एकवचन में ‘ई’ क्यों टूटती है: ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग में एकवचन के समय अन्तिम का य् हो जाता है और उस पर चढ़ता है — गृहिणी + ऐ = गृहिण्यै। पर द्विवचन-बहुवचन में ‘ई’ ज्यों-की-त्यों रहती है — गृहिणीभ्याम्, गृहिणीभ्यः।
प्र6.
कुमारी – कुमार्यै कुमारीभ्याम् ........................
उत्तर

कुमारी – कुमार्यै, कुमारीभ्याम्, कुमारीभ्यः
[कुमारी के लिए / दो कुमारियों के लिए / अनेक कुमारियों के लिए।]

वर्गः: ईकारान्तः, स्त्रीलिङ्गः — शालिनी / नदी / भगिनी के ही साँचे पर।
प्र7.
वन – वनाय ........................ ........................
उत्तर

वन – वनाय, वनाभ्याम्, वनेभ्यः
[वन के लिए / दो वनों के लिए / अनेक वनों के लिए।]

वर्गः: अकारान्तम्, नपुंसकलिङ्गम् — पर चतुर्थी में इसके रूप अकारान्त पुंलिङ्ग जैसे ही बनते हैं (आसन → आसनाय, आसनाभ्याम्, आसनेभ्यः)। लिङ्ग का अन्तर प्रथमा-द्वितीया में दिखता है, चतुर्थी में नहीं।
प्र8.
मित्र – ........................ ........................ मित्रेभ्यः
उत्तर

मित्र – मित्राय, मित्राभ्याम्, मित्रेभ्यः ।
[मित्र के लिए / दो मित्रों के लिए / अनेक मित्रों के लिए।]

पाठ से जोड़िए: यही मित्राय पाठ के पहले मन्त्र ‘ॐ मित्राय नमः’ में आया है और पाठ का शीर्षक भी यही है। ‘मित्रम्’ (सखा के अर्थ में) अकारान्त नपुंसकलिङ्ग माना जाता है, पर चतुर्थी के रूप वही रहते हैं।
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