दीपकम् अध्याय 3 वयम् अभ्यासं कुर्मः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
पाठे विद्यमानानां ‘नमः’ युक्तशब्दानां सङ्ग्रहं कृत्वा लिखन्तु — यथा – मित्राय नमः । (क) ......... (ख) ......... (ग) ......... (घ) ......... (ङ) ......... (च) ......... (छ) ......... (ज) ......... (झ) ......... (ञ) ......... (ट) .........
उत्तर

पाठ के सूर्यनमस्कार-मन्त्रों में ‘नमः’ के साथ कुल बारह पद आए हैं। उदाहरण में मित्राय नमः दे दिया गया है, अतः शेष ग्यारह पद (क) से (ट) तक इस प्रकार भरे जाएँगे —

क्रमः‘नमः’ युक्तं पदम्प्रातिपदिकम्अन्तःहिन्दी अर्थ
यथामित्राय नमः ।मित्रअकारान्तःमित्र (सूर्य) को नमस्कार
(क)रवये नमः ।रविइकारान्तःरवि को नमस्कार
(ख)सूर्याय नमः ।सूर्यअकारान्तःसूर्य को नमस्कार
(ग)भानवे नमः ।भानुउकारान्तःभानु को नमस्कार
(घ)खगाय नमः ।खगअकारान्तःआकाशचारी को नमस्कार
(ङ)पूष्णे नमः ।पूषन्नकारान्तःपोषक को नमस्कार
(च)हिरण्यगर्भाय नमः ।हिरण्यगर्भअकारान्तःहिरण्यगर्भ को नमस्कार
(छ)मरीचये नमः ।मरीचिइकारान्तःकिरणवान् को नमस्कार
(ज)आदित्याय नमः ।आदित्यअकारान्तःआदित्य को नमस्कार
(झ)सवित्रे नमः ।सवितृऋकारान्तःप्रेरक को नमस्कार
(ञ)अर्काय नमः ।अर्कअकारान्तःअर्क को नमस्कार
(ट)भास्कराय नमः ।भास्करअकारान्तःभास्कर को नमस्कार
नियम (अत्र इदम् अवधेयम्): ‘नमः’ शब्दस्य योगे चतुर्थी विभक्तिः भवति । इसीलिए ऊपर के सभी पद चतुर्थी विभक्ति, एकवचन में हैं। हिन्दी में हम ‘सूर्य को नमस्कार’ कहते हैं — वही ‘को’ संस्कृत में चतुर्थी बन जाता है।
ग्यारह से एक अधिक: पाठ के अन्त में ‘ॐ सवितृसूर्यनारायणाय नमः’ (सर्वान्ते) भी आता है। पुस्तक में केवल (क) से (ट) तक ग्यारह खाने हैं, इसलिए यह तेरहवाँ पद अतिरिक्त रूप से लिख दीजिए — यह भी ‘नमः’ के योग में चतुर्थी का ही उदाहरण है।
कठिन रूप याद रखिए: रवि → रवये, भानु → भानवे, मरीचि → मरीचये, सवितृ → सवित्रे, पूषन् → पूष्णे। शेष सब अकारान्त हैं, अतः सीधे –आय लगा दीजिए।
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