प्र1.
पाठे विद्यमानानां ‘नमः’ युक्तशब्दानां सङ्ग्रहं कृत्वा लिखन्तु — यथा – मित्राय नमः । (क) ......... (ख) ......... (ग) ......... (घ) ......... (ङ) ......... (च) ......... (छ) ......... (ज) ......... (झ) ......... (ञ) ......... (ट) .........
उत्तर
पाठ के सूर्यनमस्कार-मन्त्रों में ‘नमः’ के साथ कुल बारह पद आए हैं। उदाहरण में मित्राय नमः दे दिया गया है, अतः शेष ग्यारह पद (क) से (ट) तक इस प्रकार भरे जाएँगे —
| क्रमः | ‘नमः’ युक्तं पदम् | प्रातिपदिकम् | अन्तः | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|---|---|
| यथा | मित्राय नमः । | मित्र | अकारान्तः | मित्र (सूर्य) को नमस्कार |
| (क) | रवये नमः । | रवि | इकारान्तः | रवि को नमस्कार |
| (ख) | सूर्याय नमः । | सूर्य | अकारान्तः | सूर्य को नमस्कार |
| (ग) | भानवे नमः । | भानु | उकारान्तः | भानु को नमस्कार |
| (घ) | खगाय नमः । | खग | अकारान्तः | आकाशचारी को नमस्कार |
| (ङ) | पूष्णे नमः । | पूषन् | नकारान्तः | पोषक को नमस्कार |
| (च) | हिरण्यगर्भाय नमः । | हिरण्यगर्भ | अकारान्तः | हिरण्यगर्भ को नमस्कार |
| (छ) | मरीचये नमः । | मरीचि | इकारान्तः | किरणवान् को नमस्कार |
| (ज) | आदित्याय नमः । | आदित्य | अकारान्तः | आदित्य को नमस्कार |
| (झ) | सवित्रे नमः । | सवितृ | ऋकारान्तः | प्रेरक को नमस्कार |
| (ञ) | अर्काय नमः । | अर्क | अकारान्तः | अर्क को नमस्कार |
| (ट) | भास्कराय नमः । | भास्कर | अकारान्तः | भास्कर को नमस्कार |
नियम (अत्र इदम् अवधेयम्): ‘नमः’ शब्दस्य योगे चतुर्थी विभक्तिः भवति । इसीलिए ऊपर के सभी पद चतुर्थी विभक्ति, एकवचन में हैं। हिन्दी में हम ‘सूर्य को नमस्कार’ कहते हैं — वही ‘को’ संस्कृत में चतुर्थी बन जाता है।
ग्यारह से एक अधिक: पाठ के अन्त में ‘ॐ सवितृसूर्यनारायणाय नमः’ (सर्वान्ते) भी आता है। पुस्तक में केवल (क) से (ट) तक ग्यारह खाने हैं, इसलिए यह तेरहवाँ पद अतिरिक्त रूप से लिख दीजिए — यह भी ‘नमः’ के योग में चतुर्थी का ही उदाहरण है।
कठिन रूप याद रखिए: रवि → रवये, भानु → भानवे, मरीचि → मरीचये, सवितृ → सवित्रे, पूषन् → पूष्णे। शेष सब अकारान्त हैं, अतः सीधे –आय लगा दीजिए।