दीपकम् अध्याय 6 कार्यकलापः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
पदान्त्याक्षरी क्रीडा । कक्षायां पदान्त्याक्षरीं क्रीडन्तु । यथा — प्रथमः छात्रः — रामः (‘म’कारः अन्तिमवर्णः), द्वितीयः छात्रः — मानवः (‘व’कारः अन्तिमवर्णः), तृतीयः छात्रः — वनम् (अत्र ‘न’कारः अन्तिमवर्णः), चतुर्थः छात्रः — नकुलः (एवमेव अग्रे क्रीडा भविष्यति) ।
उत्तर

नियमः — यदा पदस्य अन्ते ‘म्’-वर्णः, विसर्गः (ः) अनुस्वारः (ं) वा भवति, तदा तेभ्यः पूर्वस्थं व्यञ्जनवर्णं स्वीकृत्य एव अग्रिमं पदं वक्तव्यम् ।
[जब शब्द के अन्त में ‘म्’, विसर्ग या अनुस्वार हो, तब उनसे पहले वाला व्यञ्जन लेकर ही अगला शब्द बोलना चाहिए।]

पुस्तक का उदाहरण कैसे चला —

छात्रःपदम्अन्तिमः पूर्णव्यञ्जनःअगला पद किससे
प्रथमःरामःम् (विसर्ग से पूर्व)
द्वितीयःमानवःव् (विसर्ग से पूर्व)
तृतीयःवनम्न् (‘म्’ से पूर्व)
चतुर्थःनकुलःल्

नमूना उत्तरम् (आगे का क्रम) — नकुलः → ता → रुः → विः → नम् → दी → यालुः → ेखनी → गरम् → ृहम् …

ध्यान दें: ‘वनम्’ का अन्तिम वर्ण देखने में ‘म्’ है, पर नियम के अनुसार उससे पहले का न् लिया जाता है — इसीलिए अगला शब्द ‘नकुलः’ रखा गया।
प्र2.
क्रियापदानां स्मरणक्रीडा । छात्राः क्रियापदानां स्मरणक्रीडां कर्तुं शक्नुवन्ति । यथा — प्रथमः छात्रः — गच्छति, द्वितीयः छात्रः — गच्छति पठति, तृतीयः छात्रः — गच्छति पठति लिखति, चतुर्थः छात्रः — गच्छति पठति लिखति नयति ।
उत्तर

क्रीडायाः नियमः — पहला छात्र एक क्रियापद बोलता है; दूसरा छात्र उसे दोहराकर एक नया क्रियापद जोड़ता है; तीसरा छात्र पहले दोनों बोलकर तीसरा जोड़ता है — इसी प्रकार शृंखला बढ़ती जाती है। जो क्रम भूल जाए, वह खेल से बाहर।

नमूना उत्तरम् —

  1. प्रथमः छात्रः — पिबति
  2. द्वितीयः छात्रः — पिबति खादति
  3. तृतीयः छात्रः — पिबति खादति धावति
  4. चतुर्थः छात्रः — पिबति खादति धावति क्रीडति
  5. पञ्चमः छात्रः — पिबति खादति धावति क्रीडति हसति
  6. षष्ठः छात्रः — पिबति खादति धावति क्रीडति हसति शृणोति
इससे क्या सीखते हैं: ये सब लट्-लकार, प्रथमपुरुष, एकवचन के रूप हैं। खेल-खेल में स्मरणशक्ति के साथ-साथ धातु-रूप भी याद हो जाते हैं। कठिनाई बढ़ाने के लिए बहुवचन में खेलिए — पिबन्ति, खादन्ति, धावन्ति, क्रीडन्ति, हसन्ति, शृण्वन्ति
प्र3.
वर्णलेखन्या अधोलिखितं श्लोकं पूरयन्तु — (पुस्तके बिन्दुरेखाभिः लिखितः श्लोकः)
उत्तर

पुस्तक में पृष्ठ 70 पर बिन्दुओं (डॉटेड अक्षरों) में जो श्लोक छपा है, उस पर वर्णलेखनी (सुलेख-कलम) से लिखकर उसे पूरा करना है। वह श्लोक है —

क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत् ।
क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम् ॥

अन्वयः — क्षणशः विद्यां कणशः च एव अर्थं साधयेत् । क्षणे नष्टे विद्या कुतः ? कणे नष्टे धनं कुतः ?

अर्थः — क्षण-क्षण करके विद्या और कण-कण करके धन कमाना चाहिए। (क्योंकि) क्षण नष्ट हो जाने पर विद्या कहाँ से मिलेगी और कण नष्ट हो जाने पर धन कहाँ से मिलेगा?

भावः — यह श्लोक पाठ के सातवें श्लोक (शनैः पन्थाः शनैः कन्था…) का ही साथी है। बड़ी विद्या और बड़ा धन एक दिन में नहीं बनते — वे छोटे-छोटे क्षणों और कणों के जुड़ने से बनते हैं। जो एक-एक क्षण गँवाता है, वह अन्त में पूरी विद्या गँवा बैठता है।
लेखन-सङ्केत: लिखते समय क्षणशः / कणशः के विसर्ग तथा साधयेत् / नष्टे के हलन्त और संयुक्ताक्षर (ष्ट, श्च) सावधानी से बनाइए। कणशश्चैव = कणशः + च + एव (विसर्ग-सन्धि तथा वृद्धि-सन्धि)।
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