दीपकम् अध्याय 6 वयम् अभ्यासं कुर्मः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
मञ्जूषातः समुचितानि पदानि स्वीकृत्य रिक्तस्थानानि पूरयन्तु — मञ्जूषा : रक्षणाय, मदाय, विवादाय, परिपीडनाय, ज्ञानाय, दानाय । सज्जनस्य — शक्तिः ……, विद्या ……, धनम् …… । दुर्जनस्य — शक्तिः ……, विद्या ……, धनम् …… ।
उत्तर

पूरितम् उत्तरम् —

सज्जनस्यदुर्जनस्य
शक्तिःरक्षणायपरिपीडनाय
विद्याज्ञानायविवादाय
धनम्दानायमदाय

वाक्यरूपेण —
सज्जनस्य शक्तिः रक्षणाय, विद्या ज्ञानाय, धनं दानाय (भवति) ।
दुर्जनस्य शक्तिः परिपीडनाय, विद्या विवादाय, धनं मदाय (भवति) ।
[सज्जन की शक्ति रक्षा के लिए, विद्या ज्ञान के लिए और धन दान के लिए होता है; दुर्जन की शक्ति दूसरों को कष्ट देने के लिए, विद्या झगड़े के लिए और धन घमण्ड के लिए होता है।]

आधार-श्लोक (३): विद्या विवादाय धनं मदाय, शक्तिः परेषां परिपीडनाय । खलस्य साधोर्विपरीतमेतत्, ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय ॥ — पहली दो पंक्तियाँ दुर्जन की हैं और तीसरी-चौथी पंक्ति में क्रमशः विद्या → ज्ञानाय, धनम् → दानाय, शक्तिः → रक्षणाय सज्जन के लिए कहा गया है।
व्याकरण-सूत्र: मञ्जूषा के छहों पद चतुर्थी विभक्ति, एकवचन में हैं और ‘…के लिए’ (प्रयोजन) का अर्थ देते हैं — ‘तादर्थ्ये चतुर्थी’
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