प्र1.
उदाहरणानुसारम् अधोलिखितानां पदानां विभक्तिं वचनं च लिखन्तु — यथा : ताराणाम् — षष्ठी विभक्तिः, बहुवचनम् । (क) विद्याम् (ख) धनस्य (ग) कलहेन (घ) नराणाम् (ङ) मर्त्यलोके (च) ज्ञानाय (छ) राजसु
उत्तर
| पदम् | विभक्तिः | वचनम् | मूलशब्दः / अर्थः |
|---|---|---|---|
| यथा — ताराणाम् | षष्ठी विभक्तिः | बहुवचनम् | तारा (स्त्रीलिङ्गः) — तारों का |
| (क) विद्याम् | द्वितीया विभक्तिः | एकवचनम् | विद्या (स्त्रीलिङ्गः) — विद्या को |
| (ख) धनस्य | षष्ठी विभक्तिः | एकवचनम् | धन (नपुंसकलिङ्गः) — धन का |
| (ग) कलहेन | तृतीया विभक्तिः | एकवचनम् | कलह (पुंलिङ्गः) — झगड़े से |
| (घ) नराणाम् | षष्ठी विभक्तिः | बहुवचनम् | नर (पुंलिङ्गः) — मनुष्यों का |
| (ङ) मर्त्यलोके | सप्तमी विभक्तिः | एकवचनम् | मर्त्यलोक (पुंलिङ्गः) — मृत्युलोक में |
| (च) ज्ञानाय | चतुर्थी विभक्तिः | एकवचनम् | ज्ञान (नपुंसकलिङ्गः) — ज्ञान के लिए |
| (छ) राजसु | सप्तमी विभक्तिः | बहुवचनम् | राजन् (पुंलिङ्गः) — राजाओं में |
पहचानने की कुंजी (विभक्ति-चिह्न):
- -म् (विद्याम्) → द्वितीया एकवचन — ‘को’।
- -एन / -या (कलहेन, विद्यया) → तृतीया एकवचन — ‘से/द्वारा’।
- -आय (ज्ञानाय, दानाय) → चतुर्थी एकवचन — ‘के लिए’।
- -स्य (धनस्य) → षष्ठी एकवचन; -आनाम् / -ाणाम् (नराणाम्, ताराणाम्) → षष्ठी बहुवचन — ‘का/के/की’।
- -ए (मर्त्यलोके) → सप्तमी एकवचन; -सु / -षु (राजसु, धनेषु) → सप्तमी बहुवचन — ‘में/पर’।
सावधानी: नराणाम् में ‘ण’ है, ‘न’ नहीं — णत्व-विधान के कारण (‘र्’ के बाद ‘न्’ का ‘ण्’ हो जाता है)। तथा राजसु ‘राजन्’ शब्द का सप्तमी बहुवचन है, इसमें ‘न्’ लुप्त हो गया है।