अन्वयः — विद्याभ्यासः, तपः, ज्ञानम्, इन्द्रियाणां संयमः, अहिंसा, गुरुसेवा च — (एतत्) परं निःश्रेयसकरम् (अस्ति) ।
अर्थः — विद्या का अभ्यास, तप, ज्ञान, इन्द्रियों का संयम, अहिंसा और गुरु की सेवा — ये सब परम कल्याण करने वाले हैं।
भावः — श्लोक छह साधन गिनाता है जो मनुष्य को निःश्रेयस (परम कल्याण/मोक्ष) तक पहुँचाते हैं। ध्यान दीजिए कि इनमें केवल पढ़ाई नहीं है — संयम, अहिंसा और गुरुसेवा भी हैं। अर्थात् विद्या तभी फलती है जब साथ में चरित्र हो।
सन्धि-विच्छेद: विद्याभ्यासस्तपः = विद्याभ्यासः + तपः; ज्ञानमिन्द्रियाणाम् = ज्ञानम् + इन्द्रियाणाम् । निःश्रेयसकरम् = निःश्रेयसं करोति इति (परम कल्याण करने वाला)।