दीपकम् अध्याय 7 कार्यकलापः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
कक्षायाः सर्वे छात्राः मिलित्वा अस्य नाटकस्य अभिनयं कुर्वन्तु।
उत्तर

यह अभिनय-कार्य है — कक्षा के सब छात्र मिलकर इस नाटक का मंचन करें। पाठ के आरम्भ में ही आचार्या कहती हैं — ‘अनन्तरम् अभिनयसहितं नाटकमपि करिष्यामः।’ अर्थात् यह कार्य पाठ की ही योजना का अंग है।

पात्र-विभाजनम् (कुल लगभग १०–१२ छात्र) —

पात्रम्कः / कासङ्केतः (अभिनय कैसे करें)
अध्यापिकाआरम्भ और अन्त की कड़ी — शान्त, स्नेहपूर्ण स्वर
हिरण्यकशिपुःऊँचा गर्वभरा स्वर, अट्टहास — ‘ह ह ह ह....’
प्रह्लादःशान्त, निर्भय; हाथ जोड़कर ‘ॐ नमो नारायणाय’
होलिकापहले स्नेह का अभिनय, फिर कठोरता
नृसिंहःसिंहगर्जन, गम्भीर एवं भयानक स्वर
मन्त्री / दैत्यपुरोहितः / सेनापतिःमन्त्री अधोमुख होकर संकोच से बोले
राजभटः / सभासदः / दैत्याः३–४‘विजयतां महाराज ! विजयताम्।’ — समवेत स्वर

मंचन की विधि —

  1. दृश्य-विभाजन: (१) कक्षा का दृश्य, (२) हिरण्यकशिपु की सभा, (३) होलिका-दहन, (४) स्तम्भ-भङ्ग तथा नृसिंहावतार, (५) अध्यापिका का समापन-वाक्य।
  2. संवाद कण्ठस्थ करें — पाठ के संवाद ज्यों-के-त्यों बोलिए, अपनी ओर से हिन्दी न मिलाइए। कठिन शब्दों का अर्थ पहले समझ लीजिए, तभी भाव सही उतरेगा
  3. सामग्री (सरल): मुकुट के लिए गत्ता, तलवार के लिए पुट्ठा, अग्नि के लिए लाल-पीले कागज़ की लपटें। वास्तविक अग्नि का प्रयोग कदापि न करें।
  4. पार्श्वध्वनि: स्तम्भ-प्रहार के समय थाली बजाइए और नृसिंह के प्रवेश पर सामूहिक गर्जन कीजिए — इससे ‘महता गर्जनेन’ का प्रभाव बनेगा।
इससे क्या सीखेंगे: संवाद बोलने से संस्कृत का उच्चारण, विराम और स्वराघात स्वाभाविक रूप से आ जाता है; और नाटक करते-करते पूरा पाठ, उसकी तृतीया विभक्ति और लृट् लकार के प्रयोग सहित, अपने-आप कण्ठस्थ हो जाता है।
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