प्र1.
कक्षायाः सर्वे छात्राः मिलित्वा अस्य नाटकस्य अभिनयं कुर्वन्तु।
उत्तर
यह अभिनय-कार्य है — कक्षा के सब छात्र मिलकर इस नाटक का मंचन करें। पाठ के आरम्भ में ही आचार्या कहती हैं — ‘अनन्तरम् अभिनयसहितं नाटकमपि करिष्यामः।’ अर्थात् यह कार्य पाठ की ही योजना का अंग है।
पात्र-विभाजनम् (कुल लगभग १०–१२ छात्र) —
| पात्रम् | कः / का | सङ्केतः (अभिनय कैसे करें) |
|---|---|---|
| अध्यापिका | १ | आरम्भ और अन्त की कड़ी — शान्त, स्नेहपूर्ण स्वर |
| हिरण्यकशिपुः | १ | ऊँचा गर्वभरा स्वर, अट्टहास — ‘ह ह ह ह....’ |
| प्रह्लादः | १ | शान्त, निर्भय; हाथ जोड़कर ‘ॐ नमो नारायणाय’ |
| होलिका | १ | पहले स्नेह का अभिनय, फिर कठोरता |
| नृसिंहः | १ | सिंहगर्जन, गम्भीर एवं भयानक स्वर |
| मन्त्री / दैत्यपुरोहितः / सेनापतिः | ३ | मन्त्री अधोमुख होकर संकोच से बोले |
| राजभटः / सभासदः / दैत्याः | ३–४ | ‘विजयतां महाराज ! विजयताम्।’ — समवेत स्वर |
मंचन की विधि —
- दृश्य-विभाजन: (१) कक्षा का दृश्य, (२) हिरण्यकशिपु की सभा, (३) होलिका-दहन, (४) स्तम्भ-भङ्ग तथा नृसिंहावतार, (५) अध्यापिका का समापन-वाक्य।
- संवाद कण्ठस्थ करें — पाठ के संवाद ज्यों-के-त्यों बोलिए, अपनी ओर से हिन्दी न मिलाइए। कठिन शब्दों का अर्थ पहले समझ लीजिए, तभी भाव सही उतरेगा।
- सामग्री (सरल): मुकुट के लिए गत्ता, तलवार के लिए पुट्ठा, अग्नि के लिए लाल-पीले कागज़ की लपटें। वास्तविक अग्नि का प्रयोग कदापि न करें।
- पार्श्वध्वनि: स्तम्भ-प्रहार के समय थाली बजाइए और नृसिंह के प्रवेश पर सामूहिक गर्जन कीजिए — इससे ‘महता गर्जनेन’ का प्रभाव बनेगा।
इससे क्या सीखेंगे: संवाद बोलने से संस्कृत का उच्चारण, विराम और स्वराघात स्वाभाविक रूप से आ जाता है; और नाटक करते-करते पूरा पाठ, उसकी तृतीया विभक्ति और लृट् लकार के प्रयोग सहित, अपने-आप कण्ठस्थ हो जाता है।