दीपकम् अध्याय 7 वयम् अभ्यासं कुर्मः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
रमा + ईशः = ............... [उदाहरणम् — रमेशः]
उत्तर

रमा + ईशः = रमेशः (लक्ष्मी के स्वामी — विष्णु)

रमा () + ईशः () → आ + ई =
अतः रम् + + शः = रमेशः
नियम (गुणसन्धिः):आद्गुणः’ — यदि अ या आ के बाद इ या ई आए तो दोनों मिलकर हो जाते हैं। इसी प्रकार अ/आ + उ/ऊ = तथा अ/आ + ऋ = अर्। इस प्रश्न के सभी ग्यारह उदाहरण इसी एक नियम पर आधारित हैं।
पूरी सूची एक दृष्टि में: रमेशः • सुरेश्वरः • नागेन्द्रः • गजेन्द्रः • मातेव • रामेति • परोपकारः • ममोपरि • सूर्योदयः • रामेणोक्तम् • तस्योपरि।
प्र2.
सुर + ईश्वरः = ...............
उत्तर

सुर + ईश्वरः = सुरेश्वरः (देवताओं के ईश्वर — इन्द्र)

सुर + श्वरः → अ + ई =
सुर् + + श्वरः = सुरेश्वरः
नियम: गुणसन्धि — अ + ई = ए। यही रूप ‘सुरेशः’, ‘देवेश्वरः’, ‘नरेश्वरः’ में भी बनता है।
प्र3.
नाग + इन्द्रः = ...............
उत्तर

नाग + इन्द्रः = नागेन्द्रः (नागों का राजा)

नाग + न्द्रः → अ + इ =
नाग् + + न्द्रः = नागेन्द्रः
नियम: गुणसन्धि — अ + इ = ए। ‘इन्द्र’ शब्द के साथ बने अन्य पद — देव + इन्द्रः = देवेन्द्रः, सुर + इन्द्रः = सुरेन्द्रः, राज + इन्द्रः = राजेन्द्रः।
प्र4.
गज + इन्द्रः = ...............
उत्तर

गज + इन्द्रः = गजेन्द्रः (हाथियों में श्रेष्ठ — गजराज)

गज + न्द्रः → अ + इ =
गज् + + न्द्रः = गजेन्द्रः
अर्थ-सङ्केत: ‘इन्द्र’ का अर्थ यहाँ ‘श्रेष्ठ / राजा’ है, अतः गजेन्द्र = हाथियों में श्रेष्ठ। पुराण-प्रसिद्ध गजेन्द्रमोक्ष की कथा इसी शब्द से जुड़ी है — वहाँ भी नारायण ने ही रक्षा की थी, जैसे इस पाठ में प्रह्लाद की।
प्र5.
माता + इव = ...............
उत्तर

माता + इव = मातेव (माता के समान)

मात + व → आ + इ =
मात् + + व = मातेव
नियम: गुणसन्धि में पूर्वपद का ‘आ’ भी वही व्यवहार करता है जो ‘अ’ करता है — आ + इ = ए। इव उपमावाचक अव्यय है, इसलिए ‘मातेव’ का अर्थ ‘माता की तरह’ होता है।
वाक्यप्रयोगः: गुरुः मातेव शिष्यान् पालयति। (गुरु माता की तरह शिष्यों का पालन करता है।)
प्र6.
राम + इति = ...............
उत्तर

राम + इति = रामेति (‘राम’ — इस प्रकार)

राम + ति → अ + इ =
राम् + + ति = रामेति
प्रयोग: ‘इति’ उद्धरण-सूचक अव्यय है — जो कुछ कहा गया, उसे समाप्त करने के लिए आता है। जैसे पाठ में — ‘ईशावास्यम् इदं सर्वम्’ इति उच्यते।
प्र7.
पर + उपकारः = ...............
उत्तर

पर + उपकारः = परोपकारः (दूसरों का उपकार / भलाई)

पर + पकारः → अ + उ =
पर् + + पकारः = परोपकारः
नियम: यह भी गुणसन्धि ही है, केवल स्वर बदल गया — अ/आ + उ/ऊ = ओ। इसी नियम से — सूर्य + उदयः = सूर्योदयः, मम + उपरि = ममोपरि।
सुभाषितम्: परोपकाराय सतां विभूतयः। (सज्जनों का वैभव परोपकार के लिए होता है।)
प्र8.
मम + उपरि = ...............
उत्तर

मम + उपरि = ममोपरि (मेरे ऊपर)

मम + परि → अ + उ =
मम् + + परि = ममोपरि
नियम: गुणसन्धि — अ + उ = ओ। उपरि अव्यय है (ऊपर), जिसके योग में प्रायः षष्ठी विभक्ति आती है — जैसे ‘वृक्षस्य उपरि’ = वृक्षस्योपरि।
प्र9.
सूर्य + उदयः = ...............
उत्तर

सूर्य + उदयः = सूर्योदयः (सूर्य का उगना)

सूर्य + दयः → अ + उ =
सूर्य् + + दयः = सूर्योदयः
नियम: गुणसन्धि — अ + उ = ओ। इसी प्रकार चन्द्र + उदयः = चन्द्रोदयः तथा सूर्य + अस्तः = सूर्यास्तः (यह दीर्घसन्धि है, गुणसन्धि नहीं — ध्यान रखें)।
प्र10.
रामेण + उक्तम् = ...............
उत्तर

रामेण + उक्तम् = रामेणोक्तम् (राम के द्वारा कहा गया)

रामेण + क्तम् → अ + उ =
रामेण् + + क्तम् = रामेणोक्तम्
दोहरी सीख: यहाँ सन्धि के साथ इस पाठ का व्याकरण भी दिखता है — ‘रामेण’ तृतीया विभक्ति, एकवचन है, क्योंकि ‘उक्तम्’ कर्मवाच्य कृदन्त है और कर्मवाच्य में कर्ता तृतीया में आता है।
प्र11.
तस्य + उपरि = ...............
उत्तर

तस्य + उपरि = तस्योपरि (उसके ऊपर)

तस्य + परि → अ + उ =
तस्य् + + परि = तस्योपरि
नियम: गुणसन्धि — अ + उ = ओ। ‘तस्य’ तद् शब्द का षष्ठी विभक्ति, एकवचन, पुँल्लिङ्ग रूप है; ‘उपरि’ के योग में षष्ठी ही आती है।
अभ्यास हेतु: इसी नियम से जोड़िए — नर + उत्तमः = नरोत्तमः, हित + उपदेशः = हितोपदेशः, महा + उत्सवः = महोत्सवः
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