प्र1.
आचार्य ! ‘सूक्तिः’ इत्युक्ते कः अभिप्रायः ?
उत्तर
आचार्यः उत्तरं ददाति — सूक्तिः इत्युक्ते ‘सुन्दरं वचनम्’ । सूक्तिषु जीवनमूल्यानि निहितानि भवन्ति ।
[‘सूक्ति’ का अर्थ है ‘सुन्दर वचन’। सूक्तियों में जीवनमूल्य छिपे हुए रहते हैं।]
शब्द कैसे बना: सु + उक्तिः = सूक्तिः — ‘सु’ का अर्थ है ‘अच्छा, शोभन’ और ‘उक्तिः’ का अर्थ है ‘कथन’। दोनों में उ + उ मिलकर दीर्घ ऊ हो गया (सवर्णदीर्घ-सन्धि), इसलिए ‘सूक्तिः’ रूप बना। अतः सूक्ति = शोभना उक्तिः।
संवाद में आगे क्या-क्या कहा गया —
- छात्रा — अद्य मम माता माम् एकां सूक्तिं पाठितवती, ‘सत्यं वद, धर्मं चर’ इति । [आज मेरी माँ ने मुझे एक सूक्ति पढ़ाई — ‘सच बोलो, धर्म का आचरण करो’।]
- छात्रः — सूक्तयः अस्मान् सन्मार्गं प्रति नयन्ति इति अहं श्रुतवान् । [सूक्तियाँ हमें अच्छे मार्ग की ओर ले जाती हैं, ऐसा मैंने सुना है।]
- छात्राः — अस्मासु कुतूहलं वर्धते । वयम् एताः सूक्तीः पठामः । [हमारी उत्सुकता बढ़ रही है। हम ये सूक्तियाँ पढ़ेंगे।]
- आचार्यः — न केवलं पठामः अपितु स्मरामः, जीवने आचरामः च । [केवल पढ़ें ही नहीं, याद भी रखें और जीवन में आचरण भी करें।]
- आचार्यः — सूक्तयः जीवने अस्माकं मार्गदर्शनं कुर्वन्ति । संस्कृतसाहित्ये सूक्तीनां भाण्डागारः अस्ति । [सूक्तियाँ जीवन में हमारा मार्गदर्शन करती हैं। संस्कृत साहित्य सूक्तियों का भण्डार है।]
यही पाठ की कुंजी है: ‘पठामः → स्मरामः → आचरामः’ यह तीन-सीढ़ी वाला क्रम पूरे पाठ का सार है, और आठवीं सूक्ति ‘यस्तु क्रियावान् पुरुषः स विद्वान्’ इसी बात को दुहराती है।