दीपकम् अध्याय 8 पाठस्य सूक्तयः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः ॥१॥
उत्तर

पदच्छेदः — माता भूमिः पुत्रः अहम् पृथिव्याः ।

अन्वयः — भूमिः माता (अस्ति), अहं पृथिव्याः पुत्रः (अस्मि) ।

अर्थः (हिन्दी) — पृथ्वी मेरी माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ।

भावार्थः (पुस्तकानुसारम्)पृथ्वी अस्मान् माता इव लालयति पालयति च । अतः भूमिः अस्माकं सर्वेषां माता अस्ति । वयं सर्वे अस्याः पृथिव्याः सन्तानाः स्मः । एषा सर्वदा पूज्या अस्ति ।
[पृथ्वी हमें माँ की तरह दुलारती और पालती है। इसलिए भूमि हम सबकी माता है। हम सब इस पृथ्वी की सन्तान हैं। यह सदा पूजनीय है।]

भावः: जो हमें अन्न, जल, वायु और आश्रय देती है, वह माता ही है। इसीलिए पृथ्वी को ‘भूमिमाता’ कहा गया। इसका सीधा परिणाम यह है कि पर्यावरण की रक्षा कोई बाहरी कर्तव्य नहीं, अपनी माँ की सेवा है — कूड़ा न फैलाना, वृक्ष लगाना, जल न बहाना, यही इस सूक्ति का आचरण है।
स्रोतः: यह पंक्ति अथर्ववेद के भूमिसूक्त से ली गई है। व्याकरण: पृथिव्याः — षष्ठी विभक्तिः, एकवचनम्, स्त्रीलिङ्गः (‘पृथ्वी का’)। पुत्रोऽहम् = पुत्रः + अहम् (विसर्ग-सन्धि; ‘अ’ का लोप होकर अवग्रह ऽ आया)।
प्र2.
न रत्नमन्विष्यति, मृग्यते हि तत् ॥२॥
उत्तर

पदच्छेदः — न रत्नम् अन्विष्यति मृग्यते हि तत् ।

अन्वयः — रत्नं न अन्विष्यति, तत् मृग्यते हि ।

अर्थः (हिन्दी) — रत्न (किसी को) नहीं ढूँढ़ता, उसे ही ढूँढ़ा जाता है।

भावार्थः (पुस्तकानुसारम्)हीरकादीनि रत्नानि ग्राहकस्य अन्वेषणं न कुर्वन्ति अपितु ग्राहकाः एव रत्नानाम् अन्वेषणं कुर्वन्ति । तथैव अस्मासु यदि गुणाः सन्ति तर्हि गुणज्ञाः स्वयमेव अस्मान् अन्विष्य आगच्छन्ति ।
[हीरा आदि रत्न ग्राहक को नहीं खोजते, बल्कि ग्राहक ही रत्नों को खोजते हैं। उसी तरह यदि हममें गुण हैं तो गुणों के पारखी स्वयं ही हमें खोजते हुए आ जाते हैं।]

भावः: यहाँ रत्न और गुणी व्यक्ति की उपमा है। सन्देश यह है कि अपनी प्रशंसा करवाने के पीछे मत दौड़िए — योग्यता अर्जित कीजिए। योग्यता स्वयं पहचान बुला लाती है। ‘मुझे कोई पूछता ही नहीं’ की शिकायत का उत्तर यही है — पहले रत्न बनिए।
स्रोतः: कालिदास के कुमारसम्भवम् से। व्याकरण: अन्विष्यति = अन्वेषणं करोति (कर्तृवाच्यम् — ढूँढ़ता है); मृग्यते = अन्विष्यते (कर्मवाच्यम् — ढूँढ़ा जाता है)। एक ही सूक्ति में दोनों वाच्य आमने-सामने रखे गए हैं — यही इसकी सुन्दरता है।
प्र3.
शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् ॥३॥
उत्तर

पदच्छेदः — शरीरम् आद्यम् खलु धर्मसाधनम् ।

अन्वयः — शरीरं खलु आद्यं धर्मसाधनम् ।

अर्थः (हिन्दी) — शरीर ही निश्चय ही धर्म का पहला साधन है।

भावार्थः (पुस्तकानुसारम्)यदि अस्माकं शरीरं स्वस्थम् अस्ति तर्हि वयं स्वकर्तव्यस्य पालनं कर्तुं शक्नुमः, अतः अस्माभिः स्वशरीरस्य रक्षा सर्वथा करणीया, यतः शरीरम् एव धर्मपालनस्य प्रथमं साधनम् अस्ति ।
[यदि हमारा शरीर स्वस्थ है तभी हम अपने कर्तव्य का पालन कर सकते हैं, इसलिए हमें हर तरह से अपने शरीर की रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि शरीर ही धर्मपालन का पहला साधन है।]

भावः: ‘धर्म’ का अर्थ यहाँ केवल पूजा-पाठ नहीं, अपना कर्तव्य है। पढ़ाई, सेवा, परिश्रम — सब शरीर से ही होते हैं। रोगी शरीर से न पढ़ा जाता है, न किसी की सहायता की जाती है। इसीलिए आद्यम् (पहला) शब्द रखा गया — बाकी सब साधन बाद में, शरीर पहले।
आचरण कैसे करें: समय पर सोना और उठना, सन्तुलित भोजन, प्रतिदिन खेल या व्यायाम, स्वच्छता — यही इस सूक्ति का व्यावहारिक रूप है। स्रोतः: कालिदास के कुमारसम्भवम् से। व्याकरण: खलु एक अव्यय है, अर्थ — ‘निश्चय ही’।
प्र4.
क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत् ॥४॥
उत्तर

पदच्छेदः — क्षणशः कणशः च एव विद्याम् अर्थम् च साधयेत् ।

अन्वयः — क्षणशः (एव) विद्यां, कणशः एव अर्थं च साधयेत् ।

अर्थः (हिन्दी) — मनुष्य को पल-पल (का उपयोग करके) विद्या और कण-कण (जोड़कर) धन अर्जित करना चाहिए।

भावार्थः (पुस्तकानुसारम्)ज्ञानं प्राप्तुं समयस्य निरन्तरम् उपयोगः करणीयः । एकस्य अपि क्षणस्य नाशः न करणीयः । एवम् एव यदि कोऽपि धनस्य सङ्ग्रहं कर्तुम् इच्छति तर्हि सः निरन्तरं रूप्यकस्य सङ्ग्रहणं कुर्यात् । ‘क्षणत्यागे कुतो विद्या, कणत्यागे कुतो धनम् ।’
[ज्ञान पाने के लिए समय का लगातार उपयोग करना चाहिए। एक क्षण भी नष्ट नहीं करना चाहिए। इसी तरह जो धन जोड़ना चाहता है, उसे लगातार थोड़ा-थोड़ा जोड़ते रहना चाहिए। ‘क्षण छोड़ देने पर विद्या कहाँ, कण छोड़ देने पर धन कहाँ।’]

भावः: यह सूक्ति ‘थोड़ा-थोड़ा, पर रोज़’ का नियम सिखाती है। विद्या का माप क्षण है और धन का माप कण। जो कहता है ‘एक दिन में क्या बिगड़ जाएगा’, उसके ३६५ दिन ऐसे ही निकल जाते हैं। प्रतिदिन आधा घण्टा भी नियम से पढ़ा जाए तो वर्ष भर में वह बहुत बड़ा हो जाता है।
व्याकरण: क्षणशः, कणशः — ‘शस्’ प्रत्ययान्त अव्यय हैं; अर्थ — क्षणे क्षणे (हर क्षण), कणे कणे (हर कण में)। साधयेत् = सम्पादयेत् — विधिलिङ् लकार, प्रथमपुरुष एकवचन, अर्थ ‘करना चाहिए’। कणशश्चैव = कणशः + च + एव (विसर्ग-सन्धि तथा वृद्धि-सन्धि)।
प्र5.
सुखार्थिनः कुतो विद्या, कुतो विद्यार्थिनः सुखम् ॥५॥
उत्तर

पदच्छेदः — सुखार्थिनः कुतः विद्या कुतः विद्यार्थिनः सुखम् ।

अन्वयः — सुखार्थिनः विद्या कुतः (भवेत्), विद्यार्थिनः सुखं कुतः (भवेत्) ।

अर्थः (हिन्दी) — सुख चाहने वाले को विद्या कहाँ, और विद्या चाहने वाले को सुख (आराम) कहाँ ?

भावार्थः (पुस्तकानुसारम्)यः सदैव सुखम् इच्छति, परिश्रमं न करोति, अलसः अस्ति, सः कथं विद्यां प्राप्तुं शक्नोति ? अतः यः ज्ञानं लब्धुम् इच्छति सः आलस्यं सुखं च त्यक्त्वा निरन्तरं विद्यार्जनं कुर्यात् ।
[जो सदा सुख ही चाहता है, परिश्रम नहीं करता, आलसी है — वह भला विद्या कैसे पा सकता है? इसलिए जो ज्ञान पाना चाहता है उसे आलस्य और आराम छोड़कर लगातार विद्या अर्जित करनी चाहिए।]

भावः: यहाँ ‘सुख’ का अर्थ है आराम, आलस्य, सुविधा। सूक्ति कहती है कि विद्या और आराम एक साथ नहीं चल सकते — दोनों में से एक चुनना पड़ता है। पर ध्यान रहे, यह त्याग स्थायी नहीं है: आज का परिश्रम ही कल का सच्चा सुख बनता है।
व्याकरण: सुखार्थिनः = सुखम् इच्छतः — षष्ठी एकवचन, ‘सुख चाहने वाले का’। कुतः अव्यय है — ‘कहाँ से’। कुतो विद्या = कुतः + विद्या (विसर्ग-सन्धि — विसर्ग का ‘ओ’ हुआ)।
प्र6.
गुणाः पूजास्थानं गुणिषु न च लिङ्गं न च वयः ॥६॥
उत्तर

पदच्छेदः — गुणाः पूजास्थानं गुणिषु न च लिङ्गम् न च वयः ।

अन्वयः — गुणिषु गुणाः (एव) पूजास्थानं (भवन्ति), लिङ्गं च न (भवति), वयः च न (भवति) ।

अर्थः (हिन्दी) — गुणवानों में गुण ही आदर के स्थान होते हैं, न लिङ्ग (स्त्री-पुरुष होना) और न आयु।

भावार्थः (पुस्तकानुसारम्)गुणानां सर्वदा एव आदरः भवति । गुणवान् जनः पुरुषः स्त्री वा भवेत्, बालः वृद्धः वा भवेत्, सः सर्वदा पूजनीयः एव भवति । आदरस्य कृते लिङ्गम् आयुः वा महत्त्वपूर्णं न भवति ।
[गुणों का सदा आदर होता है। गुणवान् व्यक्ति पुरुष हो या स्त्री, बालक हो या वृद्ध — वह सदा आदरणीय ही होता है। आदर के लिए लिङ्ग या आयु महत्त्वपूर्ण नहीं है।]

भावः: यह सूक्ति समानता का पाठ पढ़ाती है। आदर की एकमात्र कसौटी गुण है — न कि ‘लड़का है या लड़की’, ‘बड़ा है या छोटा’। ध्रुव, प्रह्लाद और नचिकेता बालक ही थे, पर गुणों के कारण आज भी स्मरणीय हैं; गार्गी और मैत्रेयी स्त्रियाँ थीं, पर विद्वत्ता के कारण सभा में पूज्य थीं।
स्रोतः: भवभूति के उत्तररामचरितम् से। व्याकरण: गुणिषु — सप्तमी विभक्तिः, बहुवचनम् (‘गुणवानों में’)। वयः = अवस्था, आयु — सकारान्त नपुंसकलिङ्ग शब्द ‘वयस्’ का प्रथमा एकवचन।
प्र7.
मा ब्रूहि दीनं वचः ॥७॥
उत्तर

पदच्छेदः — मा ब्रूहि दीनम् वचः ।

अन्वयः — (त्वं) दीनं वचः मा ब्रूहि ।

अर्थः (हिन्दी) — तुम दीन (गिड़गिड़ाने वाला) वचन मत बोलो।

भावार्थः (पुस्तकानुसारम्)समाजे सर्वविधाः जनाः भवन्ति । केचित् साहाय्यं कुर्वन्ति । केचित् केवलं विकत्थनं कुर्वन्ति, अतः स्वाभिमानी जनः यस्य कस्यापि पुरतः साहाय्यस्य याचनां न कुर्यात् ।
[समाज में सब तरह के लोग होते हैं। कुछ सहायता करते हैं, कुछ केवल अपनी झूठी बड़ाई करते हैं; इसलिए स्वाभिमानी व्यक्ति को किसी के भी सामने सहायता की याचना नहीं करनी चाहिए।]

भावः: यह सूक्ति स्वाभिमान सिखाती है। ‘दीन वचन’ का अर्थ है — गिड़गिड़ाकर, अपने को छोटा दिखाकर माँगना। सूक्ति यह नहीं कहती कि सहायता कभी मत लो; वह यह कहती है कि आत्मसम्मान बेचकर मत लो। पहले अपने पुरुषार्थ पर भरोसा करो — और सहायता माँगनी ही पड़े तो सीधे, सम्मानपूर्वक माँगो।
व्याकरण: मा निषेधार्थक अव्यय है — इसके साथ लोट् लकार आता है, ‘न’ नहीं। ब्रूहि = वद (‘ब्रू’ धातु, लोट् लकार, मध्यमपुरुष एकवचन)। दीनम् = दैन्ययुक्तम्; यह वचः का विशेषण है, इसलिए दोनों नपुंसकलिङ्ग द्वितीया एकवचन में हैं।
प्र8.
यस्तु क्रियावान् पुरुषः स विद्वान् ॥८॥
उत्तर

पदच्छेदः — यः तु क्रियावान् पुरुषः सः विद्वान् ।

अन्वयः — यः तु क्रियावान् पुरुषः सः विद्वान् (भवति) ।

अर्थः (हिन्दी) — जो पुरुष क्रियाशील (कर्म करने वाला) है, वही विद्वान् है।

भावार्थः (पुस्तकानुसारम्)अर्जितस्य ज्ञानस्य जीवने आचरणेन, व्यवहारे च प्रयोगेण हि मनुष्यः वास्तविकः विद्वान् भवति, न तु केवलम् अध्ययनेन । विद्या अनुकूल-कर्मणा विना व्यर्था भवति । ‘ज्ञानं भारः क्रियां विना’ ।
[अर्जित किए हुए ज्ञान को जीवन में आचरण और व्यवहार में प्रयोग करने से ही मनुष्य सच्चा विद्वान् बनता है, केवल पढ़ लेने से नहीं। अनुकूल कर्म के बिना विद्या व्यर्थ है। ‘क्रिया के बिना ज्ञान बोझ है’।]

भावः: पुस्तक कण्ठस्थ कर लेना विद्वत्ता नहीं है। तैरने के सौ श्लोक याद हों पर जल में उतरना न आता हो, तो वह ज्ञान भार ही है। पाठ के आरम्भिक संवाद में आचार्य ने यही कहा था — ‘न केवलं पठामः अपितु स्मरामः, जीवने आचरामः च’। इसी को यह सूक्ति एक पंक्ति में कह देती है।
व्याकरण: यः … सः — यह यत्-तत् सम्बन्ध है (जो … वह)। क्रियावान् = क्रियाशीलः — ‘क्रिया’ शब्द से ‘मतुप्’ प्रत्यय लगकर बना, अर्थ ‘क्रियावाला’। यस्तु = यः + तु (विसर्ग-सन्धि — विसर्ग का ‘स्’ हुआ)।
प्र9.
शीलं परं भूषणम् ॥९॥
उत्तर

पदच्छेदः — शीलम् परम् भूषणम् ।

अन्वयः — शीलं परं भूषणम् (अस्ति) ।

अर्थः (हिन्दी) — शील (सदाचरण) ही सबसे श्रेष्ठ आभूषण है।

भावार्थः (पुस्तकानुसारम्)मनुष्यस्य आचरणम् एव श्रेष्ठम् आभूषणम् अस्ति । सदाचारं विना अन्ये गुणाः निरर्थकाः भवन्ति ।
[मनुष्य का आचरण ही सर्वश्रेष्ठ आभूषण है। सदाचार के बिना दूसरे गुण निरर्थक हो जाते हैं।]

भावः: सोने-चाँदी के गहने शरीर को सजाते हैं, पर वे उतारे भी जा सकते हैं और चुराए भी जा सकते हैं। शील — अर्थात् सच्चाई, विनय, दया, संयम — ऐसा गहना है जो न उतरता है, न चुराया जा सकता है, और जो व्यक्ति के साथ सदा रहता है। इसलिए इसे परं भूषणम् (सर्वश्रेष्ठ आभूषण) कहा गया।
व्याकरण: तीनों पद — शीलम्, परम्, भूषणम् — नपुंसकलिङ्ग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन में हैं, क्योंकि विशेषण अपने विशेष्य के लिङ्ग-वचन-विभक्ति का अनुसरण करता है। ‘अस्ति’ क्रिया यहाँ अध्याहृत (छिपी हुई) है।
प्र10.
हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः ॥१०॥
उत्तर

पदच्छेदः — हितम् मनोहारि च दुर्लभम् वचः ।

अन्वयः — हितं मनोहारि च वचः दुर्लभं (भवति) ।

अर्थः (हिन्दी) — जो वचन हितकारी भी हो और मन को हरने वाला भी हो, वह दुर्लभ होता है।

भावार्थः (पुस्तकानुसारम्)केचन हितकारकं वचनं वदन्ति किन्तु तत् कठोरतया वदन्ति । केचन मनोरञ्जकं वाक्यं वदन्ति किन्तु तत् हितकारकं न भवति । तादृशं वचनं दुर्लभं भवति यत् हितकारकम् अपि स्यात्, मनोरमम् अपि स्यात् ।
[कुछ लोग हितकारी बात कहते हैं, पर कठोरता से कहते हैं। कुछ लोग मनोरञ्जक बात कहते हैं, पर वह हितकारी नहीं होती। ऐसा वचन दुर्लभ होता है जो हितकारी भी हो और मन को भाने वाला भी।]

चार प्रकार के वचन — एक तालिका में देखिए:

वचनम्हितकारकम् ?मनोहारि ?उदाहरणम् / परिणामः
कठोरं सत्यम्आम्‘तुम मूर्ख हो, पढ़ो!’ — बात सही, पर सुनने वाला चोट खाकर मुँह फेर लेता है
मधुरं चाटुवचनम्आम्चापलूसी — सुनने में मीठी, पर हानि करती है
कठोरम् अहितं चगाली, अपमान — सर्वथा त्याज्य
हितं मनोहारि चआम्आम्‘तुम इससे बेहतर कर सकते हो, थोड़ा और अभ्यास करो’ — यही दुर्लभ है
भावः: सत्य बोलना ही पर्याप्त नहीं; कैसे बोला जाए, यह भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। सत्य को मधुरता के साथ कहना एक कला है और यही सबसे कठिन है — इसीलिए इसे दुर्लभम् कहा गया। यही पाठ का शीर्षक भी है।
स्रोतः: महाकवि भारवि के किरातार्जुनीयम् से। व्याकरण: मनोहारि = मनः हरति इति — मन को हरने वाला (यहाँ नपुंसकलिङ्ग प्रथमा एकवचन)। वचः — सकारान्त नपुंसकलिङ्ग शब्द ‘वचस्’ का प्रथमा एकवचन।
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