दीपकम् अध्याय 8 परियोजनाकार्यम्

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
अन्तर्जालस्य (Internet) साहाय्येन एतादृशीनां प्रेरणादायिकानां दशानां सूक्तीनां सङ्ग्रहणं कृत्वा भित्तिपत्रम् एकं रचयन्तु ।
उत्तर

यह करके दिखाने वाला कार्य है। एक चार्ट-पेपर लीजिए, ऊपर शीर्षक लिखिए — ‘सुभाषितानि — दश प्रेरणादायिन्यः सूक्तयः’ — और नीचे दस खाने बनाकर हर खाने में एक सूक्ति, उसका हिन्दी अर्थ तथा एक छोटा चित्र दीजिए।

अच्छे भित्तिपत्र में ये चार बातें अवश्य हों —

  1. सूक्ति देवनागरी में शुद्ध वर्तनी के साथ, बड़े अक्षरों में;
  2. उसका हिन्दी (या मातृभाषा में) अर्थ एक पंक्ति में;
  3. ग्रन्थ का नाम, जहाँ से वह ली गई है;
  4. अर्थ को समझाने वाला छोटा चित्र या प्रतीक — जैसे ‘शरीरमाद्यं…’ के साथ दौड़ता हुआ बालक।

नमूना उत्तर (दस सूक्तियाँ, जिन्हें आप सीधे उतार सकते हैं) —

क्रमःसूक्तिःहिन्दी अर्थग्रन्थः
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैःकाम परिश्रम से सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा करने से नहींहितोपदेशः
सत्यमेव जयते नानृतम्सत्य की ही विजय होती है, असत्य की नहींमुण्डकोपनिषद्
विद्या ददाति विनयम्विद्या विनम्रता देती हैहितोपदेशः
परोपकाराय सतां विभूतयःसज्जनों की सम्पत्ति परोपकार के लिए होती हैसुभाषितम्
वसुधैव कुटुम्बकम्सारी पृथ्वी ही एक परिवार हैमहोपनिषद्
अहिंसा परमो धर्मःअहिंसा सबसे बड़ा धर्म हैमहाभारतम्
मातृदेवो भव, पितृदेवो भवमाता को देव मानो, पिता को देव मानोतैत्तिरीयोपनिषद्
क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां नोपकरणेबड़ों की सफलता उनके सामर्थ्य से होती है, साधनों से नहींकिरातार्जुनीयम्
सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाःसब सुखी हों, सब निरोग होंसुभाषितम् / शान्तिपाठः
१०आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुःआलस्य मनुष्यों का शरीर में बैठा हुआ सबसे बड़ा शत्रु हैहितोपदेशः
खोज कैसे करें: अन्तर्जाल पर ‘संस्कृत सुभाषितानि’, ‘सुभाषितरत्नभाण्डागारम्’ अथवा NCERT/CIIL की संस्कृत साइटों पर खोजिए। जो सूक्ति मिले, उसकी वर्तनी दो स्रोतों से मिलाकर जाँचिए — इन्टरनेट पर संस्कृत की वर्तनी में अशुद्धियाँ बहुत मिलती हैं।
सजावट का सुझाव: चार्ट के बीच में एक दीपक बनाइए (पुस्तक का नाम ‘दीपकम्’ है!) और उसकी दस किरणों पर दस सूक्तियाँ लिखिए। कक्षा की भित्ति पर लगाइए और हर सप्ताह एक सूक्ति पर चर्चा कीजिए।
प्र2.
स्वमातृभाषायां प्रसिद्धाः कतिचन सूक्तीः लिखन्तु ।
उत्तर

यहाँ आपको अपनी मातृभाषा की कहावतें/सूक्तियाँ लिखनी हैं। अच्छे उत्तर में — (1) सूक्ति ज्यों-की-त्यों, (2) उसका अर्थ, और (3) पाठ की जिस संस्कृत सूक्ति से वह मिलती है उसका नाम — तीनों हों।

नमूना उत्तर (हिन्दी की प्रसिद्ध सूक्तियाँ) —

मातृभाषा (हिन्दी) की सूक्तिअर्थपाठ की मिलती-जुलती सूक्ति
बूँद-बूँद से घड़ा भरता हैथोड़ा-थोड़ा करके ही बड़ा संग्रह होता हैक्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत्
पहला सुख निरोगी कायासबसे पहला सुख स्वस्थ शरीर हैशरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्
कथनी से करनी भलीकहने से करना अच्छा हैयस्तु क्रियावान् पुरुषः स विद्वान्
जो सोवत है सो खोवत हैआलसी सब कुछ गँवा देता हैसुखार्थिनः कुतो विद्या
ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय / औरन को सीतल करे, आपहु सीतल होयऐसी वाणी बोलिए जो दूसरों को भी शीतल करे और स्वयं को भीहितं मनोहारि च दुर्लभं वचः
हीरा मुख से ना कहे, लाख टका मेरो मोलगुणी अपनी बड़ाई स्वयं नहीं करतान रत्नमन्विष्यति, मृग्यते हि तत्
अपनी भाषा में कीजिए: यदि आपकी मातृभाषा मराठी, तमिल, बांग्ला, गुजराती, असमिया, कन्नड आदि है तो उसी की कहावतें लिखिए — जैसे मराठी में ‘थेंबे थेंबे तळे साचे’ (बूँद-बूँद से तालाब भरता है) — यह भी ‘क्षणशः कणशः’ वाली सूक्ति के समान है। घर के बड़ों से पूछकर कम-से-कम पाँच कहावतें एकत्र कीजिए।
प्र3.
एताः सूक्तीः पठित्वा भवतां मनसि कः विचारः उत्पद्यते इति स्वभाषया लिखन्तु ।
उत्तर

यह आपके अपने विचार का प्रश्न है — इसका कोई एक ‘सही’ उत्तर नहीं। अच्छे उत्तर में तीन बातें होनी चाहिए — (1) कौन-सी सूक्ति ने सबसे अधिक प्रभावित किया, (2) क्यों, और (3) उसे अपने जीवन में कैसे उतारेंगे — एक ठोस उदाहरण के साथ।

नमूना उत्तर (हिन्दी में) —

इन दस सूक्तियों को पढ़कर मेरे मन में सबसे पहले यह विचार आया कि संस्कृत की एक छोटी-सी पंक्ति में कितनी बड़ी बात भर दी गई है। मुझे सबसे अधिक ‘यस्तु क्रियावान् पुरुषः स विद्वान्’ ने प्रभावित किया। मैं अब तक यही समझता था कि जो जितना अधिक पढ़ ले, वह उतना बड़ा विद्वान्। पर इस सूक्ति ने बताया कि पढ़ी हुई बात जब तक आचरण में न उतरे, तब तक वह केवल बोझ है — ‘ज्ञानं भारः क्रियां विना’। मुझे लगा कि मैं स्वच्छता के बारे में बहुत कुछ जानता हूँ, पर कक्षा में कागज़ नीचे गिरा देखकर उठाता नहीं था। अब से मैं ऐसा नहीं करूँगा। इसी तरह ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’ पढ़कर मैंने तय किया कि प्रतिदिन आधा घण्टा खेलूँगा, और ‘क्षणशः कणशश्चैव…’ पढ़कर तय किया कि प्रतिदिन नियम से पढ़ूँगा, परीक्षा के समय ही नहीं। सबसे सुन्दर मुझे पाठ का शीर्षक ही लगा — ‘हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः’ — सच बोलना ही काफ़ी नहीं, उसे मीठे ढंग से कहना भी सीखना है। यही मेरे लिए इस पाठ की सबसे बड़ी सीख है।

अपना उत्तर कैसे लिखें: नमूना उत्तर की नक़ल मत कीजिए — उसका ढाँचा लीजिए। किसी एक सूक्ति को चुनिए, अपने जीवन की एक सच्ची घटना से उसे जोड़िए, और एक संकल्प लिखिए। पाँच-छह वाक्य पर्याप्त हैं।
संस्कृत में लिखना चाहें तो: ‘एताः सूक्तीः पठित्वा अहम् अचिन्तयम् — ज्ञानं क्रियया एव सफलं भवति । अतः अहम् अद्यप्रभृति यत् पठामि तत् जीवने आचरिष्यामि ।’ प्रश्न में ‘स्वभाषया’ कहा गया है, इसलिए मातृभाषा में लिखना भी पूर्णतः स्वीकार्य है।
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