दीपकम् अध्याय 9 पाठे विद्यमानाः प्रश्नाः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
अम्ब ! मम काचिद् जिज्ञासा अस्ति। वयं मनुष्याः प्राणिनः कीटाः च कथं भूलोके आगताः ?
उत्तर

माता उत्तरं ददाति — वत्से ! तदर्थं भवती प्रथमं पृथिव्याः उत्पत्तिक्रमं जानीयात् ।
[बेटी! इसके लिए तुम्हें पहले पृथ्वी की उत्पत्ति का क्रम जानना चाहिए।]

उत्तर का आशय: मनुष्य, प्राणी और कीट अचानक नहीं आए। पहले ब्रह्म से आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथिवी, पृथिवी से ओषधि-सस्य, सस्य से आहार और आहार से कीट, प्राणी तथा मनुष्य उत्पन्न हुए। यही ‘उत्पत्तिक्रमः’ है।
शब्द-रचना: जानीयात् = ज्ञा धातु, विधिलिङ् लकार (चाहिए-अर्थ), प्रथमपुरुष एकवचन। तदर्थम् अव्यय है, जिसका अर्थ पाठ के शब्दार्थ में ‘अतः’ (इसलिए) दिया गया है।
प्र2.
ब्रह्म इत्युक्ते किम् अम्ब ?
उत्तर

ब्रह्म इत्युक्ते चेतना-शक्तिः, ऊर्जा वा या सर्वत्र व्याप्ता अस्ति। यथा — आकाशः अणुः च सर्वत्र व्याप्तः अस्ति ।
[‘ब्रह्म’ का अर्थ है वह चेतना-शक्ति अथवा ऊर्जा जो सर्वत्र फैली हुई है — जैसे आकाश और अणु सब जगह व्याप्त हैं।]

क्यों यह उत्तर महत्त्वपूर्ण है: पाठ ‘ब्रह्म’ को किसी रूप या मूर्ति के रूप में नहीं, अपितु सर्वव्यापी चेतन ऊर्जा के रूप में समझाता है। शब्दार्थ-तालिका में भी ब्रह्म = ‘समष्टि-चिति-शक्तिः / सर्वव्याप्तः परमेश्वरः’ (Omnipresent Conscious Power & Energy) दिया गया है। इसी कारण आगे कहा गया कि ब्रह्म से आकाश उत्पन्न हुआ।
व्याकरण: इत्युक्ते = इति + उक्ते (यण् सन्धि) — ‘ऐसा कहने पर’। ब्रह्मणः पञ्चमी एकवचन है — ‘ब्रह्म से’।
प्र3.
अनन्तरम् ?
उत्तर

आकाशात् वायुः उत्पन्नः ।
[आकाश से वायु उत्पन्न हुई।]

पञ्चमी विभक्ति देखिए: ‘आकाशात्’ में अपादान कारक है — जिससे कोई वस्तु निकलती/उत्पन्न होती है, वहाँ पञ्चमी आती है। प्रश्न बनेगा — कस्मात् वायुः उत्पन्नः ?
शब्दार्थ: अनन्तरम् = ततः परम् (उसके बाद)।
प्र4.
अम्ब ! पृथिवी कदा उत्पन्ना ?
उत्तर

शृणोतु, वदामि। वायोः अग्निः उत्पन्नः । … (क्रमेण) … अग्नेः जलस्य उत्पत्तिः अभवत्, जलात् पृथिव्याः उत्पत्तिः अभवत् ।
[सुनिए, बताती हूँ। वायु से अग्नि उत्पन्न हुई; अग्नि से जल की उत्पत्ति हुई और जल से पृथ्वी की उत्पत्ति हुई।]

ध्यान दें: माता सीधे उत्तर नहीं देती, क्रम से बताती है — क्योंकि पृथिवी सृष्टि का पाँचवाँ तत्त्व है। आकाश (1) → वायु (2) → अग्नि (3) → जल (4) → पृथिवी (5)। ये ही पञ्चमहाभूत हैं।
रूप: शृणोतु = श्रु धातु, लोट् लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (आदरपूर्वक ‘सुनिए’)। वायोः = उकारान्त पुंलिङ्ग ‘वायु’ का पञ्चमी एकवचन।
प्र5.
एतत् सर्वं किमर्थम् अम्ब ? साक्षात् मनुष्याणाम् उत्पत्तिं वदतु।
उत्तर

अयि वत्से ! एतत् सर्वं नास्ति चेत् कथं मनुष्याः प्राणिनः वा जीवन्ति ?
[अरी बेटी! यदि यह सब न हो तो मनुष्य अथवा प्राणी जिएँगे कैसे?]

माता का तर्क: मनुष्य अकेले जीवित नहीं रह सकता। जीने के लिए वायु, जल, अग्नि (ताप), पृथिवी और अन्न — सब चाहिए। इसीलिए सृष्टि में मनुष्य सबसे अन्त में आता है; पहले उसका पूरा जीवन-आधार बनता है।
पुत्री का उत्तर भी देखिए: ‘जलम् आहारः वायुः च अस्ति चेत् पर्याप्तं खलु !’ — जल, आहार और वायु हों तो बस पर्याप्त है। इस पर माता कहती है — ‘आम्, अतः तेषामपि उत्पत्तिं जानातु।’
प्र6.
तर्हि अग्नेः कस्य उत्पत्तिः अभवत् ?
उत्तर

अग्नेः जलस्य उत्पत्तिः अभवत् ।
[अग्नि से जल की उत्पत्ति हुई।]

दो विभक्तियाँ एक ही वाक्य में: अग्नेः — पञ्चमी एकवचन (अपादान, ‘अग्नि से’); जलस्य — षष्ठी एकवचन (सम्बन्ध, ‘जल की’)। इसलिए ‘अग्नेः जलस्य उत्पत्तिः’ का अर्थ ‘अग्नि से जल की उत्पत्ति’ है।
प्र7.
जलात् मनुष्यस्य उत्पत्तिः खलु ?
उत्तर

नैव वत्से ! जलात् पृथिव्याः उत्पत्तिः अभवत् ।
[नहीं बेटी! जल से पृथ्वी की उत्पत्ति हुई।]

पुत्री की भूल और सुधार: पुत्री जल से सीधे मनुष्य की उत्पत्ति समझ बैठी। माता ठीक करती है — जल से पृथिवी, पृथिवी से ओषधि-सस्य-वृक्ष, सस्य से आहार और आहार से कीट, प्राणी तथा मनुष्य। इसी पर पुत्री कहती है — ‘अहो ! सत्यम्, अहं विस्मृतवती एव।’
रूप: पृथिव्याः = ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग ‘पृथिवी’ का पञ्चमी/षष्ठी एकवचन। यहाँ ‘उत्पत्तिः’ के साथ यह षष्ठी है — ‘पृथ्वी की उत्पत्ति’।
प्र8.
आहारात् कीटाः, प्राणिनः, मनुष्याः उत्पन्नाः खलु अम्ब ?
उत्तर

आम् । अहो ! मम पुत्री बहु चतुरा अस्ति। सत्यम् उक्तवती भवती ।
[हाँ। अरे! मेरी बेटी बहुत चतुर है। तुमने ठीक कहा।]

यही पाठ का शीर्षक है:अन्नाद् भवन्ति भूतानि’ — अन्न से ही समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं। तैत्तिरीयोपनिषद् में भी कहा गया — ‘ओषधिभ्योऽन्नम्। अन्नात् पुरुषः।’
सन्धि: अन्नात् + भवन्ति = अन्नाद् भवन्ति (जश्त्व सन्धि — त् के बाद घोष वर्ण आने पर त् → द्)।
प्र9.
अम्ब ! भवती एतत् सर्वं कथं जानाति ?
उत्तर

अहम् आधुनिकं रसायनशास्त्रम् उपनिषद्-ग्रन्थान् च पठितवती ।
[मैंने आधुनिक रसायनशास्त्र और उपनिषद्-ग्रन्थ पढ़े हैं।]

तदा माता उपदिशति — सत्यं वत्से ! अवश्यम् उपनिषद्-ग्रन्थाः पठनीयाः। यतः अस्माकं भारतस्य मौलिकं ज्ञानं तेषु निहितम् अस्ति। तेन अस्माकं जीवनस्य अपि उत्कर्षः भवति ।
[उपनिषद्-ग्रन्थ अवश्य पढ़ने चाहिए, क्योंकि हमारे भारत का मौलिक ज्ञान उन्हीं में निहित है; उससे हमारे जीवन का उत्कर्ष भी होता है।]

पाठ का निष्कर्ष: प्राचीन उपनिषद्-ज्ञान और आधुनिक विज्ञान परस्पर विरोधी नहीं हैं। माता दोनों पढ़ती है — इसीलिए वह सृष्टिक्रम को भी जानती है और द्रव्यों की अवस्थाओं (States of Matter) को भी।
व्याकरण: भवती (आदरार्थक) के साथ क्रिया प्रथमपुरुष में आती है — ‘भवती जानाति’, न कि ‘भवती जानासि’। पठितवती स्त्रीलिङ्ग भूतकालिक कृदन्त है (पुंलिङ्ग — पठितवान्)।
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