दीपकम् अध्याय 9 वयम् अभ्यासं कुर्मः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
शिष्यः — शुक्राचार्यः, आचार्यः — महादेवः (उदाहरणम्)
उत्तर

यह पुस्तक का उदाहरण है —

शुक्राचार्यः महादेवात् विद्यां प्राप्तवान् ।
[शुक्राचार्य ने महादेव से विद्या प्राप्त की।]

वाक्य बनाने का साँचा: शिष्यः (प्रथमा) + आचार्यः (पञ्चमी) + विद्यां प्राप्तवान्। जिससे विद्या मिलती है, वह अपादान है, इसलिए आचार्य का नाम पञ्चमी विभक्ति में आता है — महादेवः → महादेवात्
नियम: ‘आख्यातोपयोगे’ — गुरु से विद्या ग्रहण करने के अर्थ में गुरुवाचक पद में पञ्चमी होती है, जैसे ‘छात्रः उपाध्यायात् अधीते’।
प्र2.
शिष्यः — पद्मपादः, आचार्यः — शङ्कराचार्यः
उत्तर

पद्मपादः शङ्कराचार्यात् विद्यां प्राप्तवान् ।
[पद्मपाद ने शंकराचार्य से विद्या प्राप्त की।]

जानकारी: पद्मपाद आदि शंकराचार्य के चार प्रमुख शिष्यों में से एक थे (अन्य — सुरेश्वरः, हस्तामलकः, तोटकः)।
प्र3.
शिष्यः — विवेकानन्दः, आचार्यः — रामकृष्णः
उत्तर

विवेकानन्दः रामकृष्णात् विद्यां प्राप्तवान् ।
[विवेकानन्द ने रामकृष्ण से विद्या प्राप्त की।]

जानकारी: स्वामी विवेकानन्द के गुरु श्रीरामकृष्ण परमहंस थे; उन्हीं की प्रेरणा से विवेकानन्द ने शिकागो (1893) में भारतीय ज्ञान का प्रसार किया।
प्र4.
शिष्यः — रामः, आचार्यः — वसिष्ठः
उत्तर

रामः वसिष्ठात् विद्यां प्राप्तवान् ।
[राम ने वसिष्ठ से विद्या प्राप्त की।]

जानकारी: महर्षि वसिष्ठ अयोध्या के राजगुरु थे और श्रीराम तथा उनके भाइयों के आचार्य थे।
प्र5.
शिष्यः — भीष्मः, आचार्यः — परशुरामः
उत्तर

भीष्मः परशुरामात् विद्यां प्राप्तवान् ।
[भीष्म ने परशुराम से विद्या प्राप्त की।]

पुस्तक की छपाई पर ध्यान दें: पृष्ठ 101 पर (घ) रामः – वसिष्ठः है और पृष्ठ 102 पर फिर से (घ) भीष्मः – परशुरामः छपा है। क्रम इस प्रकार होना चाहिए — (क) शुक्राचार्यः, (ख) पद्मपादः, (ग) विवेकानन्दः, (घ) रामः, (ङ) भीष्मः, (च) चन्द्रगुप्तः, (छ) अर्जुनः।
प्र6.
शिष्यः — चन्द्रगुप्तः, आचार्यः — चाणक्यः
उत्तर

चन्द्रगुप्तः चाणक्यात् विद्यां प्राप्तवान् ।
[चन्द्रगुप्त ने चाणक्य से विद्या प्राप्त की।]

जानकारी: आचार्य चाणक्य (कौटिल्य/विष्णुगुप्त) ने चन्द्रगुप्त मौर्य को शिक्षित कर मगध का सम्राट् बनाया; उन्हीं का ग्रन्थ है अर्थशास्त्रम्
प्र7.
शिष्यः — अर्जुनः, आचार्यः — द्रोणाचार्यः
उत्तर

अर्जुनः द्रोणाचार्यात् विद्यां प्राप्तवान् ।
[अर्जुन ने द्रोणाचार्य से विद्या प्राप्त की।]

सातों वाक्यों का एक ही रूप: शिष्य का नाम प्रथमा में, आचार्य का नाम पञ्चमी में (–आत्), और क्रिया ‘विद्यां प्राप्तवान्’। इसी प्रकार आप लिख सकते हैं — ‘एकलव्यः द्रोणाचार्यात् विद्यां प्राप्तवान्’, ‘कर्णः परशुरामात् विद्यां प्राप्तवान्’।
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