अन्वयः — तस्मात् वै एतस्मात् आत्मनः आकाशः सम्भूतः। आकाशात् वायुः (सम्भूतः)। वायोः अग्निः (सम्भूतः)। अग्नेः आपः (सम्भूताः)। अद्भ्यः पृथिवी (सम्भूता)। पृथिव्याः ओषधयः (सम्भूताः)। ओषधिभ्यः अन्नम् (सम्भूतम्)। अन्नात् पुरुषः (सम्भूतः)।
अर्थः (हिन्दी) — उसी इस आत्मा (ब्रह्म) से आकाश उत्पन्न हुआ। आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथिवी, पृथिवी से ओषधियाँ, ओषधियों से अन्न और अन्न से पुरुष (मनुष्य) उत्पन्न हुआ।
भावः — सृष्टि किसी क्रम-रहित घटना का परिणाम नहीं है; उसका एक निश्चित क्रम है। सबका मूल एक ही चेतन तत्त्व (आत्मा/ब्रह्म) है और उसी से क्रमशः पञ्चमहाभूत, फिर वनस्पति, फिर अन्न और अन्त में मनुष्य बना। इसका सन्देश यह है कि मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं, उसकी अन्तिम कड़ी है — इसलिए वायु, जल, पृथिवी, वृक्ष और अन्न की रक्षा करना ही मनुष्य की रक्षा करना है। यही पाठ का शीर्षक भी कहता है — ‘अन्नाद् भवन्ति भूतानि’।
| सन्धिपदम् | सन्धिविच्छेदः | सन्धेः नाम |
|---|---|---|
| तस्माद्वा | तस्मात् + वा | जश्त्वसन्धिः |
| आकाशाद्वायुः | आकाशात् + वायुः | जश्त्वसन्धिः |
| वायोरग्निः | वायोः + अग्निः | विसर्गसन्धिः (रेफादेशः) |
| अग्नेरापः | अग्नेः + आपः | विसर्गसन्धिः (रेफादेशः) |
| पृथिव्या ओषधयः | पृथिव्याः + ओषधयः | विसर्गसन्धिः (विसर्गलोपः) |
| ओषधिभ्योऽन्नम् | ओषधिभ्यः + अन्नम् | विसर्गसन्धिः (पूर्वरूपम्) |