दीपकम् अध्याय 9 योग्यताविस्तारः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
अत्र इदम् अवधेयम् — “तस्माद्वा एतस्मात् आत्मनः आकाशः सम्भूतः। आकाशाद्वायुः। वायोरग्निः। अग्नेरापः। अद्भ्यः पृथिवी। पृथिव्या ओषधयः। ओषधिभ्योऽन्नम्। अन्नात् पुरुषः॥” — तैत्तिरीयोपनिषत् २-१-२
उत्तर

अन्वयः — तस्मात् वै एतस्मात् आत्मनः आकाशः सम्भूतः। आकाशात् वायुः (सम्भूतः)। वायोः अग्निः (सम्भूतः)। अग्नेः आपः (सम्भूताः)। अद्भ्यः पृथिवी (सम्भूता)। पृथिव्याः ओषधयः (सम्भूताः)। ओषधिभ्यः अन्नम् (सम्भूतम्)। अन्नात् पुरुषः (सम्भूतः)।

अर्थः (हिन्दी) — उसी इस आत्मा (ब्रह्म) से आकाश उत्पन्न हुआ। आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथिवी, पृथिवी से ओषधियाँ, ओषधियों से अन्न और अन्न से पुरुष (मनुष्य) उत्पन्न हुआ।

भावः — सृष्टि किसी क्रम-रहित घटना का परिणाम नहीं है; उसका एक निश्चित क्रम है। सबका मूल एक ही चेतन तत्त्व (आत्मा/ब्रह्म) है और उसी से क्रमशः पञ्चमहाभूत, फिर वनस्पति, फिर अन्न और अन्त में मनुष्य बना। इसका सन्देश यह है कि मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं, उसकी अन्तिम कड़ी है — इसलिए वायु, जल, पृथिवी, वृक्ष और अन्न की रक्षा करना ही मनुष्य की रक्षा करना है। यही पाठ का शीर्षक भी कहता है — ‘अन्नाद् भवन्ति भूतानि’

सन्धिपदम्सन्धिविच्छेदःसन्धेः नाम
तस्माद्वातस्मात् + वाजश्त्वसन्धिः
आकाशाद्वायुःआकाशात् + वायुःजश्त्वसन्धिः
वायोरग्निःवायोः + अग्निःविसर्गसन्धिः (रेफादेशः)
अग्नेरापःअग्नेः + आपःविसर्गसन्धिः (रेफादेशः)
पृथिव्या ओषधयःपृथिव्याः + ओषधयःविसर्गसन्धिः (विसर्गलोपः)
ओषधिभ्योऽन्नम्ओषधिभ्यः + अन्नम्विसर्गसन्धिः (पूर्वरूपम्)
पूरे वचन में एक ही विभक्ति: ‘आकाशात्, वायोः, अग्नेः, अद्भ्यः, पृथिव्याः, ओषधिभ्यः, अन्नात्’ — ये सब पञ्चमी विभक्ति (अपादान) के रूप हैं। इसीलिए यह वचन इस पाठ के व्याकरण-विषय का सर्वोत्तम उदाहरण है। अद्भ्यः ‘अप्’ (जल, नित्य बहुवचन) का पञ्चमी बहुवचन है।
तुलना कीजिए: पाठ का संवाद और यह उपनिषद्-वचन एक ही क्रम बताते हैं — ब्रह्म/आत्मा → आकाश → वायु → अग्नि → जल → पृथिवी → ओषधि → अन्न → पुरुष।
प्र2.
आधुनिकरसायनशास्त्रम् (Chemistry) — द्रव्यानां-स्थितयः (States of Matter) [चित्रम्]
उत्तर

पुस्तक के पृष्ठ 103 पर चार चित्र क्रम से दिए हैं और उनके नीचे कणों (particles) की रचना दिखाई गई है; दोनों ओर तीर हैं, जो बताते हैं कि एक अवस्था दूसरी में बदल सकती है —

चित्रम्अवस्था (संस्कृतम्)State of Matterकणानां रचना
हिमशैलः (बर्फ का पहाड़)घनावस्थाSolidकणाः नियतक्रमेण दृढं सम्बद्धाः — जालकरूपेण
समुद्रजलम्द्रवावस्थाLiquidकणाः शिथिलं सम्बद्धाः, चलन्ति
मेघाः (वाष्पः)वाष्पावस्थाGasकणाः पृथक् पृथक्, स्वतन्त्रं भ्रमन्ति
विद्युत् (आकाशे तडित्)प्लाज्मावस्थाPlasmaधनात्मक-ऋणात्मक-आवेशयुक्ताः कणाः

सारः (संस्कृतम्) — एकम् एव द्रव्यं (यथा जलम्) तापस्य भेदेन घन-द्रव-वाष्प-प्लाज्म-रूपेण परिवर्तते। यथा — हिमम् उष्णतया जलं भवति, जलम् उष्णतया वाष्पः भवति, वाष्पः शीतलतया पुनः जलं भवति।
[एक ही द्रव्य ताप के अनुसार ठोस, द्रव, गैस और प्लाज़्मा — इन चार अवस्थाओं में बदलता रहता है।]

यह पाठ के साथ क्यों दिया गया: पाठ में माता कहती है कि उसने आधुनिकं रसायनशास्त्रम् तथा उपनिषद्-ग्रन्थान् दोनों पढ़े हैं। उपनिषद् जिन पञ्चमहाभूतों (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथिवी) की बात करता है, आधुनिक रसायनशास्त्र उन्हीं को द्रव्य की अवस्थाओं के रूप में समझाता है — पृथिवी ≈ ठोस, जल ≈ द्रव, वायु ≈ गैस, अग्नि ≈ ऊर्जा/प्लाज़्मा, आकाश ≈ अवकाश। अर्थात् प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान एक-दूसरे के विरोधी नहीं, पूरक हैं।
स्वयं करके देखिए: एक पात्र में बर्फ रखिए — कुछ देर में वह जल बनेगा (घन → द्रव); उसे गरम कीजिए — भाप बनेगी (द्रव → वाष्प); भाप को ठंडी प्लेट पर लगाइए — फिर बूँदें बनेंगी (वाष्प → द्रव)।
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