कुतूहल अध्याय 1 पाठ्य प्रश्न

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
विशेषकर विद्यालय के मध्य स्तर की आयु में शरीर में तीव्रता से परिवर्तन होते हैं! ऐसा क्यों?
उत्तर

क्योंकि यही वह आयु है जब शरीर वयस्क शरीर के रूप में विकसित होना आरंभ करता है। शरीर की ग्रंथियों से निकलने वाले रासायनिक संदेशवाहक, जिन्हें हॉर्मोन कहते हैं, वृद्धि की तीव्र गति तथा अन्य परिवर्तनों को प्रारंभ कर देते हैं।

  • वृद्धि की तीव्र गति — शैशवावस्था के बाद लंबाई और भार इसी आयु में सबसे तेजी से बढ़ते हैं। अस्थियाँ लंबी होती हैं, इसलिए प्रायः हाथ और पैर पहले बड़े दिखने लगते हैं।
  • शारीरिक अनुपात बदलते हैं — कंधे, कूल्हे और पेशियाँ विकसित होती हैं तथा लड़कों में स्वर भारी हो जाता है।
  • भावनाएँ भी बदलती हैं — मन का उतार-चढ़ाव और नई रुचियाँ इसी प्रक्रिया का सामान्य भाग हैं।
ऐसा क्यों होता है: वृद्धि एक जैविक प्रक्रम है। इतनी तेजी से नई अस्थि और पेशी बनाने के लिए शरीर को बहुत अधिक कच्चा पदार्थ और ऊर्जा चाहिए, इसीलिए इस आयु में भूख बढ़ जाती है। यह सब सामान्य है, सबके साथ होता है और प्रत्येक व्यक्ति में अलग-अलग गति से होता है — इसकी कोई “सही” गति नहीं होती।
संकेत: तीव्र वृद्धि के लिए संतुलित आहार (दाल, दूध या दही, हरी सब्जियाँ, फल, अंडा या मेवे), 8–9 घंटे की नींद और प्रतिदिन शारीरिक क्रिया आवश्यक है। इन वर्षों में भोजन छोड़ना किसी भी अन्य आयु की तुलना में अधिक हानिकारक है।
प्र2.
परंतु ऐसा केवल जंतुओं में ही क्यों होता है?
उत्तर

ऐसा केवल जंतुओं में नहीं होता — पुस्तक यही बात कहलवाना चाहती है। अभी-अभी अनुच्छेद ने जंतुओं के जैविक प्रक्रम गिनाए (भोजन, श्वसन, रक्त द्वारा पोषक तत्वों का पहुँचना) और फिर आपको रोक दिया — पौधे भी तो सजीव हैं, अतः पौधों में भी यह सब होना ही चाहिए।

जैविक प्रक्रमजंतुओं मेंपौधों में
पोषणदूसरों का बनाया भोजन खाते हैंहरी पत्तियों में अपना भोजन स्वयं बनाते हैं
श्वसनफेफड़े, क्लोम, त्वचा, वायु-नलिकाएँरंध्र, वातरंध्र, जड़ की सतह
परिवहनहृदय द्वारा प्रवाहित रक्ततने के भीतर की नलिकाओं से जल और भोजन
उत्सर्जनमूत्र, पसीना, निःश्वासरंध्रों से गैसें; पुरानी पत्तियों और छाल में संचित अपशिष्ट
वृद्धि और जननशिशु बढ़कर वयस्क बनते हैंबीज अंकुरित होते हैं, पौधा बढ़ता है, फूलता और फिर बीज देता है
ऐसा क्यों होता है: जैविक प्रक्रम वह प्रत्येक प्रक्रम है जो जीवित रहने के लिए शरीर को चलाना ही पड़ता है। प्रत्येक सजीव — हाथी, आम का वृक्ष, कुकुरमुत्ता, जीवाणु — को पदार्थ लेना, ऊर्जा मुक्त करना, चीज़ों को इधर-उधर पहुँचाना और बढ़ना पड़ता है। केवल साधन भिन्न होते हैं, आवश्यकता कभी नहीं।
प्र3.
क्या पौधों को वृद्धि के लिए भोजन की आवश्यकता नहीं होती है?
उत्तर

अवश्य होती है। भोजन प्रत्येक सजीव के लिए दो कार्य करता है, और पौधे को दोनों चाहिए।

  • ऊर्जा — जो श्वसन के समय भोजन से मुक्त होती है और वृद्धि, मरम्मत तथा पदार्थों के परिवहन में लगती है।
  • निर्माण-सामग्री — पौधे की नई पत्तियाँ, जड़ें, तना, पुष्प और बीज सब उसी भोजन से बने पदार्थों से बनते हैं।

प्रमाण देखना सरल है। अँधेरी अलमारी में गीली रुई पर रखा चने का बीज अंकुरित तो होता है, पर पीला और दुबला होकर मर जाता है। धूप में रखा दूसरा बीज हरा और मजबूत पौधा बनता है। पहले वाले ने बीज में संचित भोजन समाप्त कर दिया और नया भोजन बना नहीं सका।

यह बात क्यों छूट जाती है: हम पौधे को खाते हुए देखते नहीं, इसलिए लगता है कि वह केवल जल पर जीता है। वास्तव में पौधा खाने से कहीं अधिक चतुर काम करता है — वह जहाँ खड़ा है वहीं वायु, जल और सूर्य के प्रकाश से अपना भोजन स्वयं बनाता है।
प्र4.
वे अपना भोजन कैसे प्राप्त करते हैं?
उत्तर

हरे पौधे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं, जो मुख्यतः पत्तियों में होती है।

कार्बन डाइऑक्साइड + जल  —सूर्य का प्रकाश, पर्णहरित→  भोजन (ग्लूकोज) + ऑक्सीजन

प्रत्येक सामग्री कहाँ से आती है —

  • कार्बन डाइऑक्साइड — वायु से, पत्ती के सूक्ष्म छिद्रों रंध्रों के द्वारा।
  • जल और खनिज — जड़ें मृदा से खींचती हैं और तने की नलिकाओं से पत्तियों तक पहुँचते हैं।
  • सूर्य का प्रकाश — ऊर्जा का स्रोत।
  • पर्णहरित (क्लोरोफिल) — पत्ती का हरा वर्णक, जो सूर्य के प्रकाश को ग्रहण करता है। इसीलिए पत्ती को पौधे का “भोजन कारखाना” कहते हैं।

कुछ पौधे ऐसा नहीं कर पाते और भोजन दूसरे ढंग से लेते हैं — अमरबेल (कस्कूटा) नामक पीली धागे जैसी लता जिस पौधे पर लिपटती है उसी से भोजन चूसती है; घटपर्णी (पिचर प्लांट) कीटों को फँसाकर मृदा की कमी पूरी करती है।

यह हमारे लिए क्यों महत्वपूर्ण है: पृथ्वी का लगभग सारा भोजन प्रकाश संश्लेषण से ही आरंभ होता है। आप चावल खाएँ या मछली, आपकी थाली की ऊर्जा किसी न किसी हरी पत्ती ने सूर्य के प्रकाश से पकड़ी थी। इस समय आप जो ऑक्सीजन साँस में ले रहे हैं, वह भी इसी प्रक्रिया से बनी है।
प्र5.
क्या वे भी साँस लेते हैं? कैसे?
उत्तर

हाँ। पौधे दिन-रात, अपनी प्रत्येक जीवित कोशिका में श्वसन करते हैं। उनके पास फेफड़े या नाक नहीं होते, अतः गैसों का आदान-प्रदान पूरे पादप-शरीर पर फैले छोटे छिद्रों से होता है।

  • पत्तियाँरंध्रों से, जो पत्ती की सतह पर बने सूक्ष्म छिद्र हैं और खुलते-बंद होते रहते हैं।
  • तना — काष्ठीय तने की छाल में बने वातरंध्रों से।
  • जड़ें — जड़ की सतह मृदा कणों के बीच के रिक्त स्थानों से वायु ले लेती है।
श्वसनप्रकाश संश्लेषण
कबहर समय, दिन और रातकेवल प्रकाश में
कहाँप्रत्येक जीवित कोशिका मेंकेवल हरे भागों में
ली जाने वाली गैसऑक्सीजनकार्बन डाइऑक्साइड
छोड़ी जाने वाली गैसकार्बन डाइऑक्साइडऑक्सीजन
पौधे श्वसन करते हुए क्यों नहीं दिखते: तेज दिन के प्रकाश में हरी पत्ती प्रकाश संश्लेषण में कार्बन डाइऑक्साइड इतनी तेजी से खर्च करती है कि उसका अपना श्वसन जितनी बनाता है वह कम पड़ जाती है। इसलिए बाहर से लगता है कि पत्ती केवल ऑक्सीजन छोड़ रही है। श्वसन रुका नहीं है — वह बस बड़ी प्रक्रिया के पीछे छिप गया है।
स्वयं जाँचिए: गमले के पौधे को कुछ दिन आवश्यकता से अधिक जल दीजिए, वह मुरझा जाएगा। जल ने मृदा के वायु-रिक्त स्थान भर दिए, अतः जड़ों को ऑक्सीजन नहीं मिल पाई। यही प्रमाण है कि जड़ें सचमुच साँस लेती हैं।
प्र6.
अच्छा, समय क्या होता है?
उत्तर

समय वह है जिसे हम दो घटनाओं के बीच मापते हैं। यह दो अलग-अलग बातें बताता है — कौन-सी घटना पहले हुई और कोई घटना कितनी देर चली

समय कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसे पकड़ा, तौला या डिब्बे में रखा जा सके — पर उसे मापा जा सकता है, और विज्ञान के लिए इतना पर्याप्त है। हम उसे ठीक वैसे ही मापते हैं जैसे लंबाई — एक निश्चित मात्रक चुनकर यह गिनकर कि वह कितनी बार समाता है।

1 मिनट = 60 सेकंड
1 घंटा = 60 मिनट = 3600 सेकंड
1 दिन = 24 घंटे = 24 × 3600 = 86 400 सेकंड

समय का SI मात्रक सेकंड (s) है। ध्यान दीजिए कि हमारे दैनिक मात्रक आकाश की दोहराई जाने वाली घटनाओं से ही आए हैं — दिन पृथ्वी का एक घूर्णन है, मास लगभग चंद्रमा का एक चक्कर और वर्ष पृथ्वी का सूर्य के चारों ओर एक चक्कर।

ऐसा क्यों होता है: घड़ी इसीलिए संभव है क्योंकि कुछ घटनाएँ हर बार समान अवधि में दोहराई जाती हैं। यदि सूर्योदय एक दिन छोटे अंतराल पर और दूसरे दिन बड़े अंतराल पर होता, तो कोई पंचांग कभी बन ही नहीं पाता।
प्र7.
क्या आपने कभी सोचा है कि हम समय को कैसे मापते हैं?
उत्तर

किसी दोहराई जाने वाली घटना को गिनकर। जो भी घटना ठीक समान अंतराल पर दोहराई जाए, उसे घड़ी बनाया जा सकता है; समय मापन का पूरा इतिहास ऐसी ही अधिकाधिक विश्वसनीय घटनाओं की खोज है।

उपकरणवह दोहराई जाने वाली घटना जिसे वह गिनता है
धूपघड़ी (छाया घड़ी)सूर्य की दैनिक यात्रा, जिससे परछाईं डायल पर खिसकती है
जल घड़ी, बालू घड़ीनिश्चित पात्र से जल या बालू का समान गति से रिसना
लोलक घड़ीलोलक का इधर-उधर झूलना
क्वार्ट्ज घड़ी, मोबाइल फ़ोनक्वार्ट्ज के सूक्ष्म क्रिस्टल के कंपन
परमाणु घड़ीपरमाणुओं के भीतर के कंपन — सबसे अधिक विश्वसनीय

सबसे प्राचीन विधि वही है जिसका उल्लेख आपकी पुस्तक के इसी पृष्ठ पर है — विद्युत घड़ियों से बहुत पहले लोग सूर्य में रखी वस्तु की परछाईं देखते थे और परछाईं की स्थिति से समय बताते थे। जयपुर और दिल्ली के जंतर-मंतर में आज भी इसी विचार पर बनी विशाल पत्थर की धूपघड़ियाँ खड़ी हैं।

लोलक इतना अच्छा क्यों काम करता है: किसी निश्चित लंबाई के लोलक का प्रत्येक दोलन समान समय लेता है, चाहे झूला चौड़ा हो या सँकरा। ऐसे 60 दोलन गिन लीजिए और आपके पास एक विश्वसनीय निश्चित अंतराल है — यही कारण है कि लोलक घड़ियों ने लगभग 300 वर्ष राज किया।
करके देखिए: 1 मीटर धागे में छोटा पत्थर बाँधकर झुलाइए। 20 पूरे दोलनों का समय नापकर 20 से भाग दीजिए — एक दोलन का समय मिल जाएगा। अब आधे मीटर के धागे से दोहराइए। छोटा लोलक तेजी से झूलता है — आपने अभी एक घड़ी बनाकर उसका परीक्षण भी कर लिया।
प्र8.
और कोई क्रियाएँ कितनी तीव्रता से होती है?
उत्तर

“कितनी तीव्रता से” का प्रश्न दर का प्रश्न है — अर्थात् एक मात्रक समय में कितना घटित होता है। गतिमान वस्तु के लिए इसे चाल कहते हैं।

चाल = तय की गई दूरी ÷ लिया गया समय

एक धावक 20 s में 100 m दौड़ता है
चाल = 100 ÷ 20 = 5 m/s
km/h में: 5 × 3600 ÷ 1000 = 18 km/h

चालों की तुलना से ही दौड़ का अर्थ बनता है। दो धावकों में तेज वही है जो समान दूरी कम समय में तय करे, अथवा समान समय में अधिक दूरी।

“कितनी तीव्रता से” केवल गति पर ही नहीं, परिवर्तनों पर भी लागू होता है —

  • माचिस की तीली कुछ ही सेकंड में जल जाती है — तीव्र परिवर्तन।
  • लोहे के फाटक पर महीनों में जंग लगता है — मंद परिवर्तन।
  • चट्टान हजारों वर्षों में टूटकर पत्थर बनती है — अत्यंत मंद परिवर्तन।
ऐसा क्यों होता है: तीव्रता बताने के लिए लिए गए समय से भाग देना अनिवार्य है। इसीलिए अकेला “तेज” शब्द निरर्थक है — 60 km चलने वाली बस तब तक न तेज है न मंद, जब तक यह न बताया जाए कि उसने एक घंटा लिया या एक दिन।
स्वयं जाँचिए: मीटर स्केल से विद्यालय के गलियारे की लंबाई नापिए और किसी मित्र को उसे पार करने में लगा समय मापिए। लंबाई में समय का भाग दीजिए — यही आपके मित्र की चाल मीटर प्रति सेकंड में है। साधारण चलने की चाल लगभग 1.2–1.5 m/s निकलती है।
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