प्र1.
क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि जिस अद्भुत संसार में हम रहते हैं, उससे हम अचंभित भी हो सकते हैं?
उत्तर
हाँ — और संभवतः यही हमारी सबसे उल्लेखनीय विशेषता है। हम उन वस्तुओं के विषय में प्रश्न पूछ सकते हैं जिन्हें हम न कभी छू सकते हैं, न वहाँ जा सकते हैं और न प्रयोगशाला में ला सकते हैं — फिर भी उत्तर खोज लेते हैं।
देखिए, इसी एक पृष्ठ ने अभी क्या-क्या कहा है —
- पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है, जिससे दिन और रात होते हैं। आधा भाग सूर्य के सामने रहता है और आधा अपनी ही परछाईं में — पृष्ठ 5 का चित्र ठीक यही दिखाता है।
- चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर और पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है।
- जब इनमें से कोई पिंड दूसरे की परछाईं में आ जाता है तो ग्रहण होता है — पहले चित्र वाली वही रोचक परिघटना।
इनमें से किसी बात की जाँच करने कोई पृथ्वी से बाहर खड़ा होकर फीता लेकर नहीं गया। यह सब धैर्यपूर्ण अवलोकन से निकला — छड़ी की परछाईं, चंद्रमा का बदलता आकार, ग्रहणों का समय — छोटे-छोटे साधारण अवलोकन, ध्यानपूर्वक जोड़े गए।
ऐसा क्यों होता है: जिज्ञासा ही प्रत्येक खोज का आरंभ-बिंदु है। श्रृंखला सदैव यही रहती है — अचंभा → प्रश्न → अवलोकन → परीक्षण → व्याख्या। अचंभा विज्ञान का विरोधी नहीं, उसका आरंभ है। इसीलिए इस पुस्तक का नाम जिज्ञासा है।
क्या आप जानते हैं? भारतीय खगोलशास्त्री आर्यभट ने लगभग 1500 वर्ष पूर्व लिखा था कि पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है और ग्रहण परछाइयों के कारण होते हैं, किसी जीव के सूर्य को निगलने से नहीं। यह निष्कर्ष उन्होंने केवल अवलोकन और गणित के बल पर निकाला था।