| क्र.सं. | विशेषता | प्रकाश संश्लेषण | श्वसन |
|---|---|---|---|
| 1. | कच्चा माल | कार्बन डाइऑक्साइड और जल (सूर्य का प्रकाश ऊर्जा स्रोत के रूप में तथा पर्णहरित वर्णक के रूप में) | ग्लूकोस और ऑक्सीजन |
| 2. | उत्पाद | ग्लूकोस और ऑक्सीजन | कार्बन डाइऑक्साइड, जल और ऊर्जा |
| 3. | शब्द समीकरण | कार्बन डाइऑक्साइड + जल → ग्लूकोस + ऑक्सीजन (सूर्य के प्रकाश और पर्णहरित की उपस्थिति में) | ग्लूकोस + ऑक्सीजन → कार्बन डाइऑक्साइड + जल + ऊर्जा |
| 4. | महत्त्व | पौधे के लिए तथा पौधों पर निर्भर सभी जीवों के लिए भोजन बनाता है; ऊर्जा को ग्लूकोस और मंड के रूप में संचित करता है; सजीवों के लिए आवश्यक ऑक्सीजन निर्मुक्त करता है | ग्लूकोस में संचित ऊर्जा को निर्मुक्त करता है, जिसका उपयोग पौधा अपनी वृद्धि और विकास में करता है; यह पौधे के सभी भागों में दिन-रात चलता रहता है |
कुतूहल अध्याय 10 आइए, और अधिक सीखें
अद्यतन2026-09-05
पृथ्वी पर जीवन समाप्त हो जाएगा। प्रकाश संश्लेषण करने वाले जीव — हरे पौधे, शैवाल और कुछ जीवाणु — ही ऐसे हैं जो सरल पदार्थों से भोजन बनाते हैं। शेष सभी उन्हीं पर निर्भर हैं।
- भोजन समाप्त हो जाएगा। कहीं भी नया भोजन नहीं बनेगा। पहले शाकाहारी जंतु भूखे मरेंगे, फिर उन्हें खाने वाले माँसाहारी, और अंतत: मनुष्य सहित सभी जंतु।
- ऑक्सीजन घट जाएगी। वायु में ऑक्सीजन मुख्यत: प्रकाश संश्लेषण से ही जुड़ती है। श्वसन और दहन उसे लगातार उपयोग करते रहेंगे और उसकी पूर्ति नहीं होगी।
- कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ती जाएगी, क्योंकि उसे हटाने वाला कोई नहीं बचेगा।
- आहार शृंखलाएँ और आहार जाल टूट जाएँगे और उनके साथ प्रकृति का संपूर्ण संतुलन बिगड़ जाएगा।
- अनाज, फल, सब्ज़ी, कपास, इमारती लकड़ी और चारा कुछ भी नहीं मिलेगा, अत: कृषि, वस्त्र और अनेक उद्योग भी समाप्त हो जाएँगे।
मंड कहाँ से आता है: यह उसी भोजन से बना है जो आलू के पौधे ने अपनी पत्तियों में प्रकाश संश्लेषण द्वारा बनाया। इसे मिट्टी से नहीं लिया गया।
भोजन का संश्लेषण कहाँ होता है: पत्तियों में, जो प्रकाश संश्लेषण का प्रमुख स्थल हैं। वायु से ली गई कार्बन डाइऑक्साइड और जड़ों से आए जल से, सूर्य के प्रकाश और पर्णहरित की उपस्थिति में, ग्लूकोस बनता है।
यह आलू तक कैसे पहुँचता है: यह ग्लूकोस पोषवाह (फ्लोएम) में पहुँचकर पत्तियों से नीचे भूमिगत तनों तक ले जाया जाता है। वहाँ अतिरिक्त भोजन मंड में बदल कर भंडारित हो जाता है और वही फूले हुए भूमिगत तने आलू कहलाते हैं।
ग्लूकोस → पोषवाह द्वारा परिवहन
भूमिगत तने में मंड के रूप में भंडारण → आलू
हाँ, बनाती है। चौड़ी और चपटी संरचना प्रकाश संश्लेषण की प्रत्येक आवश्यकता को एक साथ पूरा करती है।
- प्रकाश के लिए बड़ा पृष्ठ। आकाश की ओर फैली चौड़ी चपटी पर्णफलक उतने ही पदार्थ की पतली या मुड़ी पत्ती से कहीं अधिक प्रकाश प्रग्रहण करती है।
- पतली, इसलिए प्रकाश सारे पर्णहरित तक पहुँचता है। मोटी पत्ती में नीचे की कोशिकाएँ ऊपर वाली कोशिकाओं की छाया में रह जातीं।
- अधिक रंध्र वायु के संपर्क में, जिससे कार्बन डाइऑक्साइड शीघ्र अंदर आ सके और ऑक्सीजन बाहर जा सके।
- पत्ती के भीतर गैसों का मार्ग छोटा। फलक पतली होने से कार्बन डाइऑक्साइड को रंध्र से उपयोग करने वाली कोशिका तक बहुत कम दूरी तय करनी पड़ती है।
- शिराओं का जाल पूरी चपटी फलक में फैलकर सर्वत्र जल पहुँचाता है और बना हुआ भोजन बाहर ले जाता है।
यह समीकरण श्वसन का शब्द समीकरण है —
पद-दर-पद तुलना करने पर —
| संकेत | किसे प्रदर्शित करता है | उसकी भूमिका |
|---|---|---|
| X | ग्लूकोस | वह भोजन जिसका विघटन होता है — इसी में संचित ऊर्जा है |
| Y | ऑक्सीजन | ग्लूकोस के विघटन के लिए प्रयुक्त होती है |
| Z | जल | कार्बन डाइऑक्साइड और ऊर्जा के साथ बनने वाला उत्पाद |
(i) वह किसकी जाँच कर रही है: इसी की कि पौधों की वृद्धि तथा भोजन (मंड) के निर्माण के लिए सूर्य का प्रकाश अनिवार्य है। दोनों गमले समान आमाप के हैं, पौधे एक जैसे हैं और (माना जाता है कि) जल तथा मिट्टी भी समान है; भिन्न केवल प्रकाश है। अत: जो भी अंतर आएगा उसका कारण सूर्य का प्रकाश ही होगा।
(ii) दिखाई देने वाले अंतर (चित्र 10.10 के अनुसार) —
| लक्षण | (क) सूर्य के प्रकाश में रखा पौधा | (ख) पूर्णत: अंधकार में रखा पौधा |
|---|---|---|
| पत्तियों का रंग | गहरा, स्वस्थ हरा | हल्का पीला-हरा |
| पत्तियाँ | चौड़ी, दृढ़, भली-भाँति फैली हुई | पतली, दुर्बल, झुकी हुई |
| तना | मोटा और सीधा | पतला, कमज़ोर और खिंचा हुआ |
| समग्र रूप | घना और स्वस्थ | रोगी और निर्जीव-सा |
(iii) किस पौधे की पत्तियाँ पुष्टि करेंगी: केवल सूर्य के प्रकाश में रखे पौधे की पत्तियाँ नीली-काली होंगी और मंड की उपस्थिति की पुष्टि करेंगी। अँधेरे में रखे पौधे की पत्तियों के रंग में कोई परिवर्तन नहीं होगा, क्योंकि प्रकाश के अभाव में प्रकाश संश्लेषण हुआ ही नहीं और मंड बना ही नहीं।
प्रकाश संश्लेषण के लिए सूर्य का प्रकाश, पर्णहरित, जल और कार्बन डाइऑक्साइड — चारों अनिवार्य हैं। चित्र 10.11 के प्रत्येक पौधे को पर्याप्त जल मिला है और सभी हरे हैं, अत: परिणाम केवल प्रकाश और कार्बन डाइऑक्साइड से तय होगा।
| व्यवस्थापन | सूर्य का प्रकाश | कार्बन डाइऑक्साइड | प्रकाश संश्लेषण? | मंड | ऑक्सीजन |
|---|---|---|---|---|---|
| (क) सूर्य का प्रकाश और कार्बन डाइऑक्साइड उपस्थित | हाँ | हाँ | हाँ | बनेगा | उत्पन्न होगी |
| (ख) सूर्य का प्रकाश उपस्थित, कार्बन डाइऑक्साइड अनुपस्थित | हाँ | नहीं | नहीं | नहीं बनेगा | उत्पन्न नहीं होगी |
| (ग) अंधकार और कार्बन डाइऑक्साइड उपस्थित | नहीं | हाँ | नहीं | नहीं बनेगा | उत्पन्न नहीं होगी |
| (घ) अंधकार और कार्बन डाइऑक्साइड अनुपस्थित | नहीं | नहीं | नहीं | नहीं बनेगा | उत्पन्न नहीं होगी |
(i) मंड बनेगा — केवल पौधे (क) में, जो सूर्य के प्रकाश और कार्बन डाइऑक्साइड दोनों की उपस्थिति में है।
(ii) मंड नहीं बनेगा — पौधों (ख), (ग) और (घ) में।
(iii) ऑक्सीजन उत्पन्न होगी — केवल पौधे (क) में, क्योंकि ऑक्सीजन प्रकाश संश्लेषण में ही निर्मुक्त होती है।
(iv) ऑक्सीजन उत्पन्न नहीं होगी — पौधों (ख), (ग) और (घ) में।
वह क्या पता करना चाहती है: यह कि सजीव अपने आस-पास के जल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा को कैसे बदलते हैं — अर्थात जंतु (घोंघा) श्वसन करके कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ाता है, हरा पौधा प्रकाश संश्लेषण करके उसे घटाता है, और दोनों साथ हों तो एक-दूसरे को संतुलित कर सकते हैं। परखनली 'घ' उसका नियंत्रित (कंट्रोल) है।
| परखनली | उसमें क्या है | प्रकाश में 2–3 घंटे में क्या होता है | कार्बन डाइऑक्साइड सूचक |
|---|---|---|---|
| क | जल + घोंघा | घोंघा श्वसन करके कार्बन डाइऑक्साइड निर्मुक्त करता है | कार्बन डाइऑक्साइड में स्पष्ट वृद्धि दर्शाता है |
| ख | जल + जलीय पौधा | पौधा प्रकाश संश्लेषण करके श्वसन की तुलना में कहीं अधिक कार्बन डाइऑक्साइड उपयोग कर लेता है | कार्बन डाइऑक्साइड में कमी दर्शाता है |
| ग | जल + घोंघा + जलीय पौधा | घोंघे द्वारा निर्मुक्त कार्बन डाइऑक्साइड का अधिकांश भाग पौधा उपयोग कर लेता है | बहुत कम या कोई परिवर्तन नहीं |
| घ | केवल जल | इसमें कोई सजीव नहीं है | कोई परिवर्तन नहीं — यही नियंत्रित है |
उसे कैसे पता लगेगा कि वह सही है: 2–3 घंटे बाद के रंगों की तुलना आरंभिक रंग से तथा परखनली 'घ' से करके।
- यदि 'घ' में कोई परिवर्तन नहीं होता, तो 'क', 'ख' और 'ग' का परिवर्तन उनमें रखे सजीव के कारण ही है, जल या सूचक के कारण नहीं।
- यदि 'क' में कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ी हुई, 'ख' में घटी हुई और 'ग' में लगभग अपरिवर्तित मिले, तो उसका विचार सही सिद्ध होता है।
- और अधिक निश्चय के लिए वह यही पूरा प्रयोग अँधेरे में दोहरा सकती है। तब 'ख' में भी वृद्धि दिखनी चाहिए, क्योंकि पौधा केवल श्वसन ही कर पाएगा — इससे सिद्ध होगा कि प्रकाश में 'ख' की कमी वास्तव में प्रकाश संश्लेषण के कारण थी।
जाँचा जाने वाला प्रश्न: क्या पौधे में जल गरम स्थिति में ठंडी स्थिति की अपेक्षा तीव्र गति से ऊपर चढ़ता है?
सामग्री: सफ़ेद फूलों वाली एक जैसी दो कोमल टहनियाँ (सफ़ेद सदाबहार या गुलमेंहदी), एक जैसे दो काँच के गिलास, जल, लाल स्याही, मार्कर, स्केल, घड़ी, तथा एक गरम और एक ठंडा स्थान (अथवा गरम और ठंडे जल के दो पात्र जिनमें गिलास रखे जा सकें)।
विधि:
- गिलासों को ग (गरम) और ठ (ठंडा) नामांकित कीजिए और प्रत्येक को एक-तिहाई जल से भरिए।
- दोनों में समान संख्या में लाल स्याही की बूँदें डालिए और जल का आरंभिक तल गिलास पर अंकित कीजिए।
- दोनों टहनियों को जल के भीतर रखते हुए आधार से तिर्यक रूप से काटिए और तुरंत एक-एक टहनी प्रत्येक गिलास में रख दीजिए।
- गिलास 'ग' को गरम स्थान पर (धूप में अथवा लगभग 35–40 °C के गरम जल के पात्र में) और गिलास 'ठ' को ठंडे, छायादार स्थान पर (अथवा ठंडे जल के पात्र में) रखिए। शेष सब समान रहना चाहिए — एक जैसी टहनियाँ, समान स्याही, समान जल और यथासंभव समान प्रकाश।
- 1 घंटे, 2 घंटे और 3 घंटे बाद प्रत्येक टहनी में देखिए — लाल रंग तने में कितना ऊपर चढ़ा (स्केल से नापिए) और पत्तियों की शिराओं तथा फूलों में गुलाबी रंग आया या नहीं।
- यह भी नोट कीजिए कि प्रत्येक गिलास में जल का तल कितना नीचे गया।
अवलोकन तालिका:
| समय | टहनी 'ग' (गरम) में लाल रंग की ऊँचाई | टहनी 'ठ' (ठंडा) में लाल रंग की ऊँचाई |
|---|---|---|
| 1 घंटे बाद | … | … |
| 2 घंटे बाद | … | … |
| 3 घंटे बाद | … | … |
अपेक्षित परिणाम: गरम गिलास वाली टहनी में लाल रंग अधिक ऊपर और अधिक तेज़ी से चढ़ता है, उसके फूल पहले गुलाबी होते हैं और उस गिलास से जल भी अधिक घटता है। अत: पौधों में जल परिवहन गरम स्थिति में अधिक तीव्र गति से होता है।
ये दोनों प्रक्रियाएँ एक-दूसरे की विपरीत हैं और ठीक इसीलिए प्रकृति में संतुलन बनाए रखती हैं। एक जो उपयोग करती है, दूसरी वही उत्पन्न करती है।
| प्रकाश संश्लेषण | श्वसन | |
|---|---|---|
| ग्रहण करता है | कार्बन डाइऑक्साइड और जल | ग्लूकोस और ऑक्सीजन |
| निर्मुक्त करता है | ग्लूकोस और ऑक्सीजन | कार्बन डाइऑक्साइड, जल और ऊर्जा |
| ऊर्जा | सूर्य की ऊर्जा को भोजन में संचित करता है | उसी संचित ऊर्जा को उपयोग के लिए निर्मुक्त करता है |
| कब | केवल सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में | निरंतर, दिन और रात |
संतुलन किस प्रकार बनता है
- गैसों का संतुलन: श्वसन (और दहन) वायु से ऑक्सीजन घटाते हैं तथा कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ाते हैं; प्रकाश संश्लेषण कार्बन डाइऑक्साइड घटाकर ऑक्सीजन बढ़ाता है। इससे वायु में इन गैसों का अनुपात लगभग स्थिर बना रहता है।
- भोजन और ऊर्जा का संतुलन: प्रकाश संश्लेषण सूर्य की ऊर्जा को ग्लूकोस में बाँध देता है; श्वसन उसे जहाँ आवश्यकता हो वहाँ मुक्त कर देता है। प्रकाश संश्लेषण के बिना श्वसन के लिए भोजन ही न होता, और श्वसन के बिना उस भोजन का उपयोग ही न हो पाता।
- पदार्थ का संतुलन: गाय जो कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ती है वही घास का पोषण करती है और वही घास गाय का। कार्बन और जल इसी प्रकार चक्र में घूमते रहते हैं।
संतुलन बिगड़ने पर: वनों की कटाई से प्रकाश संश्लेषण घट जाता है जबकि श्वसन और ईंधनों का दहन चलता रहता है, अत: वायु में कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ती है और ऑक्सीजन घटती है। वृक्षारोपण इस संतुलन को पुन: स्थापित करता है — इसीलिए वनों को पृथ्वी के फेफड़े कहा जाता है।