कुतूहल अध्याय 12 क्रियाकलाप 12.3: आइए, अन्वेषण करें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
दो घंटे पश्चात सप्तर्षि का पुन: अवलोकन कीजिए। क्या यह अपनी स्थिति से हट गया है? पुन: इसकी स्थिति का आरेख बनाइए और समय अंकित कीजिए।
उत्तर

हाँ, यह स्पष्ट रूप से अपनी स्थिति से हट गया है — और इसका झुकाव भी बदल गया है, अर्थात सातों तारों का पूरा पैटर्न उन्हीं वृक्षों या भवनों के सापेक्ष अलग ढंग से तिरछा दिखाई देता है।

आरेख ईमानदारी से बनाइए — पहले भूमि-रेखा और कोई स्थिर वृक्ष अथवा भवन बनाइए, फिर उसके ऊपर सातों तारे, और आरेख के साथ समय अवश्य लिखिए। चित्र 12.7 पुणे के एक विद्यार्थी द्वारा 1–2 अप्रैल की रात्रि को बनाया गया ऐसा ही अभिलेख है:

समयसप्तर्षि कहाँ दिखाई देता है
7 PMउत्तर-पूर्व में नीचे की ओर
9 PMकुछ ऊँचा, फिर भी उत्तर-पूर्व की ओर
11 PMसबसे ऊँचा, लगभग ठीक उत्तर में
1 AMउत्तर से आगे बढ़कर नीचे उतरता हुआ
3 AMऔर नीचे, उत्तर-पश्चिम की ओर
5 AMउत्तर-पश्चिम में नीचे की ओर
ऐसा क्यों होता है: पृथ्वी प्रत्येक घंटे में 15° घूमती है (360° ÷ 24 घंटे)। दो घंटे में यह 30° घूम जाती है, अतः पूरा आकाश 30° खिसका हुआ दिखता है। यह बहुत बड़ा और आसानी से दिखने वाला परिवर्तन है — भुजा फैलाकर रखी लगभग तीन मुट्ठियों जितना।
सुझाव: सभी अवलोकन एक ही स्थान से और एक ही रात्रि में कीजिए, और प्रत्येक बार वही वृक्ष अथवा भवन बनाइए। खड़े होने का स्थान बदलने पर तुलना बिगड़ जाएगी।
प्र2.
उपरोक्त चरण को दो घंटे पश्चात पुन: दोहराइए। क्या आप अवलोकन कर पाते हैं कि सप्तर्षि ध्रुव तारे के चारों ओर घूमता हुआ प्रतीत होता है? (यदि आप ध्रुव तारे को नहीं भी देख पाते हैं तो केवल अपने द्वारा निर्धारित वृक्ष अथवा भवन के सापेक्ष सप्तर्षि की गति पर ध्यान दीजिए)।
उत्तर

हाँ। अपने सभी आरेख एक साथ रखिए — सप्तर्षि एक बड़े वृत्त के चाप पर चलता दिखाई देगा, जो उत्तर-पूर्व में उदित होकर उत्तर के ऊपर से होता हुआ उत्तर-पश्चिम में अस्त होता है। उस वृत्त का केंद्र ध्रुव तारा है।

ध्रुव तारा 7 PM9 PM11 PM 1 AM3 AM5 AM उत्तर-पश्चिम उत्तर-पूर्व
एक ही रात्रि में हर दो घंटे पर बनाए गए सप्तर्षि के आरेख। छहों स्थितियाँ एक ही वृत्त पर हैं जिसका केंद्र ध्रुव तारा है।
ऐसा क्यों होता है: पृथ्वी का घूर्णन-अक्ष लगभग ठीक ध्रुव तारे की ओर इंगित करता है। पृथ्वी के घूमने पर प्रत्येक तारा उसी दिशा के परित: घूमता प्रतीत होता है — जैसे घूमते पहिये के मनके उसकी धुरी के परित: घूमते हैं। धुरी से दूर के तारे बड़े चाप बनाते हैं; धुरी पर बैठा ध्रुव तारा लगभग हिलता ही नहीं।
स्वयं जाँचिए: चंद्रमा भी ऐसा ही करता है। सूर्य की भाँति वह भी पूर्व दिशा की ओर उदित और पश्चिम दिशा की ओर अस्त होता प्रतीत होता है, क्योंकि पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है।
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