कुतूहल अध्याय 12 अन्वेषणात्मक परियोजनाएँ

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
क्रियाकलाप 12.2 को दोहराइए किंतु टॉर्च के स्थान पर विद्युत लैंप ले लीजिए। इसके पश्चात ग्लोब को इसका झुकाव बनाए रखते हुए लैंप के परित: खींचे गए एक वृत्त पर विभिन्न स्थितियों में रखिए। (i) विभिन्न स्थितियों में ग्लोब के उत्तरी और दक्षिणी गोलार्धों का कितना-कितना भाग प्रकाशित होता है? यह अवलोकन अभिलेखित कीजिए। (ii) ग्लोब को घुमाइए और इसके विभिन्न भागों पर दिन और रात की अवधि अभिलेखित कीजिए। (iii) वृत्त पर ग्लोब की विभिन्न स्थितियों के लिए चरण (ख) को दोहराइए।
उत्तर

यह परियोजना पूरे अध्याय को एक मेज़ पर बने प्रतिरूप में बदल देती है। एक नियम कभी न तोड़िए: ग्लोब का अक्ष वृत्त की प्रत्येक स्थिति पर एक ही दिशा में — कमरे के एक ही कोने की ओर — झुका रहना चाहिए। स्टैंड को घुमाकर लैंप की ओर मत कीजिए।

व्यवस्था कैसे करें

  1. अँधेरे कमरे में मेज़ के बीच बिना शेड का एक विद्युत लैंप रखिए। यही सूर्य है।
  2. लैंप के चारों ओर लगभग 60–75 cm त्रिज्या का वृत्त खींचिए और उस पर चार स्थान अंकित कीजिए — जून, सितंबर, दिसंबर, मार्च
  3. ग्लोब को झुकाव एक ही दिशा में बनाए रखते हुए वृत्त पर घुमाइए और प्रत्येक चिह्न पर रुकिए।

(i) प्रत्येक गोलार्ध का कितना भाग प्रकाशित होता है

स्थितिउत्तरी गोलार्धदक्षिणी गोलार्धध्रुव
जूनआधे से अधिक भाग प्रकाशितआधे से कम भाग प्रकाशितउत्तरी ध्रुव पूर्णतः प्रकाशित; दक्षिणी ध्रुव पूर्णतः अंधकार में
सितंबरठीक आधाठीक आधाप्रकाश-अंधकार की सीमा दोनों ध्रुवों से गुजरती है
दिसंबरआधे से कम भाग प्रकाशितआधे से अधिक भाग प्रकाशितउत्तरी ध्रुव पूर्णतः अंधकार में; दक्षिणी ध्रुव पूर्णतः प्रकाशित
मार्चठीक आधाठीक आधाप्रकाश-अंधकार की सीमा दोनों ध्रुवों से गुजरती है

(ii) और (iii) दिन-रात की अवधि — प्रत्येक स्थिति पर ग्लोब को धीरे-धीरे घुमाइए और दिल्ली, विषुवत रेखा तथा ऑस्ट्रेलिया पर लगे स्टिकरों को देखिए। अनुमान लगाइए कि प्रत्येक चक्कर का कितना भाग प्रत्येक स्टिकर प्रकाश में बिताता है।

ग्लोब पर स्थानजून की स्थितिमार्च / सितंबरदिसंबर की स्थिति
दिल्ली (उत्तरी गोलार्ध)दिन रात से लंबादिन ≈ रातदिन रात से छोटा
विषुवत रेखा परदिन ≈ रातदिन ≈ रातदिन ≈ रात
ऑस्ट्रेलिया (दक्षिणी गोलार्ध)दिन रात से छोटादिन ≈ रातदिन रात से लंबा
उत्तरी ध्रुवचौबीसों घंटे दिनठीक सीमा परचौबीसों घंटे रात
यह प्रतिरूप क्या सिद्ध करता है: लैंप कभी नहीं बदला और दूरी भी नहीं बदली — बदला केवल लैंप के सापेक्ष झुकाव की दिशा। इतने से ही लंबे दिन, छोटे दिन और चौबीसों घंटे का सूर्य बन गए। यह इस बात का सबसे सशक्त प्रमाण है कि ऋतुएँ झुकाव से बनती हैं, दूरी से नहीं।
सुझाव: बिना शेड का लैंप लीजिए ताकि प्रकाश सब दिशाओं में फैले, और कमरा वास्तव में अँधेरा रखिए। प्रत्येक स्थिति पर ग्लोब का छायाचित्र लीजिए — चारों चित्र साथ रखने पर कक्षा के लिए उत्तम चार्ट बन जाता है।
प्र2.
पृथ्वी सूर्य के चारों ओर एक अंडाकार पथ पर गमन करती है। एक ही केंद्र को लेकर दो वृत बनाइए जिनमें से एक की त्रिज्या 14.7 सेंटीमीटर हो और दूसरे की त्रिज्या 15.2 सेंटीमीटर हो। यदि 1 सेंटीमीटर एक करोड़ किलोमीटर दूरी के संगत हो तो ये दो वृत्त सूर्य से पृथ्वी की निकटतम और अधिकतम दूरी निरूपित करते हैं, यदि केंद्र के स्थान पर सूर्य हो तो पृथ्वी की कक्षा की आकृति दर्शाइए। ध्यान दीजिए कि अधिकतम और न्यूनतम दूरियों का यह अंतर कितना न्यून है?
उत्तर

यह रेखाचित्र A4 आकार के पूरे पृष्ठ पर परकार से बनाइए और दोनों वृत्तों का केंद्र एक ही रखिए।

पैमाना: 1 cm = 1 करोड़ km
निकटतम दूरी = 14.7 cm × 1 करोड़ = 14.7 करोड़ km
अधिकतम दूरी = 15.2 cm × 1 करोड़ = 15.2 करोड़ km
कागज़ पर अंतर = 15.2 − 14.7 = 0.5 cm (5 mm)
वास्तविक अंतर = 15.2 − 14.7 = 0.5 करोड़ km
अनुपात में = 0.5 ÷ 15.2 ≈ 0.033 = लगभग 3%

आप क्या देखेंगे: दोनों वृत्त इतने पास-पास होते हैं कि एक कदम दूर से वे एक ही मोटी रेखा जैसे दिखते हैं। पृथ्वी की कक्षा इन्हीं दोनों वृत्तों के बीच की पतली पट्टी में समा जाती है — अर्थात वह लगभग वृत्ताकार है। फिर भी वह 5 mm का अंतराल पचास लाख किलोमीटर को दर्शाता है।

यह रेखाचित्र क्या सिद्ध करता है: पृथ्वी की कक्षा लगभग वृत्त ही है। पुस्तकों में "अंडाकार" कक्षा जान-बूझकर बढ़ा-चढ़ाकर बनाई जाती है और इससे विद्यार्थी यह भूल कर बैठते हैं कि ऋतुएँ बदलती दूरी से बनती हैं। 3% का अंतर ग्रीष्म और शीत नहीं बना सकता — यह काम अक्ष का झुकाव करता है।
अपने पोस्टर में यह भी जोड़िए: पृथ्वी जनवरी में सूर्य के सबसे निकट होती है — उत्तर भारत का सबसे ठंडा महीना। दोनों वृत्तों के नीचे यह वाक्य लिख दीजिए; बहस वहीं समाप्त हो जाएगी।
प्र3.
मान लीजिए कि पृथ्वी का घूर्णन अक्ष का झुकाव बढ़ जाता है तो क्या इससे ऋतुएँ अधिक भीषण होने लगेंगी? क्या यूरेनस के घूर्णन अक्ष का झुकाव पृथ्वी से अधिक है और वहाँ की ऋतुओं के विषय में पता लगाइए। इस विषय पर किसी समाचार-पत्र अथवा अपने विद्यालय की पत्रिका के लिए एक रोचक लेख लिखिए।
उत्तर

हाँ — झुकाव बढ़ने पर ऋतुएँ कहीं अधिक भीषण हो जाएँगी, और यूरेनस इसका शानदार प्रमाण है।

पृथ्वीयूरेनस
अक्ष का झुकावलगभग 23.5°लगभग 98° — यह लगभग लेटा हुआ लुढ़कता है
एक परिक्रमण का समयलगभग 1 वर्षलगभग 84 पृथ्वी-वर्ष
एक ऋतु की अवधिलगभग 3 माहलगभग 21 पृथ्वी-वर्ष
ध्रुवों परछह माह दिन, छह माह रातलगभग 42 वर्ष सतत दिन, फिर लगभग 42 वर्ष रात

नमूना लेख — इसे अपने शब्दों में ढाल लीजिए:

नमूना उत्तर:
वह ग्रह जो लेटकर घूमता है
पृथ्वी पर एक ऋतु लगभग तीन महीने चलती है, और हम जून की गरमी या जनवरी की ठंड पर बड़बड़ाते रहते हैं। दोष झुकाव का है — हमारा ग्रह अपने अक्ष पर लगभग 23.5° झुका है, इसलिए दोनों गोलार्ध बारी-बारी से सूर्य का सामना करते हैं।
अब कल्पना कीजिए कि यह अक्ष लगभग पूरा लुढ़का दिया जाए। यही यूरेनस है। इसका अक्ष लगभग 98° झुका है, अर्थात यह लट्टू की तरह नहीं, बल्कि गेंद की तरह सूर्य के चारों ओर लुढ़कता है। अपनी कक्षा के एक भाग में इसका उत्तरी ध्रुव लगभग सीधे सूर्य की ओर होता है और आधी परिक्रमा बाद दक्षिणी ध्रुव।
यूरेनस को एक परिक्रमा में लगभग 84 पृथ्वी-वर्ष लगते हैं, अतः वहाँ एक ऋतु लगभग 21 वर्ष खिंचती है। इसके ध्रुवों पर लगभग 42 वर्ष तक सूर्य अस्त ही नहीं होता — और फिर अगले लगभग 42 वर्ष तक उदित ही नहीं होता। यूरेनस के उत्तरी ध्रुव पर जन्मा व्यक्ति अधेड़ हो जाएगा तब कहीं एक सूर्योदय देख पाएगा।
हमारे लिए सीख सरल है। ऋतुएँ इस बात से नहीं बनतीं कि ग्रह सूर्य से कितना निकट है; वे इस बात से बनती हैं कि वह कितना झुका है। थोड़ा झुकाइए तो वसंत और हेमंत मिलेंगे। पूरा लुढ़का दीजिए तो अनंत ग्रीष्म और अनंत रात्रियों की दुनिया।
अधिक झुकाव से ऋतुएँ भीषण क्यों: झुकाव बढ़ने पर ग्रीष्म का सूर्य और ऊँचा चढ़ता है (अर्थात किरणें और छोटे क्षेत्र पर सांद्र होती हैं) तथा ग्रीष्म का दिन और लंबा हो जाता है; दूसरी ओर शीत का सूर्य और नीचा रहता है और दिन और छोटा। दोनों प्रभाव साथ-साथ बढ़ते हैं, इसलिए ग्रीष्म और अधिक तपती है तथा शीत और अधिक कड़ी हो जाती है।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ