कुतूहल अध्याय 12 आइए, और अधिक सीखें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
चित्र 12.17 में पृथ्वी के एक घूर्णन के दौरान उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव पर सूर्य का प्रकाश कितने-कितने घंटे रहता है?
उत्तर

चित्र को ध्यान से देखिए। सूर्य का प्रकाश बाईं ओर से आ रहा है, अतः ग्लोब का बायाँ आधा भाग प्रकाशित है और दायाँ आधा भाग अंधकार में है। अक्ष झुका हुआ है और दोनों ध्रुव उसी पर अंकित हैं:

  • उत्तरी ध्रुव का बिंदु दिन-रात की सीमा के अंधकार वाले भाग में है।
  • दक्षिणी ध्रुव का बिंदु प्रकाशित भाग में है।

ध्रुव अक्ष पर ही स्थित होते हैं, अतः पृथ्वी के घूमने पर भी वे इस सीमा को पार नहीं करते — पूरे घूर्णन में वे जहाँ हैं वहीं बने रहते हैं।

उत्तरी ध्रुव: सूर्य का प्रकाश 0 घंटे (चौबीसों घंटे अंधकार)
दक्षिणी ध्रुव: सूर्य का प्रकाश 24 घंटे (रात होती ही नहीं)
सूर्य की किरणें उत्तरी ध्रुव — अंधकार में सूर्य का प्रकाश 0 घंटे दक्षिणी ध्रुव — प्रकाश में: 24 घंटे दिन रात
चित्र 12.17 में उत्तरी ध्रुव अंधकार वाले आधे भाग में और दक्षिणी ध्रुव प्रकाशित आधे भाग में है। ध्रुव अक्ष पर होने के कारण पूरे घूर्णन में वहीं बने रहते हैं।
यह कौन-सा माह है? उत्तरी ध्रुव सूर्य से परे की ओर है, अतः चित्र दिसंबर की स्थिति दर्शाता है — इसकी तुलना चित्र 12.11 (ख) से कीजिए, जिसका शीर्षक है "दिसंबर में प्रत्येक दिन उत्तरी ध्रुव पूरे चौबीसों घंटे अंधकार में रहता है"। जून में स्थिति ठीक उलटी होगी — उत्तरी ध्रुव पर 24 घंटे प्रकाश और दक्षिणी ध्रुव पर बिल्कुल नहीं।
प्र2.
रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए — (i) तारे ........... दिशा में उदित होते हैं और ............. दिशा में अस्त होते हैं। (ii) दिन और रात पृथ्वी के ............... के कारण होते हैं। (iii) जब चंद्रमा हमारी दृष्टि के सामने सूर्य को पूरी तरह ढक कर लेता है तो यह ........... सूर्य-ग्रहण कहलाती है।
उत्तर
क्रमपूर्ण वाक्य
(i)तारे पूर्व दिशा में उदित होते हैं और पश्चिम दिशा में अस्त होते हैं।
(ii)दिन और रात पृथ्वी के घूर्णन (अपने अक्ष पर) के कारण होते हैं।
(iii)जब चंद्रमा हमारी दृष्टि के सामने सूर्य को पूरी तरह ढक कर लेता है तो यह पूर्ण सूर्य-ग्रहण कहलाती है।
ये उत्तर क्यों:
  • (i) पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है, अतः आकाश का प्रत्येक पिंड — सूर्य, चंद्रमा और तारे — विपरीत दिशा में चलता प्रतीत होता है, पूर्व में उदित और पश्चिम में अस्त।
  • (ii) घूर्णन, परिक्रमण नहीं। एक घूर्णन लगभग 24 घंटे का होता है और ठीक एक दिन तथा एक रात देता है। परिक्रमण एक वर्ष लेता है और ऋतुएँ देता है।
  • (iii) यदि सूर्य का केवल कुछ भाग ढका हो तो वह आंशिक सूर्य-ग्रहण होता है; जब चंद्रमा का पटल पूरे सूर्य को ढक ले तो वह पूर्ण सूर्य-ग्रहण कहलाता है।
प्र3.
बताइए, निम्नलिखित कथन सत्य है अथवा असत्य — (i) जब सूर्य पृथ्वी और चंद्रमा के बीच आता है तो सूर्य-ग्रहण होता है। (ii) गुजरात में सूर्योदय झारखंड से पहले होता है। (iii) चेन्नई में सबसे लंबा दिन ग्रीष्म अयनांत में होता है। (iv) हमें सूर्य-ग्रहण सीधा अपनी खुली आँखों से देखना चाहिए। (v) ऋतु-परिवर्तन पृथ्वी के घूर्णन अक्ष के झुकाव तथा इसकी गोल आकृति के कारण होता है। (vi) सूर्य के परित: पृथ्वी के परिक्रमण के कारण दिन और रात होते हैं।
उत्तर
क्रमकथनसत्य / असत्यकारण
(i)जब सूर्य पृथ्वी और चंद्रमा के बीच आता है तो सूर्य-ग्रहण होता हैअसत्यसूर्य-ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच आ जाता है। सूर्य कभी बीच में नहीं आता — और यदि पृथ्वी बीच में आए तो चंद्र-ग्रहण होता है।
(ii)गुजरात में सूर्योदय झारखंड से पहले होता हैअसत्यपृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है, अतः पूर्वी स्थानों पर सूर्य पहले दिखता है। झारखंड गुजरात के पूर्व में है, इसलिए वहाँ सूर्योदय लगभग आधा घंटा पहले होता है।
(iii)चेन्नई में सबसे लंबा दिन ग्रीष्म अयनांत में होता हैसत्यचेन्नई उत्तरी गोलार्ध में है, अतः वहाँ सबसे लंबा दिन लगभग 21 जून को, अर्थात उत्तर-अयनांत को होता है। (विषुवत रेखा के निकट होने से यह 12 घंटे से थोड़ा ही अधिक होता है।)
(iv)हमें सूर्य-ग्रहण सीधा अपनी खुली आँखों से देखना चाहिएअसत्यग्रहण के दौरान भी सूर्य का प्रकाश आँखों को क्षति पहुँचा सकता है और अंधेपन का कारण बन सकता है। धूप का चश्मा, द्विनेत्री दूरबीन अथवा दूरदर्शी भी सुरक्षित नहीं हैं।
(v)ऋतु-परिवर्तन पृथ्वी के घूर्णन अक्ष के झुकाव तथा इसकी गोल आकृति के कारण होता हैसत्यअध्याय में यही कारण दिया गया है। सूर्य से दूरी इसका कारण नहीं है।
(vi)सूर्य के परित: पृथ्वी के परिक्रमण के कारण दिन और रात होते हैंअसत्यदिन और रात पृथ्वी के अपने अक्ष पर घूर्णन के कारण होते हैं। परिक्रमण से वर्ष बनता है और झुकाव के साथ ऋतुएँ।
सुझाव: कथन (i) और (vi) में केवल एक शब्द बदला गया है। ऐसे वाक्य धीरे-धीरे पढ़िए और स्वयं से पूछिए — "बीच में कौन-सा पिंड है?" और "घूर्णन या परिक्रमण?"
प्र4.
पद्मश्री ने कल रात 8:00 बजे ओरायन तारामंडल को लगभग अपने सिर के ऊपर देखा था। वह आज ओरायन तारामंडल को अपने सिर के ऊपर किस समय देखेगी?
उत्तर

वह ओरायन को सिर के ऊपर लगभग चार मिनट पहले — अर्थात लगभग 7:56 बजे देखेगी।

पृथ्वी का परिक्रमण: लगभग 365 दिनों में 360°
प्रतिदिन अतिरिक्त घूर्णन = 360° ÷ 365 ≈ 1° प्रतिदिन
पृथ्वी एक घंटे में 15° घूमती है, अतः 1° के लिए 60 ÷ 15 = 4 मिनट
आज का समय = 8:00 − 4 मिनट = लगभग 7:56 बजे
ऐसा क्यों होता है: पृथ्वी केवल घूमती नहीं, प्रतिदिन अपनी कक्षा पर लगभग एक अंश आगे भी बढ़ जाती है। कोई तारा एक घूर्णन (लगभग 23 घंटे 56 मिनट) के बाद उसी स्थान पर लौट आता है, परंतु सूर्य को उसी स्थिति में आने के लिए इस एक अंश के कारण लगभग 24 घंटे लगते हैं। हमारी घड़ियाँ सूर्य का अनुसरण करती हैं, अतः तारे घड़ी से प्रतिदिन लगभग चार मिनट आगे निकल जाते हैं।
स्वयं जाँचिए: चार मिनट प्रतिदिन एक माह में लगभग दो घंटे और एक वर्ष में पूरे 24 घंटे बन जाते हैं। इसीलिए ओरायन शीतकाल की संध्या का तारामंडल है और जून की संध्या के आकाश में दिखता ही नहीं।
प्र5.
नंदिनी ने 21 जून को मध्य रात्रि में एक तारा-समूह को उदित होते हुए देखा अगले वर्ष मध्यरात्रि में वह तारों के इस समूह को कब उदित होते हुए देखेगी?
उत्तर

वह उसी तारा-समूह को मध्यरात्रि में उदित होते हुए अगले वर्ष लगभग 21 जून को ही देखेगी — अर्थात ठीक एक वर्ष बाद, लगभग उसी तिथि को।

तारे घड़ी से प्रतिदिन लगभग 4 मिनट आगे निकलते हैं
एक वर्ष में: 4 मिनट × 365 ≈ 1,460 मिनट ≈ 24 घंटे
पूरे 24 घंटे का खिसकाव तारों को उसी तिथि, उसी समय पर लौटा देता है।
ऐसा क्यों होता है: कोई तारा-समूह मध्यरात्रि में तभी उदित होता है जब पृथ्वी अपनी कक्षा के एक विशेष बिंदु पर हो — वह बिंदु जहाँ से मध्यरात्रि का आकाश अंतरिक्ष के उसी भाग की ओर होता है। पृथ्वी उस बिंदु पर एक पूर्ण परिक्रमण के बाद लौटती है, जिसमें लगभग 365 दिन और 6 घंटे लगते हैं। अतः यह दृश्य वर्ष में एक बार ही दोहराया जाता है।
सुझाव: बीच के दिनों में यह समूह प्रत्येक रात लगभग चार मिनट पहले उदित होता जाएगा — दो माह बाद लगभग 10 बजे और चार माह बाद लगभग 8 बजे।
प्र6.
अभय के ध्यान में यह बात आई कि जब भारत में दिन होता है तो अमेरिका में रहने वाले उसके चाचा जी उस समय सो रहे होते हैं क्योंकि वहाँ उस समय रात होती है। इस अंतर का क्या कारण है?
उत्तर

इसका कारण यह है कि पृथ्वी गोल है और सूर्य का प्रकाश एक समय में उसके केवल आधे भाग पर ही पड़ सकता है। भारत और अमेरिका पृथ्वी के लगभग आमने-सामने के भागों में हैं, अतः जब भारत प्रकाशित आधे भाग में होता है तो अमेरिका अंधकार वाले आधे भाग में होता है।

उस क्षणभारतअमेरिका
पृथ्वी पर स्थितिसूर्य के सामने वाले आधे भाग मेंसूर्य से परे वाले आधे भाग में
लोगों का अनुभवदिन — विद्यालय, कार्यरात — निद्रा
ऐसा क्यों होता है: पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है, अतः प्रत्येक स्थान बारी-बारी से प्रकाशित भाग में आता है और फिर उससे बाहर चला जाता है। भारत अमेरिका से बहुत पूर्व में है, इसलिए भारत को सूर्य का प्रकाश लगभग आधा दिन पहले मिल जाता है। बारह घंटे बाद स्थिति उलट जाती है — भारत में रात और अमेरिका में दिन।
प्रतिदिन का प्रमाण: ऑस्ट्रेलिया या अमेरिका के दौरे का क्रिकेट मैच भारत में प्रात: 5 बजे आरंभ होता है, क्योंकि वहाँ उस समय दिन का उजाला होता है जबकि यहाँ अभी अँधेरा रहता है। समय-क्षेत्र इसी कारण बनाए गए हैं।
प्र7.
चार मित्रों ने सूर्य-ग्रहण के अवलोकन हेतु निम्नलिखित चार ढ़ंग अपनाए। इनमें से किसने असावधानी बरती? (i) रवि किशन ने सूर्य-ग्रहण देखने वाले नजर के चश्मे का उपयोग किया। (ii) ज्योति ने सूर्य का प्रतिबिंब पर्दे पर बनाने के लिए दर्पण का उपयोग किया। (iii) आदित्य ने सीधे अपनी खाली आँखों से सूर्य का अवलोकन किया। (iv) अरूणा ने कृत्रिम नभोमंडल द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में भाग लिया।
उत्तर

आदित्य — विकल्प (iii) — ने असावधानी बरती।

मित्रअपनाई गई विधिसुरक्षित?कारण
रवि किशनसूर्य-ग्रहण देखने वाला चश्मासुरक्षितसौर अवलोकन के लिए बने विशेष फिल्टर सूर्य के प्रकाश और हानिकारक विकिरण को सुरक्षित स्तर तक घटा देते हैं।
ज्योतिदर्पण से पर्दे पर सूर्य का प्रतिबिंबसुरक्षितवह पर्दे पर बने प्रतिबिंब को देखती है, सूर्य को कभी नहीं। यही चित्र 12.15 की व्यवस्था है।
आदित्यसीधे खाली आँखों से देखाअत्यंत हानिकारकग्रहण के दौरान भी सूर्य का प्रकाश आँखों को क्षति पहुँचा सकता है और अंधेपन का कारण बन सकता है।
अरूणाकृत्रिम नभोमंडल का कार्यक्रमसुरक्षित — और सर्वोत्तमआयोजक विशिष्टीकृत नेत्र-सुरक्षा भी देते हैं और वैज्ञानिक व्याख्या भी करते हैं।
सीधे देखना इतना खतरनाक क्यों है: आँख की प्रकाश-संवेदी परत में पीड़ा का अनुभव कराने वाली तंत्रिकाएँ नहीं होतीं, अतः क्षति चुपचाप हो जाती है और कई घंटों बाद पता चलती है — और वह स्थायी हो सकती है। धूप का चश्मा, काँच पर लगी कालिख, एक्सपोज़ की गई फिल्म, द्विनेत्री दूरबीन या दूरदर्शी इसका विकल्प नहीं हैं; दूरबीन और दूरदर्शी तो प्रकाश को और सांद्र करके हानि बढ़ा देते हैं।
प्र8.
चित्र 12.18 के वृत्तों में सूर्य, चंद्रमा तथा पृथ्वी में से चुनकर उपयुक्त शब्द लिखिए।
उत्तर

एक ही नियम दोनों पंक्तियों का निर्णय कर देता है: ग्रहण करने वाला पिंड सदैव बीच में होता है

चित्र 12.18 की पंक्तिपहला वृत्तबीच का वृत्तअंतिम वृत्त
सूर्य-ग्रहणसूर्य (दिया हुआ)चंद्रमापृथ्वी
चंद्र-ग्रहणसूर्यपृथ्वीचंद्रमा (दिया हुआ)
सूर्य-ग्रहण सूर्य चंद्रमा पृथ्वी चंद्रमा की छाया पृथ्वी पर चंद्र-ग्रहण सूर्य पृथ्वी चंद्रमा पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर
सूर्य-ग्रहण: सूर्य – चंद्रमा – पृथ्वी। चंद्र-ग्रहण: सूर्य – पृथ्वी – चंद्रमा। दोनों में बीच वाला पिंड छाया डालता है।
यही क्रम क्यों: सूर्य-ग्रहण में हमसे सूर्य छिपता है, अतः चंद्रमा को सूर्य और हमारे बीच होना ही पड़ेगा। चंद्र-ग्रहण में चंद्रमा काला पड़ता है, अतः पृथ्वी को सूर्य और चंद्रमा के बीच आकर उस प्रकाश को रोकना पड़ेगा जो चंद्रमा को प्रकाशित करता।
प्र9.
चंद्रमा सूर्य की तुलना में बहुत छोटा है फिर भी पूर्ण सूर्य-ग्रहण के समय यह हमारी दृष्टि से सूर्य को पूरी तरह से ओझल कर देता है। ऐसा क्यों संभव होता है?
उत्तर

क्योंकि ढकने के लिए वास्तविक आमाप नहीं, बल्कि आभासी आमाप महत्वपूर्ण होता है — अर्थात वह आमाप जो आँख को दिखाई देता है। आभासी आमाप वास्तविक आमाप और दूरी दोनों पर निर्भर करता है।

चंद्रमा सूर्य से बहुत छोटा है, परंतु हमसे बहुत अधिक निकट भी है। दोनों प्रभाव लगभग पूरी तरह एक-दूसरे को संतुलित कर देते हैं, इसलिए आकाश में चंद्रमा और सूर्य लगभग एक जैसे आमाप के दिखते हैं। यही कारण है कि चंद्रमा का पटल सूर्य के पटल को पूरी तरह ढक सकता है।

सूर्य चंद्रमा से लगभग 400 गुना चौड़ा
सूर्य हमसे चंद्रमा की अपेक्षा लगभग 400 गुना दूर
आभासी आमाप ∝ आमाप ÷ दूरी → दोनों अनुपात लगभग बराबर निकलते हैं
क्रियाकलाप 12.4 ही इसका प्रमाण है: आपका अँगूठा मात्र लगभग 2 cm चौड़ा है और मित्र का सिर लगभग 16 cm, फिर भी अँगूठा 5 मीटर दूर के सिर को पूरी तरह ढक लेता है — क्योंकि अँगूठा आँख से केवल लगभग 60 cm दूर है। चंद्रमा वही कर रहा है जो आपका अँगूठा करता है।
क्या आप जानते हैं? बुध और शुक्र चंद्रमा से बहुत बड़े हैं पर बहुत अधिक दूर हैं, अतः उनका आभासी आमाप अत्यंत छोटा होता है। शुक्र सूर्य के सामने से गुजरे तो वह केवल एक काला बिंदु दिखता है — ग्रहण कभी नहीं।
प्र10.
ऑस्ट्रेलिया में भारतीय क्रिकेट टीम के मैच प्राय: दिसंबर में होते हैं। अपनी इस यात्रा के लिए उन्हें सरदी के कपड़े ले जाने चाहिए या गरमी के।
उत्तर

उन्हें गरमी के कपड़े ले जाने चाहिए। दिसंबर में ऑस्ट्रेलिया में ग्रीष्म ऋतु होती है, जबकि भारत में उस समय शीत ऋतु होती है।

दिसंबर मेंभारत (उत्तरी गोलार्ध)ऑस्ट्रेलिया (दक्षिणी गोलार्ध)
उस गोलार्ध का झुकावसूर्य से परे की ओरसूर्य की ओर
सूर्य का प्रकाशकम तीव्र, प्रतिदिन 12 घंटे से कमअधिक तीव्र, प्रतिदिन 12 घंटे से अधिक
ऋतुशीत ऋतुग्रीष्म ऋतु
ऐसा क्यों होता है: पृथ्वी वर्ष भर अपने अक्ष का झुकाव एक ही दिशा में बनाए रखती है। दिसंबर में दक्षिणी गोलार्ध सूर्य की ओर झुका होता है, अतः ऑस्ट्रेलिया को अधिक तीव्र प्रकाश अधिक समय तक मिलता है — ग्रीष्म ऋतु। छह माह बाद, जून में, स्थिति ठीक उलट जाती है।
क्रिकेट से जाँचिए: मेलबर्न का प्रसिद्ध बॉक्सिंग डे टेस्ट 26 दिसंबर को आरंभ होता है — ऑस्ट्रेलियाई ग्रीष्म के मध्य में। ऊनी कपड़े नहीं, हल्के सूती कपड़े, टोपी और सनस्क्रीन चाहिए।
प्र11.
जब चंद्र-ग्रहण होता है तो इसे पृथ्वी के एक बड़े भाग से देखा जा सकता है किंतु पूर्ण सूर्य-ग्रहण केवल पृथ्वी के एक छोटे भाग से ही देखा जा सकता है। आपके विचार में ऐसा क्यों होता है?
उत्तर

इसका कारण दोनों स्थितियों में छाया के आमाप में और इस बात में है कि छाया के भीतर किसे आना पड़ता है

  • सूर्य-ग्रहण। छोटा चंद्रमा एक पतली छाया डालता है और उसकी छाया का सिरा पृथ्वी की सतह पर केवल एक छोटा-सा धब्बा बनाता है। पूर्ण ग्रहण केवल उसी धब्बे में खड़े प्रेक्षकों को दिखता है। उसके चारों ओर, जहाँ सूर्य का कुछ भाग ही ढका होता है, आंशिक ग्रहण दिखाई देता है।
  • चंद्र-ग्रहण। कहीं बड़ी पृथ्वी एक चौड़ी छाया डालती है और पूरा चंद्रमा उसके भीतर समा जाता है। ग्रहणग्रस्त चंद्रमा तब पृथ्वी के रात वाले भाग में प्रत्येक व्यक्ति को — अर्थात लगभग आधी पृथ्वी को — एक साथ दिखता है।
सूर्य-ग्रहण — बड़ी पृथ्वी पर छाया का छोटा धब्बा चंद्रमा पृथ्वी पूर्ण ग्रहण केवल इसी छोटे क्षेत्र में चंद्र-ग्रहण — बड़ी छाया के भीतर छोटा चंद्रमा पृथ्वी चंद्रमा रात वाले पूरे भाग से देखा जा सकता है
छोटा पिंड बड़े पिंड पर छाया डाले तो पूर्णता का क्षेत्र छोटा होता है; बड़ा पिंड छोटे पिंड पर छाया डाले तो वह पूरा उसमें समा जाता है।
"कुछ ही मिनट" का एक और कारण: पृथ्वी के घूर्णन और चंद्रमा की अपनी कक्षा में गति के कारण चंद्रमा की छाया पृथ्वी की सतह पर लगातार खिसकती रहती है। इसलिए भाग्यशाली क्षेत्र में भी पूर्ण ग्रहण कुछ ही मिनटों का होता है — जबकि पूर्ण चंद्र-ग्रहण एक घंटे या उससे भी अधिक चल सकता है, क्योंकि चंद्रमा को पृथ्वी की चौड़ी छाया पार करने में इतना समय लगता है।
प्र12.
व्याख्या कीजिए कि यदि पृथ्वी का घूर्णन अक्ष इसके परिक्रमण तल के सापेक्ष झुका हुआ ना होता तो ऋतुओं पर इसका क्या प्रभाव होता?
उत्तर

तब ऋतुएँ होती ही नहीं। पृथ्वी के प्रत्येक स्थान पर वर्ष भर एक जैसा मौसम रहता और प्रत्येक दिन विषुव दिवस जैसा होता।

अक्ष के अभिलंबवत होने पर दिन-रात की सीमा सदैव दोनों ध्रुवों से होकर गुजरती। अतः —

  • वर्ष के प्रत्येक दिन, प्रत्येक स्थान पर दिन और रात 12–12 घंटे के होते। न ग्रीष्म के लंबे दिन होते, न शीत के छोटे।
  • कोई भी गोलार्ध कभी सूर्य की ओर नहीं झुकता, अतः किसी भी स्थान पर सूर्य के प्रकाश की तीव्रता वर्ष भर एक जैसी रहती।
  • विषुवत रेखा के पास सदैव गरमी, मध्य अक्षांशों में सदैव सुहावना और ध्रुवीय प्रदेशों में सदैव कड़ाके की ठंड रहती — परंतु इनमें कभी परिवर्तन नहीं होता।
  • न उत्तर-अयनांत होता, न दक्षिण-अयनांत, न छह माह का ध्रुवीय दिन और न छह माह की ध्रुवीय रात।
झुकाव ही कारण क्यों है: झुकाव एक साथ दो काम करता है। यह सूर्य की किरणों को उस गोलार्ध पर अधिक सीधी बना देता है जो सूर्य की ओर झुका है, जिससे किरणों की समान मात्रा छोटे क्षेत्र पर सांद्र हो जाती है; और यह उस गोलार्ध का आधे से अधिक भाग प्रकाशित भाग में रखता है, जिससे दिन लंबा हो जाता है। झुकाव हटा दीजिए तो दोनों प्रभाव एक साथ समाप्त हो जाते हैं — और उनके साथ ऋतुएँ भी।
सामान्य भूल: ऐसी स्थिति में भी पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती रहती और जनवरी में सूर्य के कुछ निकट होती। इससे ऋतुएँ फिर भी नहीं लौटतीं, क्योंकि दूरी का यह अंतर बहुत ही कम है — यही कारण पृष्ठ 178 के गहन चिंतन बॉक्स में भी दिया गया है।
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