कुतूहल अध्याय 12 गहन चिंतन

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
घूर्णन किसी वस्तु की ऐसी गति है जिसमें उसके सभी भाग एक काल्पनिक रेखा के परित: बंद वृत्ताकार पथों पर घूमते हैं। इस रेखा को घूर्णन-अक्ष कहते हैं।
उत्तर

यही वह परिभाषा है जो कंठस्थ करनी चाहिए। इसमें तीन बातें छिपी हैं:

  1. सभी भाग गति करते हैं — केवल एक बिंदु नहीं। वस्तु का प्रत्येक कण इसमें भाग लेता है।
  2. प्रत्येक भाग वृत्ताकार पथ पर चलता है — न सीधी रेखा में, न अव्यवस्थित रूप से।
  3. इन वृत्तों का केंद्र वस्तु से गुजरती एक ही काल्पनिक रेखा पर होता है — यही घूर्णन-अक्ष है।
घूर्णन करती वस्तुउसका घूर्णन-अक्षकौन-से भाग स्थिर रहते हैं
लट्टूउसकी धुरीधुरी पर स्थित बिंदु
छत का पंखाकेंद्र से गुजरता शाफ्टहब का केंद्र
पृथ्वीउत्तरी और दक्षिणी ध्रुव से गुजरती रेखादोनों ध्रुव
घूर्णन और परिक्रमण एक नहीं हैं: घूर्णन में अक्ष वस्तु के भीतर से गुजरता है (पृथ्वी का 24 घंटे में घूमना)। परिक्रमण में वस्तु किसी अन्य वस्तु के चारों ओर घूमती है (पृथ्वी का सूर्य के चारों ओर लगभग 365 दिन और 6 घंटे में घूमना)।
प्र2.
पृथ्वी पर भिन्न-भिन्न ऋतुओं के आगमन के प्रायः दो गलत कारण दिए जाते हैं — जब उत्तरी गोलार्ध सूर्य की ओर झुकता है तो वह सूर्य के समीप होता है। पृथ्वी की कक्षा अंडाकार होने के कारण सूर्य उसके केंद्र से थोड़ा हटकर होता है अतः पृथ्वी वर्षभर में सूर्य से भिन्न-भिन्न दूरियों पर होती है।
उत्तर

दोनों कारण सुनने में ठीक लगते हैं, परंतु दोनों गलत हैं। दोनों ही अवस्थाओं में दूरियों का अंतर इतना कम है कि उससे ऋतु नहीं बन सकती।

  • "झुका हुआ गोलार्ध पास आ जाता है।" पृथ्वी की त्रिज्या लगभग 6,400 km है जबकि पृथ्वी-सूर्य दूरी लगभग 15 करोड़ km। झुकाव से उत्तरी गोलार्ध कुछ हज़ार किलोमीटर ही पास आता है — 15 करोड़ में से कुछ हज़ार, अर्थात एक प्रतिशत के सौवें भाग से भी कम। इससे ऋतु नहीं बन सकती।
  • "पृथ्वी कुछ महीनों में सूर्य के पास होती है।" कक्षा बहुत थोड़ी-सी ही अंडाकार है। पृथ्वी की निकटतम और अधिकतम दूरी लगभग 14.7 करोड़ km और 15.2 करोड़ km है — अंतर मात्र लगभग 3 प्रतिशत।
अधिकतम − निकटतम = 15.2 − 14.7 = 0.5 करोड़ km
दूरी के अनुपात में: 0.5 ÷ 15 ≈ 0.033 = लगभग 3% मात्र।
निर्णायक तथ्य: पृथ्वी जनवरी माह में सूर्य के सबसे निकट होती है — जो उत्तरी गोलार्ध में कड़ाके की शीत ऋतु का और दक्षिणी गोलार्ध में भरी ग्रीष्म ऋतु का समय है। यदि दूरी ही ऋतु तय करती तो जनवरी में दोनों गोलार्धों में एक साथ ग्रीष्म होना चाहिए था। ऐसा नहीं होता। अतः कारण दूरी नहीं, बल्कि अक्ष का झुकाव और पृथ्वी की गोल आकृति है।
प्र3.
उत्तरी गोलार्ध में सबसे लंबा दिन लगभग 21 जून को होता है यह उत्तर-अयनांत कहलाता है। उत्तर-अयनांत के बाद दिन की अवधि घटने लगती है जबकि रात्रि की अवधि बढ़ने लगती है। इस गोलार्ध में सबसे छोटा दिन और सबसे लंबी रात 22 दिसंबर के आस-पास होती है जिसे दक्षिण-अयनांत कहा जाता है। 21 मार्च तथा 23 सितंबर के आस-पास दिन और रात 12–12 घंटे के होते हैं। उत्तरी गोलार्ध में इन दिनों को क्रमशः वसंत विषुव एवं हेमंत विषुव कहा जाता है।
उत्तर

ये चार तिथियाँ वर्ष के मील के पत्थर हैं। इन्हें तालिका के रूप में याद कीजिए।

तिथि (लगभग)उत्तरी गोलार्ध में नामयहाँ दिन की अवधिक्या हो रहा होता है
21 मार्चवसंत विषुव12 घंटेकोई भी ध्रुव सूर्य की ओर नहीं झुका होता
21 जूनउत्तर-अयनांतवर्ष का सबसे लंबा दिनउत्तरी गोलार्ध सर्वाधिक सूर्य की ओर झुका होता है
23 सितंबरहेमंत विषुव12 घंटेकोई भी ध्रुव सूर्य की ओर नहीं झुका होता
22 दिसंबरदक्षिण-अयनांतवर्ष का सबसे छोटा दिनउत्तरी गोलार्ध सर्वाधिक सूर्य से परे झुका होता है
ऐसा क्यों होता है: "अयनांत" झुकाव के मोड़-बिंदु हैं और "विषुव" वे दो दिन हैं जब दिन-रात की सीमा दोनों ध्रुवों से होकर गुजरती है और सर्वत्र दिन-रात बराबर होते हैं। 21 जून से 22 दिसंबर तक दिन छोटा होता जाता है और 22 दिसंबर से 21 जून तक फिर बड़ा होता जाता है।
क्या आप जानते हैं? उत्तरी ध्रुव पर विषुव दिवस 21 मार्च को सूर्य उदित होता है और सतत छ: माह तक आकाश में बना रहता है; 22 सितंबर को वह अस्त होता है। दक्षिणी ध्रुव पर इसके ठीक विपरीत होता है।
प्र4.
यद्यपि बुद्ध और शुक्र ग्रह आमाप में चंद्रमा की अपेक्षा बहुत अधिक बड़े हैं परंतु वे चंद्रमा की अपेक्षा पृथ्वी से बहुत अधिक दूरी पर भी हैं। अतः उनके आभासी आमाप सूर्य की अपेक्षा बहुत छोटे होते हैं और वे सूर्य के प्रकाश को अवरुद्ध नहीं कर पाते। उदाहरण के लिए, जब शुक्र, सूर्य और पृथ्वी के बीच गमन करता है तो यह सूर्य के चमकदार पृष्ठ के सामने से गुजरते हुए एक सूक्ष्म काले धब्बे की भाँति दिखाई पड़ता है। यह एक दुर्लभ घटना है जिसे शुक्र ग्रह का पारगमन कहा जाता है।
उत्तर

यह बॉक्स वस्तुत: क्रियाकलाप 12.4 का ही दूसरा प्रयोग है — सब कुछ आभासी आमाप तय करता है, और आभासी आमाप वास्तविक आमाप तथा दूरी दोनों पर निर्भर करता है।

पिंडवास्तविक व्यासपृथ्वी से दूरीआकाश में आभासी आमाप
चंद्रमालगभग 3,500 km — तीनों में सबसे छोटालगभग 3.8 लाख km — सबसे निकटसूर्य के लगभग बराबर — यह सूर्य को ढक सकता है
शुक्रलगभग 12,000 km — चंद्रमा से बड़ाकरोड़ों किलोमीटर — बहुत दूरएक सूक्ष्म धब्बा
बुधलगभग 4,900 km — चंद्रमा से बड़ापारगमन के समय शुक्र से भी दूरऔर भी सूक्ष्म धब्बा
ऐसा क्यों होता है: केवल बड़ा होना पर्याप्त नहीं है। चंद्रमा इस होड़ में केवल इसलिए जीतता है क्योंकि वह इतना निकट है। शुक्र का पारगमन दिन में अँधेरा नहीं करता; वह सूर्य के पटल पर बस एक काला बिंदु बना देता है, जिसे केवल सुरक्षित प्रक्षेपण-विधि से देखा जा सकता है — सूर्य को सीधे देखकर कभी नहीं।
ध्यान दीजिए: पुस्तक के इस बॉक्स में "बुद्ध" छपा है; अभिप्राय बुध ग्रह से है — सूर्य के सबसे निकट का ग्रह।
प्र5.
क्रियाकलाप 11.5 की भाँति ही इस क्रियाकलाप को भी आपके शिक्षक द्वारा ही स्थापित किया जाना चाहिए। सूर्य के प्रतिबिंब को दीवार पर प्रक्षेपित करने के लिए एक दर्पण का उपयोग किया जा सकता है। तथापि सूर्य-ग्रहण की पूरी घटना के दौरान इसे सही कोण पर बनाए रखना एक कठिन कार्य हो सकता है। इस कठिनाई को दूर करने के लिए दर्पण को किसी चल आधार पर स्थापित कीजिए। एक खोखली गेंद लीजिए जिसमें एक छोटा छिद्र हो। इसे स्थिर रखने के लिए आधा रेत से भरिए और इस पर एक ऐसा छोटा दर्पण, जैसा कढ़ाई के डिजाइनों में लगाने के काम आता है, लगाइए। गेंद को एक वृत्ताकार वलय जैसे कि आसंजक टेप के वलय पर टिकाइए ताकि इसे सरलता से चारों ओर घुमाया जा सके।
उत्तर

सूर्य-ग्रहण देखने की यह सुरक्षित विधि है — आप दीवार पर बने सूर्य के प्रतिबिंब को देखते हैं, सूर्य को कभी नहीं। इसे बनाने और उपयोग करने का तरीका:

  1. एक छोटे छिद्र वाली खोखली गेंद लीजिए और उसे आधा सूखी रेत से भर दीजिए। रेत गुरुत्व-केंद्र नीचे कर देती है जिससे गेंद लुढ़कने के बजाय स्थिर रहती है।
  2. गेंद के बाहर एक छोटा दर्पण चिपकाइए — कढ़ाई में लगने वाला दर्पण सबसे उपयुक्त है।
  3. गेंद को किसी वलय पर, जैसे आसंजक टेप के रोल पर, टिका दीजिए। अब गेंद को किसी भी दिशा में हल्का-सा घुमाया जा सकता है और वह वहीं टिकी रहती है — यही चल आधार है।
  4. गेंद को तब तक घुमाइए जब तक परावर्तित सूर्य-प्रकाश छाया में रखी दीवार अथवा सफेद पर्दे पर न पड़े। पर्दा दूर करने पर प्रतिबिंब बड़ा किंतु मंद और पास लाने पर छोटा किंतु चमकीला बनता है।
  5. ग्रहण के समय दीवार पर बना गोल धब्बा वस्तुत: सूर्य का प्रतिबिंब है। चंद्रमा का काला कटाव दीवार पर ही बढ़ता-घटता देखिए।
छोटा दर्पण क्यों काम करता है: पर्दे से दूर रखा छोटा समतल दर्पण सूक्ष्मछिद्र (पिनहोल) की भाँति व्यवहार करता है — प्रकाश का धब्बा दर्पण की आकृति की नकल छोड़कर सूर्य का गोल प्रतिबिंब बन जाता है। इसीलिए ग्रहण के समय इस धब्बे की आकृति बदलती दिखती है।
सावधानी: यह क्रियाकलाप पूरी तरह शिक्षक के मार्गदर्शन में ही किया जाना चाहिए। परावर्तित प्रकाश किसी की आँखों पर न पड़े, और सूर्य अथवा दर्पण को सीधे कभी न देखें।
प्र6.
वास्तविकता यह है कि सौर परिवार में ग्रह एक विशिष्ट बिंदु के परित: परिक्रमा करते हैं। ये सूर्य के बहुत निकट है किंतु ठीक इसके केंद्र पर नहीं है। सूर्य भी पूर्णतया गतिहीन नहीं है। वह भी इस बिंदु के परित: स्वल्प गति करता है। वैज्ञानिक अन्य तारों की गतियों में इस प्रकार की सूक्ष्म डगमगाहटों का उपयोग करके उनके परित: विद्यमान बाह्य ग्रहों की खोज के लिए प्रयास करते रहते हैं।
उत्तर

स्थिर सूर्य और उसके चारों ओर घूमते ग्रहों का चित्र बहुत अच्छा सन्निकटन है, पूरा सत्य नहीं।

सूर्य और ग्रह एक-दूसरे को खींचते हैं। इसलिए सूर्य और ग्रह दोनों एक साझा संतुलन-बिंदु के परित: घूमते हैं — यह बिंदु सूर्य के केंद्र के अत्यंत निकट होता है, क्योंकि सूर्य कहीं अधिक द्रव्यमान वाला है, किंतु ठीक केंद्र पर नहीं होता। अतः सूर्य पूर्णतया स्थिर रहने के बजाय एक छोटा-सा वृत्त बनाता रहता है।

यह इतना उपयोगी क्यों है: यदि किसी अन्य तारे के चारों ओर ग्रह हैं तो वह तारा भी इसी प्रकार डगमगाएगा। वे ग्रह इतने मंद होते हैं कि उनका चित्र नहीं लिया जा सकता, किंतु तारा चमकीला होता है — और उसकी सूक्ष्म, नियमित डगमगाहट को मापकर छिपे ग्रह का पता चल जाता है। अन्य तारों के परित: इस विधि से खोजे गए ग्रह बाह्य ग्रह कहलाते हैं।
सरल प्रतिरूप: लगभग अपने बराबर भार वाले मित्र का हाथ पकड़कर घूमिए — दोनों में से कोई भी स्थिर नहीं रहता, दोनों बीच के एक बिंदु के परित: घूमते हैं। अब कोई भारी व्यक्ति किसी छोटे बच्चे को इसी प्रकार घुमाए तो वह लगभग स्थिर दिखेगा, पर पूरी तरह स्थिर नहीं। यही सूर्य की डगमगाहट है।
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