कुतूहल अध्याय 2 पाठ्य प्रश्न

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
स्थिति 1 — कीर्ति उद्यान में एक तितली को देख रही थी। उसका हाथ पेड़ के तने पर टिका हुआ था। अचानक एक लाल चींटी ने उसे काट लिया। इससे उसकी त्वचा लाल हो गई और उसे बहुत दर्द हुआ (चित्र 2.11)। उसके भाई ने प्रभावित क्षेत्र पर नम बेकिंग सोडा लगाकर उसकी सहायता की जिससे उसे दर्द से आराम मिला। आपको क्या लगता है कि इसका क्या कारण हो सकता है?
उत्तर

चींटी के काटने से त्वचा में अम्ल पहुँचता है, और बेकिंग सोडा क्षार है जो उसे उदासीन कर देता है।

चींटी का काटना → त्वचा में फॉर्मिक अम्ल → जलन और दंशकारी पीड़ा
नम बेकिंग सोडा (क्षार) रगड़ने पर
उदासीनीकरण → अम्ल का प्रभाव समाप्त → दर्द से आराम
बेकिंग सोडा नम ही क्यों: सूखा चूर्ण त्वचा पर बस पड़ा रहेगा। जल उसे दंश-स्थल में फैलने देता है जिससे वह वास्तव में अम्ल तक पहुँच पाता है। यह क्रियाकलाप 2.7 वाली उदासीनीकरण अभिक्रिया ही है — केवल यहाँ अम्ल परखनली में नहीं, आपकी त्वचा के भीतर है।
संकेत: पहले स्थान को खूब पानी से धोइए। खुजाइए नहीं — खुजाने से अम्ल और भीतर चला जाता है तथा संक्रमण हो सकता है।
प्र2.
आपके क्षेत्र में चींटियों के काटने पर उपचार के लिए कौन-कौन से उपाय किए जाते हैं?
उत्तर

अधिकांश पारंपरिक उपाय या तो कोई क्षार होते हैं जो अम्ल को उदासीन करता है, या कुछ ऐसा जो सूजन को शांत करता है।

प्रचलित उपायप्रकृतिकैसे सहायता करता है
नम बेकिंग सोडा का लेपक्षारीयफॉर्मिक अम्ल को उदासीन करता है
चूने का लेपक्षारीयअम्ल को उदासीन करता है; अनेक गाँवों में प्रचलित
टूथपेस्टहल्का क्षारीयउदासीन करता है और ठंडक देता है
कैलामाइन लोशनइसमें ज़िंक कार्बोनेट, एक क्षारउदासीन करता है और शांति देता है
बर्फ या ठंडा पानीउदासीनअम्ल को उदासीन नहीं करता, पर दर्द व सूजन घटाता है

नमूना उत्तर: “हमारे क्षेत्र में चींटी के काटने पर लोग नम बेकिंग सोडा या थोड़ा चूना लगाते हैं, और बड़े-बुज़ुर्ग कभी-कभी तुलसी की पिसी पत्ती दबा देते हैं।”

अम्ल का उपयोग क्यों नहीं: चींटी के दंश पर नींबू का रस या सिरका लगाने से पहले से मौजूद अम्ल में और अम्ल जुड़ जाएगा और जलन बढ़ेगी। उपचार समस्या के विपरीत होना चाहिए।
प्र3.
स्थिति 2 — कृषक पोर्टल (कृषि, सहकारिता एवं कृषक कल्याण विभाग का एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म) पर एक कृषक ने पूछा, “मेरे पौधे कुछ दिनों से भली-भाँति वृद्धि नहीं कर रहे हैं।” विस्तृत चर्चा के पश्चात यह पाया गया कि रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग से मृदा अम्लीय हो गई है। मृदा के उपचार हेतु कृषक को क्या सुझाव दिया जा सकता है?
उत्तर

खेत को चूने से उपचारित कीजिए, जो क्षारीय प्रकृति का है (चित्र 2.12)। चूना अतिरिक्त अम्ल को उदासीन कर मृदा को पुन: उदासीन के निकट ले आता है, जिसके बाद पौधे अच्छी वृद्धि करने लगते हैं।

अत्यधिक रासायनिक उर्वरक → मृदा अम्लीय → पौधों की खराब वृद्धि
चूना (क्षार) मिलाइए → उदासीनीकरण → मृदा पुन: पौधों के योग्य

अध्याय विपरीत स्थिति भी बताता है: यदि मृदा क्षारीय है तो उसमें जैविक खाद और कम्पोस्ट की गई पत्तियाँ जैसे कार्बनिक पदार्थ मिलाए जाते हैं — कार्बनिक पदार्थ अम्ल छोड़ते हैं जो मृदा की क्षारीय प्रकृति को उदासीन कर देते हैं।

अम्लीय मृदा पौधों को क्यों हानि पहुँचाती है: जड़ें मृदा-जल से पोषक तत्व केवल एक निश्चित परिस्थिति-सीमा में ही ले पाती हैं। अत्यधिक अम्ल पोषक तत्वों को बाँध देता है, अत: भोजन मृदा में होते हुए भी पौधा भूखा रह जाता है।
क्या आप जानते हैं? अध्याय एक तीसरी संभावना भी बताता है — मृदा पूर्णत: उदासीन हो और फिर भी पौधे अस्वस्थ हों। तब कारण अम्ल-क्षार नहीं, पोषक तत्वों की कमी है। उपचार से पहले परीक्षण अवश्य कीजिए।
प्र4.
स्थिति 3 — अश्विन का मित्र गुरबीर एक औद्योगिक क्षेत्र के समीप रहता है। उसने अश्विन को बताया कि उसके पड़ोस की झील में मछलियों की संख्या दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही है! आपको क्या लगता है इसके क्या कारण हो सकते हैं?
उत्तर

सबसे संभावित कारण है झील में कारखानों का अपशिष्ट छोड़ा जाना

  • यदि अपशिष्ट अम्लीय या क्षारीय है तो वह झील के जल की प्रकृति बदल देता है। मछलियाँ केवल उदासीन के निकट वाले जल में ही जीवित रह सकती हैं।
  • अपशिष्ट जल को गंदा भी कर देता है और उसमें घुली ऑक्सीजन घटा देता है।
  • अन्य सामान्य कारण — घरों का मल-जल, और आस-पास के खेतों से बहकर आने वाले उर्वरक।
मछलियाँ सबसे पहले क्यों प्रभावित होती हैं: मछली के क्लोमों पर जल निरंतर बहता रहता है। झील में उपस्थित कोई भी हानिकारक पदार्थ मिनटों में उसके रुधिर तक पहुँच जाता है — वह प्रदूषित भाग से चलकर दूर नहीं जा सकती जैसा कोई स्थलीय जंतु कर लेता है।
प्र5.
यदि कारखानों का अपशिष्ट अम्लीय प्रकृति का है तो झील में मछलियों को बचाने के लिए क्या किया जा सकता है?
उत्तर

अपशिष्ट को छोड़ने से पहले उसे उदासीन कीजिए। उपचार टंकी में अम्लीय अपशिष्ट में क्षारीय पदार्थ मिलाए जाते हैं और उदासीन हो जाने पर ही उसे झील में जाने दिया जाता है।

अम्लीय कारखाना-अपशिष्ट
+ क्षारीय पदार्थ (जैसे चूना)
→ उदासीनीकरण → अपशिष्ट उदासीन
तभी झील में छोड़ा जाए
उपचार कारखाने में ही क्यों, झील में क्यों नहीं: निकास नली पर अपशिष्ट सांद्र और मात्रा में कम होता है, अत: क्षार की संभालने योग्य मात्रा से काम बन जाता है। एक बार पूरी झील में फैल जाने पर इतना क्षार जुटाना असंभव है कि वह हर भाग तक पहुँचे — और तब तक मछलियाँ मर चुकी होंगी। प्रदूषण का उपचार उसके स्रोत पर करना सदा सस्ता और अधिक दयालु है।
प्र6.
आइए, निष्कर्ष निकालें! अब क्या आप बता सकते हैं कि जब अश्विन और कीर्ति के श्वेत कागज पर द्रव छिड़का गया तो उन पर ‘विज्ञान के अद्भुत जगत में आपका स्वागत है’ ऐसा लिखा हुआ क्यों दिखाई दिया? क्या आपको एक संभावना यह भी लगती है कि छिड़काव के लिए हल्दी के विलयन का और कागज पर लिखने के लिए साबुन के विलयन का प्रयोग किया गया होगा?
उत्तर

हाँ — यह ठीक वैसे ही हुआ होगा, और यह हल्दी-सूचक का ही चतुर उपयोग है।

  1. संदेश पहले से श्वेत कागज पर साबुन के विलयन (क्षार) से लिखकर सुखा दिया गया था। श्वेत कागज पर सूखा साबुन का विलयन लगभग अदृश्य होता है।
  2. प्रवेश द्वार पर कार्यकर्त्ता ने कागज पर हल्दी का विलयन छिड़का। पूरा कागज हल्का पीला हो गया।
  3. जहाँ-जहाँ हल्दी सूखे क्षार से मिली, वहाँ वह लाल हो गई। इस प्रकार पीली पृष्ठभूमि पर अक्षर लाल रंग में उभर आए।
अदृश्य लेखन = साबुन का विलयन (क्षार), सुखाया हुआ
छिड़काव = हल्दी का विलयन (सूचक)
हल्दी + क्षार → लाल
→ संदेश दिखाई देने लगता है
छिड़काव से पहले लेखन अदृश्य क्यों: श्वेत कागज पर सूखा हुआ रंगहीन द्रव लगभग उसी प्रकार प्रकाश परावर्तित करता है जैसे कागज स्वयं। कागज पर कोई रंग है ही नहीं, जब तक सूचक आकर उसी स्थान पर रंग न बना दे।
यह कीजिए: दोनों को उलट दीजिए — हल्दी के विलयन से लिखिए और साबुन का विलयन छिड़किए। संदेश तब भी लाल रंग में उभरेगा, क्योंकि रंग क्षार और हल्दी के मिलने से बनता है, आने के क्रम से नहीं।
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