जिन व्यवस्थाओं में लैंप दीप्तिमान होता है उन्हें ध्यानपूर्वक देखिए। इनकी तुलना उन व्यवस्थाओं से कीजिए जिनमें लैंप दीप्तिमान नहीं होता। क्या आप इस अंतर के कारण का पता लगा सकते हैं?
उत्तर
हाँ। जिन व्यवस्थाओं में लैंप दीप्तिमान होता है उनमें संयोजन एक संपूरित, अटूट पाश बनाते हैं; शेष में यह पाश कहीं-न-कहीं भंग रहता है।
बंद पाश — धारा धन टर्मिनल से निकलकर लैंप से होती हुई ऋण टर्मिनल पर लौटती है। पाश कहीं भी टूटे तो लैंप बुझ जाता है।
यह अंतर नियम के रूप में इस प्रकार है:
लैंप दीप्तिमान होता है — जब लैंप का एक सिरा सेल के एक टर्मिनल से और दूसरा सिरा सेल के दूसरे टर्मिनल से जुड़ा हो।
लैंप दीप्तिमान नहीं होता — जब या तो कोई जोड़ खुला रह जाए (क्र.सं. 2, 3), या लैंप के दोनों सिरे सेल के एक ही टर्मिनल से जुड़ जाएँ (क्र.सं. 4, 5)।
पहले प्रकार की व्यवस्था विद्युत परिपथ कहलाती है। यह लैंप से होकर विद्युत-धारा के प्रवाह के लिए संपूरित पथ प्रदान करती है और लैंप तभी दीप्तिमान होता है जब परिपथ में धारा प्रवाहित होती है। परंपरा के अनुसार धारा की दिशा सदैव सेल के धनात्मक टर्मिनल से ऋणात्मक टर्मिनल की ओर मानी जाती है।
क्या आप जानते हैं? कभी-कभी सही परिपथ में भी लैंप दीप्तिमान नहीं होता। तब हम कहते हैं कि लैंप 'फ्यूज' हो गया — उसका तंतु टूट गया है, अतः बल्ब के भीतर ही पथ खुला हो गया है।
क्या यह उपयोगी रहा?प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद!त्रुटि बताएँ