प्र1.
सामान्यत: यह माना जाता रहा है कि ताँबे की खोज लोहे से पूर्व हुई। इसका संभावित कारण क्या हो सकता है?
उत्तर
क्योंकि ताँबा प्राप्त करना और उस पर कार्य करना लोहे की तुलना में कहीं सरल है। तीन कारण मिलकर इसे समझाते हैं।
- ताँबा प्रकृति में लगभग शुद्ध रूप में मिल जाता है। ताँबे की डलियाँ सीधे उठाई जा सकती थीं और उनकी लालिमा लिए धात्विक चमक शीघ्र ध्यान खींचती थी। लोहा प्राय: फीके दिखने वाले पत्थर जैसे अयस्क के भीतर बंद रहता है।
- ताँबे को निकालना और गलाना आसान है। यह साधारण लकड़ी या कोयले की आग में ही अयस्क से निकल आता है और पिघल जाता है। लोहे के लिए कहीं अधिक गरम भट्टी और उसमें वायु प्रवाहित करने की व्यवस्था चाहिए — यह तकनीक विकसित होने में बहुत समय लगा।
- ताँबा अधिक नरम है। इसे ठंडी अवस्था में ही पीटकर पात्र या आभूषण बनाया जा सकता है। लोहे को आकार देने के लिए पहले सुर्ख लाल करना पड़ता है — ठीक वैसे ही जैसे सुदर्शन चाचा करते हैं।
यह क्यों महत्वपूर्ण है: जब अधिक ताप वाली भट्टी बनाना आ गया तो लोहे ने भारत का जीवन बदल दिया। लोहे के हल भारी मिट्टी भी काट सकते थे, उपज बढ़ी और स्थायी कृषि-ग्राम नगरों को सहारा देने लगे। हड़प्पावासी ताँबे और सोने का उपयोग करते थे, लोहा दैनिक जीवन में बहुत बाद में आया।