प्र1.
अब भिन्न-भिन्न नलियों की सहायता से एक-एक करके प्रत्येक गिलास में वायु फूँकते हुए अवलोकन कीजिए। क्या आप कोई परिवर्तन देखते हैं?
उत्तर
हाँ — परंतु केवल गिलास ‘ख’ में।
| गिलास | उसमें क्या है | वायु फूँकने पर क्या दिखता है | परिवर्तन का प्रकार |
|---|---|---|---|
| क | नल का जल | केवल बुलबुले उठते हैं। जल पहले जैसा ही दिखता है। | कोई रासायनिक परिवर्तन नहीं |
| ख | चूने का पानी | बुलबुले उठते हैं और स्वच्छ चूने का पानी दूधिया हो जाता है। कुछ समय स्थिर छोड़ने पर श्वेत पदार्थ तली में बैठ जाता है। | रासायनिक परिवर्तन |
तली में बैठने वाला श्वेत ठोस एक नया पदार्थ है — कैल्सियम कार्बोनेट, जो जल में अघुलनशील है। चूँकि एक अथवा एक से अधिक नए पदार्थ बनते हैं, अतः यह एक रासायनिक परिवर्तन है, जो रासायनिक अभिक्रिया द्वारा होता है —
कैल्सियम हाइड्रॉक्साइड + कार्बन डाइऑक्साइड → कैल्सियम कार्बोनेट + जल
(चूने का पानी) (निःश्वसित वायु से) (श्वेत, अघुलनशील पदार्थ)
(चूने का पानी) (निःश्वसित वायु से) (श्वेत, अघुलनशील पदार्थ)
ऐसा क्यों होता है: हम जो वायु बाहर छोड़ते हैं उसमें कार्बन डाइऑक्साइड अधिक होती है। गिलास ‘क’ में यह केवल बुलबुलों के रूप में निकल जाती है, क्योंकि साधारण जल के साथ इसकी कोई दृश्य अभिक्रिया नहीं होती। गिलास ‘ख’ में यह चूने के पानी में घुले कैल्सियम हाइड्रॉक्साइड से अभिक्रिया कर कैल्सियम कार्बोनेट के सूक्ष्म श्वेत कण बनाती है। ये कण घुलते नहीं, द्रव में लटके रहते हैं, इसीलिए चूने का पानी दूधिया दिखाई देता है।
सावधानी: नली से धीरे-धीरे फूँकिए, कभी खींचिए मत। चूने का पानी निगलना हानिकारक है।