यह कथन पूर्णतः सत्य है, क्योंकि जल-चक्र जल को वहाँ से जहाँ वह प्रचुर है वहाँ पहुँचाता रहता है जहाँ उसकी आवश्यकता है, और जो जल उपयोग हो जाता है उसे पुनः भरता भी रहता है।
सूर्य समुद्रों, नदियों और झीलों को गरम करता है → जल वाष्पित होकर जलवाष्प बनता है
पेड़-पौधे वाष्पोत्सर्जन द्वारा और जलवाष्प जोड़ते हैं
जलवाष्प ऊपर उठकर ठंडी होती है और संघनित होकर बादल बनाती है
बादल स्थल के ऊपर जाकर वर्षा, हिम और ओले देते हैं (वर्षण)
जल तालाबों, झीलों, नदियों और समुद्रों में जाता है अथवा भूमि में रिस जाता है
⇒ चक्र पुनः आरंभ
पुन:वितरण — जलवाष्प अधिकतर महासागरों के ऊपर बनती है, परंतु बादल उसे हजारों किलोमीटर भीतर तक ले जाते हैं, जिससे पहाड़ों, मैदानों, वनों और खेतों पर वर्षा होती है। पर्वतों पर गिरी हिम ग्रीष्म में पिघलकर नदियों के रूप में बहती है और उन क्षेत्रों तक जल पहुँचाती है जहाँ स्वयं वर्षा बहुत कम होती है।
पुन:भरण — जिन नदियों, झीलों और कुँओं से हम जल लेते हैं, वे प्रतिवर्ष इसी चक्र से भर जाती हैं। भूमि में रिसा वर्षा-जल जलभृतों को पुनः भर देता है, जिससे भौम जल के स्रोत बने रहते हैं।
बड़ी बात: जल-चक्र पृथ्वी पर जल की कुल मात्रा को भी संरक्षित रखता है। एक बूँद भी न बनती है, न नष्ट होती है — वही जल प्रयोग होता है, लौटता है और फिर प्रयोग होता है। हम किसी विशेष स्थान पर जल खो सकते हैं, इसीलिए वर्षा जल संग्रहण और पुन:भरण गड्ढे इतने महत्वपूर्ण हैं।
संकेत: परीक्षा में चारों प्रक्रियाएँ — वाष्पन, वाष्पोत्सर्जन, संघनन और वर्षण — नाम लेकर लिखिए और फिर स्पष्ट कीजिए कि क्या पुनर्वितरित होता है और क्या पुनः भरता है।