कुतूहल अध्याय 7 आइए, और अधिक सीखें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
प्रत्येक के लिए एक सही विकल्प चुनिए — आपके पिताजी ने एक सॉसपैन खरीदा जो दो भिन्न पदार्थों (क) एवं (ख) से बना है, जैसा कि चित्र 7.14 में दर्शाया गया। पदार्थ (क) और (ख) के निम्नलिखित गुणधर्म हैं — (क) ‘क’ और ‘ख’ दोनों ऊष्मा के सुचालक हैं। (ख) ‘क’ और ‘ख’ दोनों ऊष्मा के कुचालक हैं। (ग) ‘क’ ऊष्मा का सुचालक है और ‘ख’ कुचालक है। (घ) ‘क’ ऊष्मा का कुचालक है और ‘ख’ सुचालक है।
उत्तर

(ग) ‘क’ ऊष्मा का सुचालक है और ‘ख’ कुचालक है।

चित्र 7.14 में ‘क’ सॉसपैन का पात्र-भाग है — वह भाग जो लौ पर रखा जाता है और भोजन रखता है — तथा ‘ख’ उसका हत्था है।

भागउसे क्या करना हैआवश्यक गुणप्रयुक्त पदार्थ
क — पात्र का भागलौ से ऊष्मा शीघ्रता से भोजन तक पहुँचानाऊष्मा का सुचालकऐलुमिनियम, स्टील, लोहा
ख — हत्थाऊष्मा को पकड़ने वाले हाथ तक न पहुँचने देनाऊष्मा का कुचालकलकड़ी, प्लास्टिक, बेकेलाइट
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं: यदि दोनों सुचालक होते (क) तो हत्था इतना गरम हो जाता कि पकड़ा ही न जाता। यदि दोनों कुचालक होते (ख) तो भोजन कभी पकता ही नहीं। विकल्प (घ) तो पूरी व्यवस्था उलट देता है — पात्र गरम ही नहीं होगा और हत्था हाथ जला देगा।
प्र2.
चित्र 7.15 में दर्शाया अनुसार मोम के साथ एक धातु-पट्टी पर पिनों को चिपकाया जाता है और एक जलती हुई मोमबत्ती पट्टी के नीचे रखी जाती है। निम्नलिखित में से क्या घटित होगा? (क) सभी पिन लगभग समान समय पर गिरेंगी। (ख) पिन 1 और 2, पिन 3 और 4 से पहले गिरेंगी। (ग) पिन 1 और 2, पिन 3 और 4 से बाद में गिरेंगी। (घ) पिन 2 और 3 लगभग समान समय पर गिरेंगी।
उत्तर

(घ) पिन 2 और 3 लगभग समान समय पर गिरेंगी।

चित्र 7.15 को ध्यान से देखिए। पिनें स्टैंड की ओर से बाहर की ओर 4, 3, 2, 1 के क्रम में हैं और मोमबत्ती पिन 2 और पिन 3 के ठीक बीच रखी है — क्रियाकलाप 7.1 की तरह पट्टी के सिरे पर नहीं।

लौ से पिन 2 की दूरी = लौ से पिन 3 की दूरी
⇒ ऊष्मा दोनों तक एक ही समय में पहुँचती है
⇒ दोनों के नीचे की मोम एक साथ पिघलती है
पिन 2 और 3 लगभग एक साथ गिरती हैं, उसके बाद पिन 1 और 4
ऐसा क्यों होता है: चालन में ऊष्मा गरम किए गए बिंदु से पट्टी में दोनों दिशाओं में फैलती है। कोई पिन कब गिरेगी, यह केवल लौ से उसकी दूरी तय करती है। समान दूरी वाली पिनें एक साथ गिरती हैं।
संकेत: यदि मोमबत्ती किसी एक सिरे पर होती तो विकल्प (ख) या (ग) आकर्षक लगते। उत्तर देने से पहले सदैव देखिए कि लौ कहाँ रखी है।
प्र3.
एक धूम्र-संसूचक यंत्र वह यंत्र है जो धुएँ का पता लगाता है और अलार्म बजा देता है। मान लीजिए आप अपने कमरे में एक धूम्र-संसूचक यंत्र लगा रहे हैं। इस यंत्र को लगाने का सबसे उपयुक्त स्थान होगा — (क) फर्श के पास (ख) दीवार के मध्य में (ग) छत पर (घ) कमरे में कहीं पर भी
उत्तर

(ग) छत पर।

ऐसा क्यों होता है: धुआँ गरम गैसों और सूक्ष्म ठोस कणों का मिश्रण है। आस-पास की वायु से अधिक गरम होने के कारण वह फैलता है, हल्का हो जाता है और संवहन द्वारा ऊपर उठ जाता है। अतः कमरे में धुआँ सबसे पहले छत के ठीक नीचे एकत्र होता है। वहाँ लगा संसूचक धुएँ को सबसे पहले पकड़ लेता है और तभी अलार्म बजा देता है जब बचाव का समय शेष होता है।
अन्य विकल्प क्यों नहीं: फर्श के पास (क) धुआँ तभी पहुँचेगा जब पूरा कमरा भर चुका होगा; दीवार के मध्य में (ख) भी देर हो जाएगी; और (घ) सत्य ही नहीं है — स्थान का बहुत महत्व है।
प्र4.
एक दुकानदार आपको एक गिलास में ठंडी लस्सी देता है। संयोगवश गिलास में एक छोटा सा रिसाव है। आपको दुकानदार एक और गिलास देता है ताकि आप रिसाव वाला गिलास उसमें रख लें। क्या यह व्यवस्था आपकी लस्सी को अधिक देर तक ठंडा रखने में सहायता कर सकती है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर

हाँ, सहायता करेगी। दोहरे गिलास वाली यह व्यवस्था लस्सी को अधिक देर तक ठंडा रखेगी।

ऐसा क्यों होता है: जब एक गिलास दूसरे गिलास के भीतर रखा जाता है तो दोनों के बीच वायु की एक पतली परत फँस जाती है। वायु ऊष्मा की कुचालक है। अब कमरे की गरम वायु की ऊष्मा को पहले बाहरी गिलास, फिर फँसी हुई वायु की परत और तब भीतरी गिलास पार करना पड़ेगा, तभी वह लस्सी तक पहुँचेगी। वायु की यह परत इस प्रवाह को बहुत धीमा कर देती है, अतः लस्सी एकल गिलास की तुलना में कहीं धीरे गरम होती है।
कमरे की गरम वायु → बाहरी गिलास → फँसी हुई वायु (कुचालक) → भीतरी गिलास → ठंडी लस्सी
⇒ ऊष्मा धीरे भीतर आती है ⇒ लस्सी अधिक देर ठंडी रहती है
क्या आप जानते हैं? थर्मस फ्लास्क इसी सिद्धांत पर, पर उससे भी बेहतर ढंग से कार्य करता है — उसकी दो दीवारों के बीच की वायु निकाल दी जाती है, अतः ऊष्मा का चालन करने वाले कण वहाँ बचते ही नहीं।
प्र5.
कारण सहित बताइए कि निम्नलिखित कथन सत्य हैं अथवा असत्य? (क) ठोस में ऊष्मा का स्थानांतरण संवहन द्वारा होता है। [ ] (ख) चालन में ऊष्मा का स्थानांतरण कणों की वास्तविक गति के द्वारा होता है। [ ] (ग) मृदा की सतह वाले क्षेत्रों से बालू की सतह वाले क्षेत्रों की तुलना में जल का रिसाव अधिक होता है। [ ] (घ) स्थल से समुद्र की ओर ठंडी हवा के गमन को स्थल समीर कहते हैं। [ ]
उत्तर
कथनसत्य / असत्यकारण
(क) ठोस में ऊष्मा का स्थानांतरण संवहन द्वारा होता है।असत्यठोस में ऊष्मा का स्थानांतरण मुख्यतः चालन द्वारा होता है। संवहन के लिए कणों का स्वयं एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाना आवश्यक है, जबकि ठोस के कण अपने स्थान पर स्थिर रहते हैं और केवल कंपन कर सकते हैं। अतः संवहन द्रवों और गैसों में होता है, ठोसों में नहीं।
(ख) चालन में ऊष्मा का स्थानांतरण कणों की वास्तविक गति के द्वारा होता है।असत्यकणों की वास्तविक गति द्वारा ऊष्मा का स्थानांतरण संवहन की परिभाषा है, चालन की नहीं। चालन में गरम कण अपनी ऊष्मा अपने संपर्क में आने वाले अगले कण को दे देता है, परंतु कण स्वयं अपनी स्थिति से नहीं हटते
(ग) मृदा की सतह वाले क्षेत्रों से बालू की सतह वाले क्षेत्रों की तुलना में जल का रिसाव अधिक होता है।असत्यस्थिति इसके विपरीत है। बालू के कणों के बीच के स्थान मृदा के अत्यंत महीन, सटे हुए कणों के बीच के स्थानों से अधिक चौड़े होते हैं, अतः जल का रिसाव बालू में अधिक और मृदा में सबसे कम होता है (क्रियाकलाप 7.5)।
(घ) स्थल से समुद्र की ओर ठंडी हवा के गमन को स्थल समीर कहते हैं।सत्यरात के समय स्थल जल की अपेक्षा शीघ्र ठंडा होता है। समुद्र के ऊपर की गरम वायु ऊपर उठती है और स्थल से ठंडी वायु समुद्र की ओर बहती है। स्थल से समुद्र की ओर ठंडी वायु के इसी गमन को स्थल समीर कहते हैं [चित्र 7.7 (ख)]।
संकेत: समीर को उसके आने की दिशा से याद रखिए — समुद्र समीर समुद्र से आती है (दिन में), स्थल समीर स्थल से आती है (रात में)।
ध्यान दीजिए: इसी अध्याय के अंग्रेज़ी संस्करण (Curiosity) में कथन (ii) ‘Heat transfer through convection takes place by the actual movement of particles’ है, जो सत्य है। हिंदी संस्करण में यहाँ ‘चालन’ छपा है, इसलिए हिंदी पुस्तक के अनुसार यह कथन असत्य है। परीक्षा में अपनी पुस्तक में छपे शब्द के अनुसार ही उत्तर लिखिए।
प्र6.
किसी पात्र में रखे बर्फ के टुकड़े कुछ समय पश्चात पिघलकर जल बन जाते हैं। इस रूपांतरण के लिए बर्फ के टुकड़ों को ऊष्मा कहाँ से प्राप्त होती है?
उत्तर

बर्फ के टुकड़ों को यह ऊष्मा अपने परिवेश से प्राप्त होती है — जिस पात्र में वे रखे हैं उससे, आस-पास की वायु से तथा नीचे की मेज या सतह से।

परिवेश (वायु, पात्र, मेज) बर्फ से अधिक गरम है
⇒ ऊष्मा गरम परिवेश से ठंडी बर्फ की ओर बहती है
⇒ बर्फ यह ऊष्मा अवशोषित करके पिघलकर जल बन जाती है
ऐसा क्यों होता है: ऊष्मा सदैव अधिक गरम वस्तु से कम गरम वस्तु की ओर बहती है। बर्फ कमरे से कहीं अधिक ठंडी है, अतः वह तब तक ऊष्मा लेती रहती है जब तक पिघल न जाए। यह ऊष्मा उस तक तीनों विधियों से एक साथ पहुँचती है — जिस पात्र को वह छू रही है उससे चालन द्वारा, आस-पास की वायु-धाराओं से संवहन द्वारा और निकट की गरम वस्तुओं से विकिरण द्वारा।
स्वयं जाँचिए: एक बर्फ का टुकड़ा स्टील के कटोरे में और दूसरा मोटे ऊनी कपड़े में रखिए। स्टील के कटोरे वाला टुकड़ा कहीं जल्दी पिघलता है, क्योंकि स्टील सुचालक है और उसे शीघ्रता से ऊष्मा पहुँचाता है।
प्र7.
एक अगरबत्ती को नीचे की दिशा में उलटा कर के लगाया गया है। इस अगरबत्ती से निकलने वाला धुआँ किस दिशा में जाएगा? एक चित्र बनाकर धुएँ की गति की दिशा को दर्शाइए।
उत्तर

धुआँ फिर भी ऊपर की ओर ही जाएगा — अगरबत्ती चाहे किसी भी दिशा में लगी हो।

आधार अगरबत्ती (नीचे की ओर) जलता सिरा धुआँ अगरबत्ती के चारों ओर घूमकर ऊपर की ओर उठता है फर्श
अगरबत्ती नीचे की ओर लगी है, फिर भी धुआँ उसके चारों ओर घूमकर सदैव ऊपर की ओर ही जाता है।
ऐसा क्यों होता है: धुआँ गरम गैसों और सूक्ष्म ठोस कणों का मिश्रण है। आस-पास की वायु से अधिक गरम होने के कारण वह फैलता है, हल्का हो जाता है और उसके चारों ओर नीचे आती ठंडी, भारी वायु उसे ऊपर धकेल देती है। यह संवहन है और यह केवल इस बात पर निर्भर करता है कि धुआँ गरम है — इस पर नहीं कि अगरबत्ती किस दिशा में लगी है। अतः धुआँ सिरे से निकलकर अगरबत्ती के चारों ओर घूमता है और ऊपर चढ़ जाता है।
स्वयं जाँचिए: शांत कमरे में जलती अगरबत्ती को आड़ी पकड़िए। धुआँ सिरे से एक-दो सेंटीमीटर के भीतर ही ऊपर मुड़ जाता है — हर बार।
प्र8.
चित्र 7.16 में दिखाए अनुसार जलयुक्त परखनलियों को एक मोमबत्ती द्वारा समान समय तक गरम किया जाता है [चित्र 7.16 (क)]। अथवा चित्र 7.16 (ख) में दिखाए गए दोनों तापमापियों में से कौन-सा अधिक तापमान मापेगा और क्यों?
उत्तर

चित्र 7.16 (क) वाला तापमापी अधिक तापमान मापेगा।

व्यवस्थामोमबत्ती कहाँ हैतापमापी का बल्ब कहाँ हैक्या होता है
चित्र 7.16 (क)परखनली की बंद तली के ठीक नीचेजल में, गरम किए जा रहे भाग के ऊपरगरम जल ऊपर उठकर बल्ब के पास से गुजरता है और ठंडा जल नीचे आकर गरम होता है — संवहन धारा पूरी परखनली का जल गरम कर देती है। अधिक पाठ्यांक।
चित्र 7.16 (ख)किनारे पर, जल की सतह के पास ऊपरी भाग मेंजल में, परखनली की तली के पासगरम जल हल्का होने के कारण ऊपर ही ठहरा रहता है। तली तक ऊष्मा नाममात्र पहुँचती है। कम पाठ्यांक।
ऐसा क्यों होता है: जल मुख्यतः संवहन द्वारा गरम होता है और संवहन धाराएँ ऊष्मा को केवल ऊपर की ओर ले जा सकती हैं। (क) में जल नीचे से गरम किया जा रहा है, अतः गरम जल पूरी परखनली में ऊपर उठता है और तापमापी के बल्ब के पास से गुजरता है — संपूर्ण जल गरम हो जाता है। (ख) में ऊष्मा ऊपरी भाग में दी जा रही है; गरम जल पहले से ही ऊपर है, अतः उसे ऊपर उठने की आवश्यकता ही नहीं और वह वहीं ठहरा रहता है। तली में रखे बल्ब तक ऊष्मा केवल जल के अत्यंत धीमे चालन से पहुँच सकती है, और जल ऊष्मा का कुचालक है।
क्या आप जानते हैं? इसीलिए केतली, प्रेशर कुकर और कड़ाही सदैव तली से गरम की जाती हैं। किनारे से गरम करने पर लगभग सारा ईंधन व्यर्थ चला जाएगा।
प्र9.
गरम जलवायु वाले क्षेत्रों में घरों की बाहरी दीवारों को खोखली ईंटों द्वारा क्यों बनाया जाता है?
उत्तर

क्योंकि खोखली ईंट के भीतर वायु फँसी रहती है, और वायु ऊष्मा की कुचालक है।

बाहर की गरम वायु → दीवार का बाहरी तल
खोखली ईंट में फँसी वायु (कुचालक)
→ दीवार का भीतरी तल
⇒ ऊष्मा नाममात्र भीतर पहुँचती है ⇒ कमरे ठंडे रहते हैं
ऐसा क्यों होता है: गैस के कण दूर-दूर होते हैं, अतः ऊष्मा एक कण से अगले कण तक सरलता से नहीं जा पाती। फँसी हुई वायु इसीलिए एक अवरोध का काम करती है और बाहर की गरमी को घर के भीतर आने से रोकती है। ठोस ईंट में ऐसी वायु-कोठरी नहीं होती, अतः वह ऊष्मा को कहीं अधिक सरलता से भीतर जाने देती है।
क्या आप जानते हैं? यही दीवार सर्दियों में उलटा काम करती है — वह घर के भीतर की ऊष्मा को बाहर नहीं जाने देती। इसीलिए खोखली ईंटें घरों को गर्मियों में ठंडा और सर्दियों में गरम रखती हैं। उत्तरकाशी के मोरी विकासखंड में यही विचार लकड़ी की दो परतों के बीच गोबर और मृदा भरकर काम में लाया जाता है।
प्र10.
जल के बड़े निकायों की उपस्थिति किस प्रकार आस-पास के क्षेत्रों में तापमान को अधिक बढ़ने से रोकती है। समझाइए।
उत्तर

चूँकि जल स्थल की तुलना में बहुत धीरे गरम और धीरे ठंडा होता है, इसलिए कोई बड़ी झील, समुद्र या महासागर आस-पास के क्षेत्र के तापमान को संतुलित रखने वाले विशाल गद्दे की भाँति कार्य करता है।

  • दिन में और ग्रीष्म ऋतु में: सूर्य की ऊष्मा स्थल और जल दोनों पर पड़ती है। स्थल शीघ्र ही बहुत गरम हो जाता है, परंतु जल का तापमान थोड़ा ही बढ़ता है — वह छोटी-सी वृद्धि के लिए भी बहुत अधिक ऊष्मा सोख लेता है। तब जल के ऊपर की ठंडी वायु समुद्र समीर के रूप में स्थल की ओर बहकर तट का तापमान घटा देती है।
  • रात में और शीत ऋतु में: स्थल अपनी ऊष्मा शीघ्र खोकर ठंडा हो जाता है। जल, जिसने बहुत ऊष्मा संचित कर रखी है, बहुत धीरे ठंडा होता है और अपने ऊपर की वायु को ऊष्मा देता रहता है। यह गरम वायु और उससे बनने वाली स्थल समीर तट को अत्यधिक ठंडा नहीं होने देती।
प्रमाण: क्रियाकलाप 7.4 इसे सीधे दिखा देता है — समान धूप में 20 मिनट में मृदा का तापमान जल की तुलना में कहीं अधिक बढ़ा, और ठंडा होते समय मृदा ने ही अपनी ऊष्मा पहले खोई।
क्या आप जानते हैं? पेमा और पालदेन के दादा जी का यही आशय था। केरल की समुद्र-तटीय रेखा लंबी है, अतः वहाँ सर्दियाँ उष्ण और आर्द्र रहती हैं, जबकि किसी बड़े जल-निकाय से दूर स्थित गंगटोक अत्यंत ठंडा हो जाता है। मई की दोपहर में मुंबई और नागपुर की तुलना कीजिए — एक ही राज्य, पर गरमी में बहुत अंतर।
प्र11.
व्याख्या कीजिए कि किस प्रकार जल पृथ्वी की सतह के नीचे की ओर रिसता है और भौम जल के रूप में संग्रहीत होता है।
उत्तर

पृथ्वी की सतह पर गिरने वाला वर्षा-जल कुछ भाग तालाबों, झीलों, नदियों और समुद्रों में चला जाता है और कुछ भाग भूमि में रिस जाता है। रिसाव इन चरणों में होता है —

  1. जल मृदा के कणों के बीच के रिक्त स्थानों तथा नीचे की चट्टानों की दरारों में प्रवेश करता है। मृदा और चट्टानों से सतही जल के रिसने की इस प्रक्रिया को अंतःस्यंदन कहते हैं।
  2. जहाँ ये स्थान अधिक चौड़े, खुले और परस्पर जुड़े हुए हों वहाँ जल अधिक आसानी से अंतःस्यंदित होता है (चित्र 7.11) — बजरी से सबसे तीव्र, बालू से धीमा, मृदा से सबसे धीमा।
  3. नीचे उतरता हुआ जल अंततः सतह से नीचे अवसादों के छिद्रों और चट्टानों की दरारों में रुक जाता है। इस प्रकार संग्रहीत जल भौम जल कहलाता है।
  4. अवसादों और चट्टानों की जो भूमिगत परतें अपने छिद्रों में जल भंडारित करती हैं, वे जलभृत कहलाती हैं (चित्र 7.12)।
भूमि पर गिरती वर्षा मृदा और चट्टान — जल नीचे की ओर बढ़ता है खुले, जुड़े हुए स्थानों से = अंतःस्यंदन जलभृत — छिद्रों में रुका हुआ जल = भौम जल, कुँओं और नलकूपों से प्राप्त
वर्षा → मृदा और चट्टानों में अंतःस्यंदन → जलभृत में भौम जल के रूप में संग्रहण।
क्या आप जानते हैं? यह भौम जल स्थान के अनुसार कुछ मीटर से लेकर सैकड़ों मीटर गहराई तक हो सकता है। कुँओं, हैंडपंपों और नलकूपों से हम यही जल ऊपर लाते हैं — और यह असीमित नहीं है। इसे पुनः भरने के लिए वर्षा जल संग्रहण और पुन:भरण गड्ढों का उपयोग किया जाता है।
प्र12.
जल-चक्र पृथ्वी पर जल के पुन:वितरण और पुन:भरण में सहायता करता है। इस कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तर

यह कथन पूर्णतः सत्य है, क्योंकि जल-चक्र जल को वहाँ से जहाँ वह प्रचुर है वहाँ पहुँचाता रहता है जहाँ उसकी आवश्यकता है, और जो जल उपयोग हो जाता है उसे पुनः भरता भी रहता है।

सूर्य समुद्रों, नदियों और झीलों को गरम करता है → जल वाष्पित होकर जलवाष्प बनता है
पेड़-पौधे वाष्पोत्सर्जन द्वारा और जलवाष्प जोड़ते हैं
जलवाष्प ऊपर उठकर ठंडी होती है और संघनित होकर बादल बनाती है
बादल स्थल के ऊपर जाकर वर्षा, हिम और ओले देते हैं (वर्षण)
जल तालाबों, झीलों, नदियों और समुद्रों में जाता है अथवा भूमि में रिस जाता है
⇒ चक्र पुनः आरंभ

पुन:वितरण — जलवाष्प अधिकतर महासागरों के ऊपर बनती है, परंतु बादल उसे हजारों किलोमीटर भीतर तक ले जाते हैं, जिससे पहाड़ों, मैदानों, वनों और खेतों पर वर्षा होती है। पर्वतों पर गिरी हिम ग्रीष्म में पिघलकर नदियों के रूप में बहती है और उन क्षेत्रों तक जल पहुँचाती है जहाँ स्वयं वर्षा बहुत कम होती है।

पुन:भरण — जिन नदियों, झीलों और कुँओं से हम जल लेते हैं, वे प्रतिवर्ष इसी चक्र से भर जाती हैं। भूमि में रिसा वर्षा-जल जलभृतों को पुनः भर देता है, जिससे भौम जल के स्रोत बने रहते हैं।

बड़ी बात: जल-चक्र पृथ्वी पर जल की कुल मात्रा को भी संरक्षित रखता है। एक बूँद भी न बनती है, न नष्ट होती है — वही जल प्रयोग होता है, लौटता है और फिर प्रयोग होता है। हम किसी विशेष स्थान पर जल खो सकते हैं, इसीलिए वर्षा जल संग्रहण और पुन:भरण गड्ढे इतने महत्वपूर्ण हैं।
संकेत: परीक्षा में चारों प्रक्रियाएँ — वाष्पन, वाष्पोत्सर्जन, संघनन और वर्षण — नाम लेकर लिखिए और फिर स्पष्ट कीजिए कि क्या पुनर्वितरित होता है और क्या पुनः भरता है।
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