कुतूहल अध्याय 7 अन्वेषणात्मक परियोजनाएँ

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
समाज — आस-पास के किसी ऐसे स्थान पर जाइए जहाँ आप जल-संचयन क्षेत्र अथवा पुन:भरण गड्ढा देख सकते हैं। स्थानीय लोगों से चर्चा कीजिए कि जल-संचयन क्षेत्र अथवा पुन:भरण गड्ढे किस प्रकार बनाए जाते हैं और वे किस प्रकार कार्य करते हैं? उचित चित्रण सहित एक विवरण तैयार कीजिए।
उत्तर

यह क्षेत्र-परियोजना है, अतः विवरण उसी पर आधारित होना चाहिए जो आप स्वयं देखें और सुनें। इसे करने की विधि और अच्छे विवरण की आवश्यक बातें नीचे दी गई हैं।

कैसे करें

  1. पास का कोई स्थल चुनिए — विद्यालय या भवन की छत का वर्षा जल संग्रहण तंत्र, कॉलोनी का पुन:भरण गड्ढा या सोख्ता गड्ढा, गाँव का तालाब या जोहड़, चेक डैम अथवा बावड़ी।
  2. शिक्षक या किसी बड़े के साथ जाइए। कॉपी, मापन-फीता और कैमरा या रेखाचित्र बनाने के लिए पेंसिल साथ रखिए।
  3. बनाने और देखभाल करने वाले लोगों से पूछिए — यह किसने और कब बनवाया? लागत कितनी आई? कितना जल एकत्र होता है? जल कहाँ जाता है? इसकी सफाई कौन और कितनी बार करता है? क्या बनने के बाद पास के कुएँ का जल-स्तर बढ़ा है?
  4. भागों का रेखाचित्र बनाइए या चित्र लीजिए — जल-ग्रहण क्षेत्र, नाली, उतरती नली, प्रथम-प्रवाह निकास, छन्ना, गड्ढा या टंकी।

अच्छे विवरण में क्या-क्या होना चाहिए

  • स्थल का नाम व स्थान तथा भ्रमण की तिथि।
  • ढाँचे का नामांकित चित्र।
  • निर्माण कैसे हुआ — सामग्री, गहराई, छन्ने की परतें।
  • यह कैसे कार्य करता है — छत या भूमि से गड्ढे तक जल का पूरा मार्ग।
  • लोगों द्वारा बताए गए लाभ और आने वाली कठिनाइयाँ।
  • अध्याय से जोड़ते हुए आपका अपना निष्कर्ष — अंतःस्यंदन, जलभृत, भौम जल का पुन:भरण।

नमूना उत्तर: “हम अपने विद्यालय के मैदान के कोने में बने पुन:भरण गड्ढे को देखने गए। यह लगभग 1.5 मीटर चौड़ा और 3 मीटर गहरा वर्गाकार गड्ढा है। विद्यालय की छत का वर्षा-जल एक नली से आकर पहले एक छोटी कोठरी में गिरता है जहाँ पत्तियाँ और धूल रुक जाती हैं, और फिर गड्ढे में जाता है। गड्ढे में परतें भरी हैं — सबसे नीचे बड़े पत्थर, उनके ऊपर बजरी और सबसे ऊपर मोटी बालू। देखभाल करने वाले ने बताया कि बालू की परत हर वर्षा-ऋतु से पहले साफ की जाती है। इन परतों से होकर जल अंतःस्यंदन द्वारा भूमि में रिसता है और नीचे के जलभृत तक पहुँचता है। चार वर्ष पहले यह गड्ढा बनने के बाद से विद्यालय का नलकूप मई में नहीं सूखा, जबकि पहले सूख जाता था। हमने समझा कि बजरी और मोटी बालू इसीलिए भरी जाती है क्योंकि चौड़े, खुले और परस्पर जुड़े स्थानों से जल सबसे तीव्र गति से रिसता है — ठीक वही जो हमने क्रियाकलाप 7.5 में देखा था।”

संकेत: पुन:भरण गड्ढे में बजरी और बालू भरी जाती है, मृदा कभी नहीं। क्रियाकलाप 7.5 के बाद आप इसका कारण भली-भाँति जानते हैं।
प्र2.
क्रियाकलाप — किसी धातु की छड़ के चारों ओर एक पतले कागज की पट्टी को कस कर लपेटिए। छड़ को लगातार घुमाते हुए जलती हुई मोमबत्ती द्वारा कागज को जलाने का प्रयत्न कीजिए। क्या कागज जलता है? अपने प्रेक्षणों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर

नहीं — कागज जलता नहीं (वह थोड़ा काला पड़ सकता है, परंतु आग नहीं पकड़ता), बशर्ते वह धातु की छड़ पर कसकर लिपटा हो और छड़ लगातार घुमाई जाती रहे।

ऐसा क्यों होता है: धातु की छड़ ऊष्मा की सुचालक है। कागज आग तभी पकड़ता है जब उसका अपना तापमान उसके ज्वलन-ताप तक पहुँच जाए। यहाँ लौ जैसे ही कागज को गरम करती है, वह ऊष्मा पतले कागज से होकर उससे सटी धातु में चली जाती है और धातु उसे चालन द्वारा छड़ में तेजी से दूर ले जाती है। इसलिए कागज कभी जलने योग्य गरम हो ही नहीं पाता। छड़ को घुमाते रहने से लौ के नीचे बार-बार ठंडी धातु आती रहती है और कोई एक स्थान अधिक गरम नहीं हो पाता।
लौ कागज को ऊष्मा देती है
कागज पतला है और धातु से कसकर सटा है
⇒ ऊष्मा तुरंत छड़ में चालित हो जाती है
⇒ कागज अपने ज्वलन-ताप से नीचे ही रहता है ⇒ वह जलता नहीं
स्वयं जाँचिए: यही प्रयोग लकड़ी या काँच की छड़ से कीजिए, अथवा कागज को ढीला लपेटिए ताकि कागज और धातु के बीच वायु की परत रह जाए। अब कागज जल जाएगा — क्योंकि लकड़ी, काँच और वायु कुचालक हैं और ऊष्मा को दूर नहीं ले जा सकते।
सावधानी: यह प्रयोग शिक्षक अथवा किसी वयस्क के निरीक्षण में ही कीजिए और छड़ को उसके दूसरे सिरे से पकड़िए।
प्र3.
क्रियाकलाप — कागज का एक टुकड़ा लीजिए। इस पर 7.17 में दर्शाए गए चित्र के अनुसार एक सर्पिल (स्पाइरल) बनाइए। सर्पिल के अनुसार कागज को काटिए। दर्शाए गए चित्र के अनुसार कागज को एक जलती हुई मोमबत्ती के ऊपर लटकाइए। ध्यान से देखिए कि क्या होता है। इसकी व्याख्या कीजिए।
उत्तर

अवलोकन: कागज का सर्पिल मोमबत्ती के ऊपर लगातार घूमने लगता है, और जब तक नीचे मोमबत्ती जलती रहती है तब तक घूमता रहता है। मोमबत्ती हटा लीजिए तो वह धीमा होकर रुक जाता है।

मोमबत्ती अपने ऊपर की वायु को गरम करती है
गरम वायु फैलती है → हल्की होती है → ऊपर उठती है
ठंडी, भारी वायु किनारों से आकर उसका स्थान लेती है
= ऊपर उठती वायु की एक सतत धारा, अर्थात संवहन धारा
उठती हुई वायु सर्पिल के तिरछे मोड़ों से टकराती है
⇒ सर्पिल घूमने लगता है
ऐसा क्यों होता है: सर्पिल इस प्रकार काटा जाता है कि उसका प्रत्येक मोड़ पंखे या पवनचक्की के ब्लेड की भाँति तिरछा हो जाता है। जब गरम वायु का ऊपर उठता स्तंभ इन तिरछी सतहों से टकराता है तो वह गुजरते-गुजरते उन्हें बगल की ओर धकेलता जाता है और कागज धागे पर घूमने लगता है। वस्तुतः यह सर्पिल संवहन से चलने वाली एक नन्ही टरबाइन ही है।
यह करके देखिए: इसी सर्पिल को गरम चाय के कप के ऊपर या रूम हीटर के ऊपर पकड़िए। वहाँ भी वह घूमता है — प्रमाण कि गरम वायु का कोई भी उठता स्रोत इसके लिए पर्याप्त है। कागज को लौ से पर्याप्त ऊँचाई पर रखिए ताकि वह जले नहीं।
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