प्र1.
भोजन बनाने के लिए सामान्यतः धातु के पात्रों का ही उपयोग क्यों किया जाता है?
उत्तर
क्योंकि धातुएँ ऊष्मा की सुचालक होती हैं। जो पदार्थ ऊष्मा को अपने में से सरलता से संचरित होने देते हैं, वे ऊष्मा के सुचालक कहलाते हैं और सभी धातुएँ इसी वर्ग में आती हैं — यह बात आपने ‘धातुओं और अधातुओं का संसार’ नामक अध्याय में पढ़ी थी।
ऐसा क्यों होता है: जब धातु का पात्र आग पर रखा जाता है तो लौ के संपर्क वाले धातु के कण पहले गरम होते हैं। प्रत्येक गरम कण अपनी ऊष्मा अपने से अगले कण को दे देता है और इस प्रकार ऊष्मा शीघ्रता से पात्र की तली से होकर भोजन तक पहुँच जाती है। इस प्रक्रिया को चालन कहते हैं। लकड़ी या मृदा के पात्र में ऊष्मा इतनी सरलता से नहीं पहुँच पाती, अतः उसमें थुक्पा पकाना संभव नहीं होता।
संकेत: ध्यान दीजिए कि अच्छे पात्र का हत्था लकड़ी, प्लास्टिक या बेकेलाइट का बना होता है — ये कुचालक हैं, अतः ऊष्मा हाथ तक नहीं पहुँचती।