प्र1.
गोलक को हल्के से पकड़िए और एक ओर थोड़ा-सा विस्थापित करके छोड़ दीजिए। ध्यान रखिए कि छोड़ते समय गोलक को झटका न लगे और डोरी सम्यक रूप से तनी रहे। क्या आपका लोलक अब दोलन कर रहा है?
उत्तर
हाँ। गोलक एक ओर से दूसरी ओर और फिर वापस — बार-बार उसी पथ पर आता-जाता है। यही दोलन-गति है, और यह आवर्ती है क्योंकि यह अपने पथ को एक निश्चित समयावधि के पश्चात दोहराती है।
इस चरण की दो सावधानियाँ ही तय करती हैं कि प्रयोग सफल होगा या नहीं:
- गोलक को झटका न दीजिए। झटके से उसे अतिरिक्त चाल मिल जाती है, दोलन चौड़ा और अनियमित हो जाता है और पाठ्यांक बिखर जाते हैं।
- डोरी तनी रहनी चाहिए। ढीली डोरी पर गोलक झूलने के बजाय झटके खाता है और लोलक की लंबाई बदलती रहती है।
दोलन सदा के लिए क्यों नहीं चलते: वायु का प्रतिरोध और आधार पर होने वाला घर्षण प्रत्येक दोलन में थोड़ी ऊर्जा ले लेते हैं, इसलिए गोलक हर बार कुछ कम ऊँचाई तक उठता है और अंततः रुक जाता है। ध्यान दीजिए कि दोलन छोटा होते जाने पर भी दोलनकाल लगभग नहीं बदलता — यही गुण लोलक को अच्छा समय-मापी बनाता है।