कुतूहल अध्याय 8 अन्वेषणात्मक परियोजनाएँ

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
एक प्लवमान पात्र प्रकार की जल-घड़ी बनाइए। विभिन्न आमाप के पात्र लेकर और उनमें विभिन्न आमाप के छिद्र बना कर प्रयोग कीजिए जिससे कि एक ऐसा पात्र मिल जाए जो लगभग 24 मिनट में डूब जाता हो।
उत्तर

क्या बनाना है: प्राचीन घटिका यंत्र की प्रतिकृति — तली में एक महीन छिद्र वाला कटोरा, जिसे बाल्टी के जल पर तैराया जाता है। जल धीरे-धीरे भीतर आता है, कटोरा भरता है और अंततः डूब जाता है। उसे निकालकर पुनः तैराया जाता है और प्रत्येक डूबना एक घटी दर्शाता है।

विधि

  1. जल से भरी एक बड़ी टब या बाल्टी और एक हल्का धातु या प्लास्टिक का कटोरा (कटोरी) लीजिए।
  2. पिन या पतली कील से तली के ठीक बीच में एक महीन छिद्र बनाइए।
  3. कटोरे को धीरे से जल पर तैराइए ताकि किनारे से जल भीतर न जाए। उसी क्षण घड़ी चालू कीजिए।
  4. कटोरा जिस समय डूबे, वह समय तालिका में अभिलेखित कीजिए।
  5. बड़े छिद्र, छोटे छिद्र तथा भिन्न आमाप के कटोरों के साथ इसे दोहराइए।
प्रयासकटोराछिद्र किससे बनायाडूबने में लगा समयआगे क्या करें
1छोटी कटोरीपतली कील (बड़ा छिद्र)2 मिनटबहुत शीघ्र डूबा — छोटा छिद्र बनाइए
2छोटी कटोरीड्राइंग-पिन9 मिनटअब भी शीघ्र — बड़ा कटोरा लीजिए
3बड़ा कटोराड्राइंग-पिन21 मिनटबहुत निकट — छिद्र थोड़ा और महीन कीजिए
4बड़ा कटोरासिलाई की सुई≈ 24 मिनटलक्ष्य प्राप्त — यही एक घटी है
डूबने का समय इस प्रकार क्यों बदलता है: बड़े कटोरे को डूबने के लिए अधिक जल चाहिए, अतः वह अधिक समय लेता है। बड़ा छिद्र जल को तेजी से भीतर आने देता है, अतः वह शीघ्र डूबता है। समय बढ़ाने के लिए कटोरा बड़ा कीजिए या छिद्र छोटा — और एक बार में इन दोनों में से केवल एक ही बदलिए, तभी पता चलेगा कि किस परिवर्तन का क्या प्रभाव पड़ा।
क्या आप जानते हैं? 24 मिनट ठीक एक दिन का 1/60 भाग है (24 घंटे = 1440 मिनट; 1440 ÷ 60 = 24)। इसीलिए प्राचीन भारतीय दिन में 60 घटियाँ होती थीं। प्रत्येक डूबने की घोषणा ढोल, शंख अथवा घंटा बजाकर की जाती थी।
प्र2.
अपने मित्रों की नाड़ी स्पंदन दर (वह संख्या जो यह बताती है कि एक मिनट में किसी व्यक्ति की नाड़ी कितनी बार धड़कती है) के मापन के लिए एक क्रियाकलाप कीजिए। एक ऐसे क्रियाकलाप का विचार कीजिए जिसमें समय मापन के लिए आप अपनी नाड़ी का उपयोग कर सकते हों और इस विचार को लेकर एक कहानी विकसित कीजिए।
उत्तर

भाग 1 — नाड़ी स्पंदन दर का मापन

  1. अपने दाहिने हाथ की पहली दो अँगुलियाँ (अंगूठा नहीं) मित्र की बाईं कलाई के भीतरी भाग पर, अंगूठे के आधार के नीचे रखिए और हल्का-सा दबाइए जब तक स्पंदन अनुभव न हो।
  2. घड़ी से 30 s तक स्पंदन गिनिए और 2 से गुणा कीजिए। तीन बार दोहराकर औसत लीजिए।
  3. प्रत्येक मित्र का पाठ्यांक पहले शांत बैठे हुए और फिर 20 बार रस्सी कूदने या थोड़ा दौड़ने के बाद अभिलेखित कीजिए।
नाम30 s में स्पंदन (विश्राम में)नाड़ी दर (प्रति मिनट)व्यायाम के बाद नाड़ी दर
नमूना: मीरा3978116
नमूना: अरुण3672124

भाग 2 — नाड़ी को घड़ी की तरह उपयोग करना। यदि आपकी नाड़ी दर 72 प्रति मिनट है तो एक स्पंदन ≈ 60 ÷ 72 = 0.83 s का होता है। जहाँ विराम-घड़ी उपलब्ध न हो वहाँ इससे समय मापिए: कागज का हवाई जहाज कितनी देर हवा में रहा, मित्र ने 50 m दौड़ने में कितने स्पंदन लिए, लोलक के 10 दोलनों में कितने स्पंदन हुए।

नमूना कहानी: 'कलाई में घड़ी लेकर घूमने वाला लड़का'। विद्यालय की खेल-प्रतियोगिता के दिन कबीर अपनी घड़ी घर भूल आता है। उसकी सहेली 100 m दौड़ने वाली है और समय मापने वाला कोई नहीं। कबीर को यह अध्याय याद आता है — वह दो अँगुलियाँ अपनी कलाई पर रखकर गिनता है और सीटी से समापन रेखा तक 10 स्पंदन गिनता है। घर आकर वह अपनी नाड़ी दर 72 प्रति मिनट मापता है, 10 × 0.83 = 8.3 s का परिकलन करता है और समझ जाता है कि सहेली ने विद्यालय का कीर्तिमान तोड़ दिया है। पर उसे यह भी पता चलता है कि गैलीलियो की विधि क्यों छोड़ दी गई — दौड़ के समय उत्साह में उसका अपना हृदय तेज धड़क रहा था, अर्थात उसकी 'घड़ी' तेज चल रही थी।

वैज्ञानिक दृष्टि से नाड़ी अच्छी घड़ी क्यों नहीं है: इसकी दर उत्साह, व्यायाम, बीमारी और आयु के साथ बदलती रहती है, अर्थात 'मात्रक' स्वयं बदलता रहता है। अच्छी घड़ी के लिए ऐसा आवर्ती प्रक्रम चाहिए जिसकी दर आस-पास की परिस्थितियों पर निर्भर न करे — यही लाभ लोलक को हृदय-स्पंदन पर प्राप्त है।
प्र3.
क्रियाकलाप 8.2 में लोलक की एक ही लंबाई के लिए दोलनकाल के पाठ्यांकों में मामूली अंतर के क्या कारण हो सकते हैं? इसको कम करने की विधियों पर विचार कीजिए और उनका उपयोग करते हुए क्रियाकलाप को दोहराइए और जाँचिए कि क्या पाठ्यांकों में भिन्नता कम होती है।
उत्तर
अंतर का संभावित कारणइसे नियंत्रित करने का उपाय
प्रतिक्रिया-अवधि — हाथ घड़ी थोड़ी देर से चलाता और रोकता है10 के स्थान पर 20 या 30 दोलनों का समय मापकर भाग दीजिए; घड़ी उस क्षण 'शून्य' पर चलाइए जब गोलक माध्य स्थिति से गुजरे, जहाँ वह सबसे तेज होता है और क्षण पहचानना सरल होता है
दोलनों की गिनती में भूलकेवल एक ही दिशा में माध्य स्थिति से गुजरना गिनिए; एक दूसरा विद्यार्थी बोलकर गिनती कराए
छोड़ते समय गोलक को झटका लगना, या दोलन बहुत चौड़ा होनागोलक पकड़िए, डोरी तनने दीजिए और बिना झटके के छोड़िए; दोलन छोटा रखिए
ढीली या खिंचने वाली डोरी, अथवा गाँठ का सरकना — लंबाई बदलती रहती हैपतली, मजबूत और न खिंचने वाली डोरी लीजिए; उसे दृढ़ता से कसिए; लंबाई हर बार गोलक के केंद्र तक मापिए
हिलता हुआ आधार, या गोलक का एक तल में न होकर वृत्त में घूमनाआधार को भारी मेज या दृढ़ स्टैंड से बाँधिए; गोलक को केवल एक ही तल में छोड़िए
पंखे या खिड़की से आती वायुपाठ्यांक लेते समय पंखा बंद कर दीजिए और खिड़की बंद रखिए
घड़ी का अल्पतमांक (दीवार घड़ी केवल 1 s तक पढ़ती है)0.01 s तक पढ़ने वाली विराम-घड़ी या मोबाइल की स्टॉपवॉच का उपयोग कीजिए

दोहराइए और तुलना कीजिए। पहले पुरानी विधि से पाँच पाठ्यांक लीजिए और फिर उपर्युक्त नियंत्रणों के साथ पाँच, और दोनों को साथ रखिए:

पहले: 10 दोलनों के लिए 19.6, 20.4, 19.8, 20.5, 20.1 s → दोलनकाल 1.96 से 2.05 s, विस्तार = 0.09 s
बाद में (30 दोलन, विराम-घड़ी, पंखा बंद): 60.1, 60.0, 60.2, 60.1, 59.9 s → दोलनकाल 2.003 से 2.007 s, विस्तार = 0.004 s
भिन्नता क्यों घट जाती है: घड़ी चलाने-रोकने की लगभग 0.2 s की नियत त्रुटि अब 10 के बजाय 30 दोलनों में बँटती है, अतः एक दोलन पर उसका प्रभाव तीन गुना कम हो जाता है। वायु और हिलते आधार को हटा देने से वे कारण ही समाप्त हो जाते हैं जिनसे लोलक स्वयं हर बार भिन्न व्यवहार करता था।
प्र4.
एक खेल के मैदान में जाइए जहाँ कुछ झूले लगे हों। किसी झूले के 10 दोलनों में लगा समय मापिए और इसके दोलनकाल का परिकलन कीजिए। इस क्रियाकलाप को अलग-अलग भार के बच्चे को झूले में बैठाकर दोहराइए और देखिए कि क्या दोलनकाल का माप प्रत्येक बार लगभग समान होता है? अलग-अलग लंबाई के झूलों के साथ प्रयोग दोहराइए और पता लगाइए कि झूले की लंबाई में वृद्धि से उसका दोलनकाल किस प्रकार परिवर्तित होता है? क्या झूला भी लोलक का एक उदाहरण है?
उत्तर

हाँ — झूला एक बड़ा लोलक ही है। जंजीरें धागे का काम करती हैं, बैठा हुआ बच्चा गोलक है और ऊपर लगा ढाँचा दृढ़ आधार।

क्या कीजिए: झूले को एक बार हल्का-सा धक्का दीजिए, गति स्थिर होने दीजिए, फिर 10 दोलनों (प्रत्येक दोलन = जाकर उसी ओर वापस आना) का समय मापकर 10 से भाग दीजिए।

झूलाझूले पर बच्चा10 दोलनों में लगा समयदोलनकाल
लंबा झूला (लगभग 2.5 m)हल्का बच्चा31.6 s3.16 s
लंबा झूला (लगभग 2.5 m)भारी बच्चा31.7 s3.17 s
लंबा झूला (लगभग 2.5 m)दो बच्चे साथ31.5 s3.15 s
मध्यम झूला (लगभग 1.6 m)हल्का बच्चा25.4 s2.54 s
छोटा झूला (लगभग 1.0 m)हल्का बच्चा20.0 s2.00 s

निष्कर्ष

  • एक ही झूले पर अलग-अलग भार के बच्चे बैठें तो दोलनकाल लगभग समान ही रहता है — ठीक वैसे ही जैसे क्रियाकलाप 8.2 में गोलक के द्रव्यमान से कोई अंतर नहीं पड़ा था।
  • अलग-अलग लंबाई के झूलों में दोलनकाल स्पष्ट रूप से बदलता है: झूला जितना लंबा, दोलनकाल उतना अधिक। ऊँचा झूला धीमे झूलता है, छोटा झूला शीघ्र।
झूला पूर्ण लोलक क्यों नहीं है: इसका 'गोलक' कोई छोटी भारी गेंद नहीं बल्कि एक बच्चा है, और बच्चे के आगे-पीछे झुकने से उसका केंद्र खिसकता रहता है — बच्चे इसी से झूले को स्वयं ऊँचा करते हैं। स्वच्छ पाठ्यांकों के लिए झूलने वाले से स्थिर बैठने को कहिए।
सुरक्षा सुझाव: झूलती सीट से दूर खड़े रहिए और समय सदैव बगल से मापिए, सामने से कभी नहीं।
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