कुतूहल अध्याय 8 पाठ्य प्रश्न

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
जब घड़ियाँ नहीं होती थीं तो लोग समय का मापन किस प्रकार करते थे?
उत्तर

ऐसी घटनाओं का अवलोकन करके जो एक निश्चित समयावधि के पश्चात पुनरावृत्त होती हैं। मनुष्य ने सूर्य के उदय एवं अस्त होने, चंद्रमा की कलाओं तथा बदलती ऋतुओं का उपयोग समय-निर्धारण के लिए किया। सबसे पहले पंचांग (कैलेंडर) बनाए गए, जिनमें सूर्य के उदय-अस्त के एक चक्र से एक दिन परिभाषित हुआ। इसके बाद दिन के भीतर के लघु समयांतराल मापने के यंत्र बनाए गए।

यंत्रइसमें क्या दोहराता या प्रवाहित होता थासमय कैसे पढ़ा जाता था
धूप-घड़ी (चित्र 8.1)सूर्य का प्रतिदिन आकाश में भ्रमणसूर्य के प्रकाश द्वारा बनी किसी वस्तु की परछाई की परिवर्तनीय स्थिति से
जल-निष्क्रमण प्रकार की जल-घड़ी [चित्र 8.2 (क)]अंकित पात्र से बाहर प्रवाहित होता जलघटते जल-स्तर की तुलना पात्र पर बने समय-अंकनों से करके
प्लवमान पात्र प्रकार की जल-घड़ी [चित्र 8.2 (ख)]तली के छिद्र से कटोरे में भरता जलकटोरा एक निश्चित समय में भरकर डूब जाता था; उसे निकालकर पुनः तैराया जाता था
रेत-घड़ी (चित्र 8.3)एक बल्ब से दूसरे बल्ब में गिरती रेतकितनी रेत नीचे आ चुकी है, इससे
मोमबत्ती-घड़ी (चित्र 8.4)एक समान गति से जलती मोमबत्तीमोमबत्ती पर किए गए अंशांकन से, जहाँ तक लौ पहुँच चुकी होती थी
ऐसा क्यों: इन सभी यंत्रों को — और उसके बाद बनी प्रत्येक घड़ी को — एक ही चीज़ चाहिए: कोई ऐसा प्रक्रम जो दोहराता हो अथवा एक समान दर से चलता हो। तभी समय को समान भागों में बाँटकर गिना जा सकता है।
क्या आप जानते हैं? प्राचीन भारत में प्लवमान पात्र प्रकार की जल-घड़ी घटिका यंत्र कहलाती थी। इसका छिद्र ऐसा बनाया जाता था कि पात्र को भरने और डूबने में ठीक 24 मिनट लगें। 24 घंटे = 1440 मिनट और 1440 ÷ 24 = 60, अतः दिन 60 समान घटियों में बँटा था। प्रत्येक बार पात्र डूबने पर ढोल, शंख अथवा घंटा बजाकर इसकी घोषणा की जाती थी।
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