कुतूहल अध्याय 9 पाठ्य प्रश्न

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
परखनली 'क' में रंग परिवर्तित होने का क्या कारण है?
उत्तर

इसका कारण उबले चावल में उपस्थित मंड है। कक्षा 6 में हमने सीखा था कि आयोडीन मंड के साथ अभिक्रिया करके नीला-काला रंग देता है। परखनली 'क' के चावल कभी चबाए नहीं गए, अतः उन पर लार की कोई क्रिया नहीं हुई और उनका मंड ज्यों-का-त्यों बना रहा। आयोडीन उसी मंड के साथ क्रिया करके नीला-काला हो जाता है।

परखनली 'क': उबले चावल (मंड उपस्थित) + आयोडीन → नीला-काला
परखनली 'ख': चबाए चावल (मंड शर्करा में विघटित) + आयोडीन → कोई परिवर्तन नहीं / बहुत हल्का रंग
ऐसा क्यों होता है: लार केवल उसी भोजन पर क्रिया करती है जिसमें वह मिली हो। परखनली 'क' नियंत्रण (कंट्रोल) है — यह दिखाती है कि जब लार की क्रिया हो तो चावल कैसा रहता है। 'क' और 'ख' की तुलना ही यह सिद्ध करती है कि मंड का पाचन लार ने किया।
प्र2.
यदि परखनली 'ख' में अभी भी रंग दिखाई देता है तो इसमें आगे और अन्वेषण करने के लिए आप क्रियाकलाप में क्या परिवर्तन करेंगे? क्या चबाने का समय बढ़ाने से उसके रंग में परिवर्तन होगा?
उत्तर

यदि परखनली 'ख' में अब भी नीला-काला रंग दिखे तो इसका अर्थ है कि कुछ मंड बिना पचा रह गया है। एक बार में केवल एक बात बदलिए और क्रियाकलाप दोहराइए —

  • अधिक देर तक चबाइए — 30–60 सेकंड के स्थान पर 90 सेकंड या 2 मिनट, ताकि लार को अधिक समय मिले।
  • अधिक अच्छी तरह चबाइए, जिससे चावल महीन टुकड़ों में टूटे और उसका अधिक भाग लार के संपर्क में आए।
  • चावल की मात्रा कम लीजिए, ताकि उपलब्ध लार उसके लिए पर्याप्त हो।
  • मिश्रण को कुछ मिनट रखा रहने दीजिए और तब आयोडीन डालिए, जिससे पहले से मिली लार को और समय मिल जाए।
  • आयोडीन की गिनी हुई कम बूँदें — दोनों परखनलियों में समान संख्या में — डालिए, जिससे तुलना निष्पक्ष रहे।

हाँ, चबाने का समय बढ़ाने से रंग में निश्चित परिवर्तन होता है। जितनी देर चबाएँगे, उतना अधिक मंड शर्करा में बदलेगा, अतः नीला-काला रंग उत्तरोत्तर हल्का पड़ता जाएगा और अंत में बिलकुल नहीं आएगा।

स्वयं जाँचिए: चार परखनलियाँ लीजिए जिनमें क्रमशः 15, 30, 60 और 120 सेकंड चबाए चावल हों। आयोडीन डालकर उन्हें पंक्ति में रखिए — गहरे से लगभग रंगहीन तक की स्पष्ट श्रेणी दिखाई देगी।
प्र3.
परंतु भोजन नीचे की ओर कैसे जाता है?
उत्तर

भोजन अपने भार से नीचे नहीं गिरता — उसे धकेला जाता है। भोजन नली की भित्तियाँ धीरे-धीरे लहरदार गति से संकुचित और शिथिल होती हैं और यह चलती हुई तरंग भोजन को आमाशय की ओर आगे ठेल देती है।

संकुचन स्थल शिथिलन स्थल भोजन आमाशय की ओर
पुस्तक का चित्र 9.2 — भित्ति भोजन के पीछे सिकुड़ती और आगे शिथिल होती है, जिससे भोजन आमाशय की ओर धकेला जाता है।
ऐसा क्यों होता है: भोजन नली की भित्ति में पेशियाँ होती हैं। जब भोजन के पीछे की पेशी सिकुड़ती है और आगे की पेशी ढीली पड़ती है तो भोजन के पास आगे बढ़ने के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं रहता। यही लहरदार गति संपूर्ण आहार नाल में होती है — इसीलिए लेटे रहने पर भी भोजन आगे बढ़ता रहता है और अंतरिक्ष यात्री भारहीनता में भी निगल सकते हैं।
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