कुतूहल अध्याय 9 विज्ञान एवं समाज

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
उन युक्तियों का पता लगाइए जिनसे हमारे बुजुर्ग मुख की स्वच्छता को बनाए रखते थे।
उत्तर

अपने दादा-दादी, नाना-नानी तथा पड़ोस के बुजुर्गों से पूछिए और लिखिए कि टूथपेस्ट-ब्रश के प्रचलन से पहले वे क्या प्रयोग करते थे। भारत के लगभग हर क्षेत्र की अपनी विधि रही है।

परंपरागत युक्तिक्या प्रयोग होता थायह क्यों प्रभावी थी
दातुननीम, बबूल (कीकर), बरगद या आम की ताजी टहनी, जिसका एक सिरा चबाकर ब्रश जैसा बना लिया जाता थारेशे ब्रश के बालों की तरह दाँत साफ करते हैं; नीम-बबूल का कड़वा रस कीटाणुओं को रोकता है
मंजनकोयले का चूर्ण, जली भूसी, नमक अथवा सरसों के तेल में मिला नमक — अँगुली से मलनाहल्का खुरदरा होने से दाँतों की परत हट जाती है; नमक मसूड़ों को दृढ़ रखता है
जीभ की सफाईताँबे या पीतल की जिह्वा-निर्लेखनी (जिभ्भी)जीभ पर जमी परत ही मुख की दुर्गंध का मुख्य कारण होती है
कुल्लाभोजन के बाद सादे अथवा गुनगुने नमक-जल से कुल्लादाँतों के बीच फँसे भोजन-कण सड़ने से पहले ही धुल जाते हैं
गंडूष / कवल (तेल कुल्ला)तिल या नारियल के तेल को मुँह में घुमानाप्राचीन आयुर्वेदिक अभ्यास, जो मसूड़ों और मुख को स्वच्छ रखने के लिए किया जाता था
भोजन के बाद चबानासौंफ, लौंग, इलायचीसाँस ताजा करती है और लार का स्राव बढ़ाती है

नमूना उत्तर: "मेरे दादाजी बताते हैं कि लगभग बीस वर्ष की आयु तक उन्होंने कभी टूथब्रश का प्रयोग नहीं किया। प्रतिदिन प्रातः वे नीम की एक ताजी टहनी तोड़ते, उसका एक सिरा चबाकर मुलायम ब्रश जैसा बनाते और कई मिनट तक दाँत साफ करते थे। ताँबे की जिभ्भी से जीभ साफ करते और हर भोजन के बाद कुल्ला करते थे। सत्तर वर्ष की आयु में भी उनके अधिकांश दाँत सुरक्षित हैं।"

संकेत: पुरानी और नई — दोनों विधियाँ तीन बातों पर सहमत हैं: दिन में दो बार दाँत साफ करना, जीभ साफ करना और हर भोजन के बाद कुल्ला करना।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ