गणित प्रकाश अध्याय 3 आइए, पता लगाएँ

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
प्रशांत महासागर के एक द्वीप में रहने वाले मूल निवासियों का एक समूह भिन्न-भिन्न वस्तुओं को गिनने के लिए संख्या नामों के विभिन्न अनुक्रम का प्रयोग करते हैं। वे ऐसा क्यों करते हैं? सोचकर बताइए।
उत्तर

क्योंकि ऐसी भाषाओं में संख्या-शब्द अभी भी गिनी जा रही वस्तु से जुड़ा हुआ है — गिनती को वस्तु से अलग नहीं किया गया है।

  • नाम में अतिरिक्त सूचना होती है। नारियल के लिए एक अनुक्रम, नाव के लिए दूसरा, मछली के लिए तीसरा — शब्द सुनने वाले को कितने और किसके दोनों बता देता है, अत: कुछ दोहराना नहीं पड़ता।
  • भिन्न वस्तुएँ भिन्न प्राकृतिक समूहों में रखी जाती हैं। मछलियाँ जोड़े में, नारियल गुच्छों में, अनाज टोकरी में। जो अनुक्रम वस्तु के रखे और बेचे जाने के ढंग से बना हो, वही उस वस्तु के लिए सबसे सुविधाजनक है।
  • मान और अनुष्ठान। व्यक्तियों के लिए अथवा अनुष्ठान की वस्तुओं के लिए प्राय: अलग अनुक्रम रखा जाता था, जिससे वे साधारण व्यापार की वस्तुओं से भिन्न दिखें।
ऐसा क्यों होता है: गणित की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ऐसी पद्धति क्या नहीं कर सकती। यदि मछलियों का “तीन” और नारियलों का “तीन” अलग-अलग शब्द हैं तो 3 मछली + 3 नारियल भाषा के भीतर जोड़े ही नहीं जा सकते — पद्धति में अकेले “तीन” की कोई अवधारणा ही नहीं है। यह समझना कि तीन मछलियों का तीनपन और तीन नारियलों का तीनपन एक ही वस्तु है, वही कदम है जिससे अंकगणित संभव होता है। हमारी भाषा में भी पुरानी आदत के चिह्न बचे हैं — जूतों का जोड़ा, अंडों का दर्जन
प्र2.
2 के बार-बार प्रयोग से गिनती करने की इसी विधि से गुमुलगल संख्या पद्धति की 6 से आगे की संख्याओं पर विचार कीजिए। इस पद्धति में आने वाली संख्याओं के लिए हिंदू संख्यांकों का प्रयोग किए बिना विभिन्न अंकगणितीय संक्रियाएँ (+, –, ×, ÷) करने की विधियों का पता लगाइए। इसका उपयोग निम्नलिखित का मूल्यांकन करने के लिए कीजिए। (i) (उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन) + (उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन) (ii) (उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन) – (उकासर-उकासर-उकासर) (iii) (उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन) × (उकासर-उकासर) (iv) (उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर) ÷ (उकासर-उकासर)
उत्तर

इस पद्धति में उरापोन = 1 और उकासर = 2 हैं, तथा प्रत्येक संख्या एक श्रृंखला है: जितने 2 हैं उतने उकासर, और यदि संख्या विषम हो तो अंत में एक उरापोन। 6 से आगे बढ़ने के लिए कोई नया शब्द नहीं चाहिए — केवल लंबी श्रृंखलाएँ।

चारों नियम, इसी पद्धति के भीतर:

  • जोड़: दोनों श्रृंखलाएँ एक के बाद एक लिख दीजिए; यदि अब दो उरापोन आ जाएँ तो उन्हें एक उकासर से बदल दीजिए। (किसी श्रृंखला में एक से अधिक उरापोन की आवश्यकता कभी नहीं पड़ती।)
  • घटाव: उकासर को उकासर से और उरापोन को उरापोन से काटिए। यदि बड़ी संख्या में काटने योग्य उरापोन न हो तो पहले उसके एक उकासर को दो उरापोन में तोड़ लीजिए।
  • गुणन: दूसरी संख्या जितनी बार कहती है, पहली संख्या को उतनी बार लिख दीजिए और फिर उरापोन को व्यवस्थित कर लीजिए।
  • भाग: श्रृंखला को भाजक के बराबर बंडलों में बाँटिए; बंडलों की संख्या ही उत्तर है।
भाग2 और 1 मेंहलउत्तर
(i)(2+2+2+2+1) + (2+2+2+1)
= 9 + 7
7 उकासर और 2 उरापोन; दो उरापोन मिलकर एक और उकासर → 8 उकासरउकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर  (16)
(ii)(2+2+2+2+1) − (2+2+2)
= 9 − 6
तीन उकासर कटे; एक उकासर और एक उरापोन शेषउकासर-उरापोन  (3)
(iii)(2+2+2+2+1) × (2+2)
= 9 × 4
9 वाली श्रृंखला चार बार: 16 उकासर और 4 उरापोन; चार उरापोन से 2 और उकासर → 18 उकासरउकासर 18 बार  (36)
(iv)(8 उकासर) ÷ (2 उकासर)
= 16 ÷ 4
8 उकासर को 2-2 उकासर के बंडलों में बाँटिए: 4 बंडलउकासर-उकासर  (4)
ऐसा क्यों होता है: यहाँ प्रत्येक नियम मिलान पद्धति का ही नियम है, बस एक अतिरिक्त विनिमय के साथ — “दो उरापोन मिलकर एक उकासर”। यह एक विनिमय संख्यांक की लंबाई आधी कर देता है, जो वास्तविक लाभ है, परंतु इसके आगे कोई विनिमय उपलब्ध नहीं: 100 के लिए आज भी पचास उकासर चाहिए। एक ही समूह आकार में गिनना मिलान प्रतीकों से ठीक एक कदम आगे ले जाता है, उससे अधिक नहीं।
प्र3.
हिंदू संख्या पद्धति की उन विशेषताओं की पहचान कीजिए जो इसे रोमन संख्या पद्धति की तुलना में अधिक प्रभावी बनाती हैं।
उत्तर

पाँच विशेषताएँ, और इनमें से प्रत्येक रोमन पद्धति की एक निश्चित कमी दूर करती है।

विशेषताहिंदू संख्या पद्धतिरोमन संख्या पद्धति
प्रतीक का मानस्थानीय मान — 375 का 3 अर्थात 3 × 102, 32 का 3 अर्थात 3 × 10निश्चित मान — X कहीं भी हो, 10 ही है
शून्यता का प्रतीक0, जो अंक भी है और संख्या भीशून्य के लिए कोई प्रतीक ही नहीं
प्रतीकों की संख्यादस प्रतीक कितनी भी बड़ी संख्या लिख देते हैंप्रत्येक नई सांकेतिक संख्या के लिए नया प्रतीक: I V X L C D M …
सांकेतिक संख्याएँसभी 10 की घातें, अत: सांकेतिक × सांकेतिक पुन: सांकेतिकअनुपात ×5, ×2, ×5, ×2 — कोई पैटर्न नहीं, अत: गुणन का कोई नियम नहीं
संख्यांक की लंबाईबहुत धीरे बढ़ती है — 1888 के लिए 4 अंकतेजी से बढ़ती है — 1888 = MDCCCLXXXVIII, 13 प्रतीक
ऐसा क्यों होता है: इनमें सबसे गहरी बात है स्थानीय मान का 0 के साथ मिलना। चूँकि प्रत्येक स्थान स्वयं बता देता है कि वह 10 की कौन-सी घात गिन रहा है, इसलिए 108 या 1015 के लिए कोई नया प्रतीक गढ़ना नहीं पड़ता; और चूँकि 0 रिक्त स्थान को भर सकता है, इसलिए 305 को 35 नहीं पढ़ा जा सकता। शेष सब कुछ — छोटे संख्यांक, स्तंभ में जोड़, लंबा गुणा और भाग — इन्हीं दो अवधारणाओं से निकलता है।
स्वयं जाँचिए: 1888 और 1976 को पहले रोमन संख्यांकों में जोड़िए, फिर हिंदू संख्यांकों में। दूसरे में कुछ सेकंड लगेंगे; पहले में अनेक विनिमय और बहुत सावधानी।
प्र4.
इस अनुभाग में चर्चा की गई अवधारणाओं का प्रयोग करते हुए पूर्व में बनी संख्या पद्धति को परिष्कृत करने का प्रयास कीजिए।
उत्तर

पृष्ठ 54 वाली पद्धति (● = 1, ■ = 10, ★ = 100) लीजिए और उसे अब तक बताए गए दो परिष्कारों से गुजारिए।

परिष्कार 1 — सांकेतिक संख्याओं को किसी एक संख्या की घातें बनाइए। हमारी पहले से ही हैं: 1, 10, 100। अत: असंबद्ध छलाँगों के स्थान पर उसी क्रम में आगे बढ़िए — अगली सांकेतिक संख्याएँ 1000, 10000, 100000 होनी चाहिए।

परिष्कार 2 — अध्याय की दोनों कसौटियों पर जाँचिए।

कसौटीपहलेपरिष्कार के बाद
क्या अनुक्रम अंतहीन है?नहीं — 1000 से पहले रुक जाता हैहाँ, जब 10 की प्रत्येक घात का अपना प्रतीक हो
क्या पुन: समूहन सरल है?हाँ — दस ● मिलकर एक ■हाँ, और अब वही नियम प्रत्येक स्तर पर
क्या सांकेतिक × सांकेतिक = सांकेतिक?हाँ — ■ × ■ = ★हाँ, अत: गुणन का नियम बन जाता है
क्या कोई प्रतीक 10 बार आता है?नहीं — किसी भी प्रतीक के दस मिलकर अगला बन जाते हैंनहीं — अत: प्रत्येक अधिकतम 9 बार

एक समस्या फिर भी बची रहती है: नए प्रतीकों की अंतहीन आवश्यकता। यही पृष्ठ 69 वाली मिस्र की कमी है और इसका उपाय पृष्ठ 73 पर है — सांकेतिक संख्या का प्रतीक बनाना छोड़ दीजिए और स्थान को बताने दीजिए कि कौन-सी सांकेतिक संख्या है। चूँकि कोई प्रतीक 9 बार से अधिक नहीं आता, इसलिए नौ चिह्न और “कुछ नहीं” का एक चिह्न — कुल दस प्रतीक — पर्याप्त हैं। पूरी तरह परिष्कृत होकर आपकी पद्धति हिंदू संख्या पद्धति बन जाती है।

ऐसा क्यों होता है: यह पूरे अध्याय का तर्क संक्षेप में है। समूहन संख्यांक छोटे करता है; आधार पुन: समूहन और गुणन को यांत्रिक बनाता है; स्थानीय मान अंतहीन प्रतीकों की आवश्यकता समाप्त करता है; और 0 वह है जिसके बिना स्थानीय मान स्पष्ट नहीं रह सकता।
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