गणित प्रकाश अध्याय 3 आइए, पता लगाएँ

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
आपके विचार से चीन के लोग जोंग और हेंग प्रतीकों को एकांतर रूप से क्यों प्रयोग करते थे? यदि मात्र जोंग प्रतीकों का ही प्रयोग किया जाता तो 41 को कैसे प्रदर्शित किया जाता? यदि दो क्रमिक स्थानों के मध्य कोई सार्थक अंतराल न हो तो क्या इस संख्यांक की किसी अन्य प्रकार से व्याख्या की जा सकती थी?
उत्तर

एकांतर क्यों: क्योंकि छड़ संख्यांक वास्तव में गणना-पट्ट पर रखी हुई छड़ें थीं और दो स्थानों के बीच का रिक्त अंतराल दिखाई नहीं देता। प्रत्येक स्थान पर छड़ों को समकोण घुमा देने से स्थानों की सीमा स्वयं दिखने लगती है।

  • जोंग (खड़ी छड़ें) — इकाई, सैकड़ा, दस हजार …
  • हेंग (लेटी छड़ें) — दहाई, हजार, सौ हजार …

अत: पृष्ठ 77 के संख्यांक 2634 में आप 2 (हेंग), 6 (जोंग), 3 (हेंग), 4 (जोंग) पढ़ते हैं और कहीं भी यह संदेह नहीं होता कि एक स्थान कहाँ समाप्त होकर अगला कहाँ आरंभ हुआ।

केवल जोंग से 41: 41 = 4 दहाई और 1 इकाई, अत: जोंग-4 के बाद जोंग-1 रखा जाएगा:

| | | |   |   — एक पंक्ति में पाँच खड़ी छड़ें

हाँ, अंतराल स्पष्ट न हो तो इसे अनेक अन्य प्रकार से पढ़ा जा सकता है। पाँच छड़ें इस प्रकार बाँटी जा सकती हैं:

छड़ें कैसे बँटी हैंपढ़ा जाएगा
| | | | |  (कोई विभाजन नहीं)5
|   | | | |14
| |   | | |23
| | |   | |32
| | | |   |41
|   | |   | |122
|   |   | | |113
| |   |   | |212
| | |   |   |311
ऐसा क्यों होता है: दिशा बदलना चतुर उपाय है, परंतु आधा ही। यह बता देता है कि स्थान कहाँ आरंभ होते हैं, फिर भी यह नहीं कह पाता कि कोई स्थान रिक्त है, अत: अनुपस्थित स्थान के लिए रिक्ति छोड़नी पड़ती थी और रिक्तियाँ गिनना कठिन है। जैसा पुस्तक कहती है, शून्य के लिए एक प्रतीक होने पर छड़ संख्यांक एक पूर्णत: विकसित स्थानीय मान पद्धति बन जाते। भारतीय पद्धति ने ठीक यही कदम उठाया।
प्र2.
उकासर और उरापोन को अंकों के रूप में लेकर एक आधार-2 वाली स्थानीय मान पद्धति बनाइए। इस पद्धति की तुलना गुमुलगल पद्धति से कीजिए।
उत्तर

आधार-2 पद्धति में ठीक दो अंक चाहिए और उनमें से एक को शून्य दर्शाना ही होगा। मान लीजिए

उरापोन = 0     उकासर = 1
सांकेतिक संख्याएँ: 1, 2, 4, 8, 16, 32, …
संख्या2 की घातों में समूहनआधार-2 स्थानीय मान पद्धतिगुमुलगल पद्धति
11उकासरउरापोन
22उकासर उरापोनउकासर
32 + 1उकासर उकासरउकासर-उरापोन
44उकासर उरापोन उरापोनउकासर-उकासर
54 + 1उकासर उरापोन उकासरउकासर-उकासर-उरापोन
64 + 2उकासर उकासर उरापोनउकासर-उकासर-उकासर
74 + 2 + 1उकासर उकासर उकासरउकासर-उकासर-उकासर-उरापोन
88उकासर उरापोन उरापोन उरापोनउकासर-उकासर-उकासर-उकासर

तुलना।

  • गुमुलगल पद्धति में शब्द की स्थिति का कोई अर्थ नहीं — बस जोड़ते जाइए: प्रत्येक उकासर 2 देता है और प्रत्येक उरापोन 1। इसकी सांकेतिक संख्याएँ केवल 1 और 2 हैं।
  • आधार-2 स्थानीय मान पद्धति में स्थिति ही सब कुछ है: वही शब्द उकासर स्थान के अनुसार 1, 2, 4 या 8 बन जाता है। इसकी सांकेतिक संख्याएँ अंतहीन हैं: 1, 2, 4, 8, 16, …
  • लंबाई: N लिखने के लिए गुमुलगल को लगभग N ÷ 2 शब्द चाहिए; स्थानीय मान पद्धति को केवल लगभग log2N अंक। 1024 के लिए यह 512 शब्द बनाम 11 अंक है।
  • स्थानीय मान वाले रूप में शून्य के लिए एक अंक चाहिए; गुमुलगल पद्धति को इसकी आवश्यकता ही नहीं, क्योंकि जो स्थान रिक्त है वह बोला ही नहीं जाता।
ऐसा क्यों होता है: दोनों पद्धतियाँ 2 में गिनती हैं, फिर भी उनका व्यवहार पूर्णत: भिन्न है। गुमुलगल समूह आकार का प्रयोग केवल नाम बनाने में करते हैं; आधार-2 पद्धति उसका प्रयोग स्थान बनाने में करती है, और प्रत्येक नया स्थान परास को दुगुना कर देता है। एक बात से सावधान रहिए: 2 गुमुलगल पद्धति में उकासर है परंतु आधार-2 पद्धति में उकासर उरापोन — वही शब्द, दो भिन्न नियमों से पढ़े गए।
प्र3.
बताइए कि किस प्रकार आपके दैनिक जीवन में और किन व्यवसायों में हिंदू संख्यांक और 0 महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं? यदि हमारी संख्या पद्धति और 0 का आविष्कार या कल्पना नहीं हुई होती तो हमारा जीवन कितना भिन्न होता?
उत्तर

दैनिक जीवन में: दुकान पर मूल्य और शेष पैसे, कैलेंडर की तिथियाँ, घड़ी का समय, दूरभाष संख्या, पिन कोड, बस और रेलगाड़ी की संख्या, मकान संख्या, क्रिकेट का स्कोर और रन-रेट, अंक-तालिका के प्राप्तांक, तराजू का पाठ्यांक, इसी पुस्तक के पृष्ठ क्रमांक।

व्यवसायों में:

  • दुकानदार और लेखाकार — बिल, बहीखाता, जी.एस.टी. की गणना।
  • बैंककर्मी — ब्याज, किस्त, खाते का शेष।
  • अभियंता, वास्तुविद और सर्वेक्षक — माप, पैमाने के रेखाचित्र, भार की गणना।
  • चिकित्सक और औषधि-विक्रेता — मिलीग्राम में मात्रा, रक्त-जाँच की रिपोर्ट।
  • किसान — हेक्टेयर में भूमि, उपज, बाजार भाव।
  • वैज्ञानिक — 1023 या 10-9 जैसी अति बड़ी और अति छोटी संख्याएँ, जो स्थानीय मान का ही स्वाभाविक विस्तार है।
  • अभिकलन करने वाले — प्रत्येक कंप्यूटर आधार 2 पर, केवल 0 और 1 से चलता है।

इनके बिना जीवन बहुत भिन्न होता:

  • अंकगणित के लिए कोई उपकरण चाहिए होता। पृष्ठ 60 स्मरण कीजिए: रोमन संख्यांक प्रयोग करने वालों को अबेकस चाहिए था और उसे केवल प्रशिक्षित व्यक्ति ही चला पाते थे। साधारण दुकानदार अपना बिल स्वयं जाँच भी न पाता।
  • कागज पर न स्तंभ में जोड़ होता, न लंबा गुणा, न लंबा भाग।
  • 0 के संख्या रूप के बिना ब्रह्मगुप्त वाली ऋणात्मक संख्याएँ न होतीं, अत: आधुनिक बीजगणित, निर्देशांक ज्यामिति और गति के समीकरण भी न होते।
  • न दशमलव होते, न वैज्ञानिक संकेतन, न द्विआधारी पद्धति — अत: न कंप्यूटर, न डिजिटल भुगतान, न मोबाइल फोन।
ऐसा क्यों होता है: हिंदू पद्धति केवल संख्याएँ अंकित नहीं करती, वह गणना को हर व्यक्ति के लिए संभव बना देती है। इसीलिए लाप्लास ने कहा कि इसका महत्त्व इतना गहरा है और फिर भी इतनी सरलता से अनदेखा हो जाता है — इसने “अंकगणित को उपयोगी आविष्कारों में सर्वोपरि स्थान” ठीक इसीलिए दिलाया कि उसने उसे साधारण बना दिया।
प्र4.
प्राचीन भारतीयों ने हिंदू संख्या पद्धति के लिए संभवत: आधार-10 का उपयोग किया होगा क्योंकि मनुष्य की दस अँगुलियाँ होती हैं और इसीलिए हम अपनी अँगुलियों से गिनती कर सकते हैं। यदि हमारी केवल 8 अँगुलियाँ होती तो क्या होता? तब हम संख्याएँ कैसे लिखते? यदि हम आधार 8 का उपयोग करते तब हिंदू संख्यांक कैसे लिखते? आधार-5 का उपयोग करने पर हिंदू संख्यांक कैसे लिखे जाते हैं? आधार 10 वाले हिंदू संख्यांक 25 को क्रमश: आधार-8 और आधार-5 वाले हिंदू संख्यांकों के रूप में लिखने का प्रयास कीजिए। क्या आप इसे आधार-2 में लिख सकते हैं?
उत्तर

8 अँगुलियाँ होतीं तो हम लगभग निश्चित ही आधार 8 चुनते। पद्धति की शेष सारी बातें वैसी ही रहतीं — केवल आधार बदलता।

सांकेतिक संख्याएँ: 1, 8, 64, 512, 4096, …
आवश्यक अंक: 0, 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7 — आठ अंक, आधार से एक कम तक
संख्या N इस प्रकार लिखी जाती ak ak−1 … a1 a0, जिसका अर्थ है
N = ak·8k + ak−1·8k−1 + … + a1·8 + a0,   जहाँ 0 ≤ ai ≤ 7

25 लिखना:

आधारसमूहनसंख्यांक
825 = 3 × 8 + 131
525 = 1 × 25 + 0 × 5 + 0 × 1100
225 = 16 + 8 + 1 = 1×16 + 1×8 + 0×4 + 0×2 + 1×111001
1025 = 2 × 10 + 525

जाँच: 3 × 8 + 1 = 25 ✓   1 × 25 = 25 ✓   16 + 8 + 0 + 0 + 1 = 25 ✓

ऐसा क्यों होता है: आधार एक साथ दो बातें तय करता है। पहला, कितने अंक चाहिए — सदैव आधार जितने, 0 सहित। दूसरा, संख्यांक कितने लंबे होंगे। छोटा आधार अर्थात कम प्रतीक सीखने हैं परंतु संख्यांक लंबे: 25 आधार 8 में “31”, आधार 5 में “100” और आधार 2 में “11001” है। आधार 10 गणितीय दृष्टि से किसी भी प्रकार विशेष नहीं है; उसका पूरा कारण दस अँगुलियाँ हैं। जो वास्तव में विशेष है और प्रत्येक आधार में काम करता है, वह है संरचना — आधार की घातों वाली सांकेतिक संख्याएँ, प्रत्येक स्थान पर एक अंक, और रिक्त स्थान के लिए 0।
स्वयं जाँचिए: आधार 5 में 100 का अर्थ आधार 10 में 25 है, और आधार 8 में 100 का अर्थ 64। प्रत्येक आधार में संख्यांक “100” का अर्थ उस आधार का वर्ग होता है — स्थानीय मान का यही वचन है।
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